वेल्लोर (तमिलनाडु) से ताल्लुक रखने वाले प्रदीप कुमार ने खेती को सफल बिजनेस मॉडल बनाया है। वह एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनी में काम कर चुके हैं। कुछ साल पहले उन्होंने नौकरी छोड़कर हाथों में हल थामने का फैसला किया। इसके पीछे एक बड़ा कारण भी था।
नई दिल्ली: प्रदीप कुमार तमिलनाडु के वेल्लोर से हैं। साल 2019 में अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़कर वह गांव वापस लौट आए। यह फैसला उन्होंने तब लिया जब उनकी मां की गंभीर सर्जरी हुई। खुद उन्हें हेल्दी लाइफस्टाइल के बावजूद किडनी स्टोन की समस्या आ गई। उन्होंने महसूस किया कि असली समस्या खाने में मौजूद केमिकल हैं। सिर्फ 12,000 रुपये की सेविंग से उन्होंने 'फूड फॉरेस्ट' की शुरुआत की। आज यह नैचुरल फॉर्म 10,000 से अधिक ग्राहकों को शुद्ध आहार पहुंचा रहा है। इस फार्म में सैकड़ों तरह की फसलें उगाई जाती हैं। आइए, यहां प्रदीप कुमार की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।ऐसे पकड़ा खेती का रास्ता ऐसे पकड़ा खेती का रास्ता ' imgsize='39750' >वेल्लोर के प्रदीप कुमार ने 2014 में थंथाई पेरियार ई.
वी. रामास्वामी पॉलिटेक्निक कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपना डिप्लोमा पूरा किया। ग्रेजुएशन के बाद 2014 में उन्हें L&T में कैंपस प्लेसमेंट मिला। एक इंजीनियर के तौर पर उन्होंने राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सहित कई बड़े सड़क और रेलवे प्रोजेक्ट्स पर काम किया। बाद में उन्होंने टेरेक्स में सर्विस इंजीनियर के तौर पर काम शुरू किया। लगभग 2019 तक कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करते रहे। कुल मिलाकर उनका करियर शानदार चल रहा था, लेकिन परिवार में स्वास्थ्य समस्याओं ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। फिट रहने और अनुशासन के बावजूद खुद को और अपनी मां को बीमार देखकर उन्होंने प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ नम्मालवार के विचारों से प्रेरणा ली। उन्होंने समझ लिया कि रसायनों से उगी फसलें मानव अंगों को अंदर से मार रही हैं। इसके बाद उन्होंने दो साल तक रिसर्च की। उपवास और सादे भोजन की जीवनशैली अपनाई। आखिरकार अपनी कॉर्पोरेट पहचान छोड़कर मिट्टी से जुड़ने का फैसला किया।बंजर जमीन में उगाया सोना बंजर जमीन में उगाया सोना ' imgsize='130472' >प्रदीप कुमार जब अपने गांव वेल्लोर लौटे तो बरसों की रासायनिक खेती के चलते वहां की मिट्टी लगभग 'मृत' हो चुकी थी। शुरुआत में एक-दो साल तक कुछ भी नहीं उगा। यह वाकई में काफी हताश करने वाला था। लेकिन, प्रदीप ने हार नहीं मानी। उन्होंने फसल के बजाय मिट्टी को ठीक करने पर फोकस किया। उन्होंने देसी बीजों का इस्तेमाल किया। पौधों को वापस मिट्टी में खाद के रूप में मिलाया। धीरे-धीरे पक्षी और केंचुए वापस आने लगे। फिर एक दिन वही बंजर जमीन एक लहलहाते 'फूड फॉरेस्ट' में तब्दील हो गई। वहां आर्गेनिक फसलों की खेती होने लगी।बिक्री के लिए अपनाया व्हाट्सऐप मॉडल बिक्री के लिए अपनाया व्हाट्सऐप मॉडल' imgsize='39132' >प्रदीप ने सिर्फ 2 सेंट जमीन से शुरुआत की थी। आज यह 40 सेंट तक फैल चुकी है। उनके पास टमाटर, बैंगन और बाजरा सहित लगभग 800 स्वदेशी बीजों की किस्में हैं। वह कोई वेबसाइट या बिचौलिया नहीं रखते। इसके बजाय सीधे व्हाट्सएप के जरिए ग्राहकों को सामान बेचते हैं। उनके खेत की क्वालिटी यह है कि जहां सामान्य भिंडी का पौधा 10-30 फल देता है, वहीं उनके देसी बीज वाले पौधे 120 तक भिंडी देते हैं। वह हर साल एक 'बीज उत्सव' भी आयोजित करते हैं। इसमें हजारों लोग हिस्सा लेते हैं।अब लाखों की हो रही है कमाई अब लाखों की हो रही है कमाई' imgsize='66676' >12,000 रुपये की सेविंग से शुरू हुआ यह काम आज एक सफल मॉडल बन चुका है। प्रदीप सालाना बीजों से 3 लाख रुपये और सब्जियों से 2 लाख रुपये कमाते हैं। खास बात यह है कि वह फसल की बर्बादी रोकने के लिए बची हुई उपज से अचार, प्यूरी और सूखी सब्जियां तैयार करते हैं। 10,000 से ज्यादा संतुष्ट ग्राहकों के साथ प्रदीप आज उन युवाओं के लिए मिसाल हैं जो मानते हैं कि खेती के लिए बहुत अधिक पैसा या बड़ी जमीन चाहिए। उनका मंत्र साफ है। पहले अपनी मिट्टी को समझें, सफलता अपने आप पीछे आएगी।
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