प्रोफेसर साजी वर्गीस अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वह बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं। उन्होंने 2020 में 'सनबर्ड स्ट्रॉज' नाम का उद्यम शुरू किया। यह गिरे हुए नारियल के पत्तों से इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ और पेन बनाता है। ये देश-विदेश में बिकते...
नई दिल्ली: प्रोफेसर साजी वर्गीस ने गजब का काम किया है। उन्होंने टूटकर गिर चुके नारियल के पत्तों को कमाई का जरिया बना दिया है। वह इन पत्तों से इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ और पेन बनाते हैं। यह सिंगल-यूज प्लास्टिक स्ट्रॉ का टिकाऊ विकल्प है। उनकी कंपनी सनबर्ड स्ट्रॉज ने इसी एक काम से दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। साजी वर्गीज बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वह अंग्रेजी पढ़ाते हैं। उनके बिजनेस मॉडल ने स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के लिए उनके घर के करीब नियमित आय सुनिश्चित की है। अपने वेंचर से प्रोफेसर वर्गीज सालाना 70 लाख की कमाई करते हैं। उनके इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ पाइप और पेन की अमेरिका और यूरोप समेत कई देशों में डिमांड है। आइए, यहां साजी वर्गीस की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।बहुत पास से देखी गरीबी बहुत पास से देखी गरीबी ' imgsize='27474' >प्रोफेसर साजी वर्गीस बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। लेकिन, उनकी महारत केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। ग्रासरूट इनोवेशन में भी प्रोफेसर वर्गीस की गहरी दिलचस्पी है। इसका प्रेरणा उन्हें अफ्रीकी-अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक और आविष्कारक जॉर्ज वाशिंगटन कार्वर की जीवनी से मिली। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के एक दूरदराज के गांव में पढ़ाने के दौरान वर्गीस ने वहां की गरीबी और किसान आत्महत्याओं को करीब से देखा। इससे उनमें ग्रामीण समुदाय के लिए कुछ ठोस और सार्थक करने की इच्छा जगी। वह कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उनकी जिंदगी में सकारात्मक असर पड़े। उन्होंने फैसला किया कि वह ऐसे साधारण प्रोडक्ट इनोवेशन पर फोकस करेंगे जो ग्रामीण महिलाओं के लिए संपत्ति का सृजन कर सकें और पर्यावरण को फायदा भी पहुंचाएं। नारियल के पत्तों से स्ट्रॉ का इनोवेशन नारियल के पत्तों से स्ट्रॉ का इनोवेशन' imgsize='18972' >एक दिन प्रोफेसर वर्गीस को क्राइस्ट यूनिवर्सिटी परिसर में गिरे हुए नारियल के सूखे पत्तों में खोखली नलियों जैसा आकार दिखा। यही उनके लिए इनोवेशन का पल था। उन्होंने पत्तों को घर ले जाकर इडली की तरह स्टीम किया। इससे पत्तों की सतह पर प्राकृतिक चमकदार मोम दिखाई दिया। यह उन्हें जल-प्रतिरोधी और टिकाऊ बनाता है। उन्होंने लाइफ साइंसेज के दो छात्रों की मदद से इसकी पुष्टि की। इस प्रक्रिया के बाद उन्होंने अपने सह-संस्थापकों के साथ मिलकर ऐसी मशीनें विकसित कीं जो इन पत्तों को बिना किसी केमिकल के सफाई और प्रोसेसिंग के बाद इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ में बदल सकें।सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को रोजगार सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को रोजगार ' imgsize='100104' >प्रोफेसर वर्गीस का वेंचर 'हब-एंड-स्पोक' मॉडल पर काम करता है। इसके दो प्रकार के प्रोसेसिंग केंद्र गांवों में ही स्थापित हैं। यह मॉडल 115 से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देता है। इनमें से ज्यादातर पहले बेरोजगार थीं। प्रोफेसर वर्गीस ने सुनिश्चित किया है कि कार्यस्थल महिलाओं के घरों से केवल 10 मिनट की पैदल दूरी पर हों ताकि वे घर के काम के साथ रोजगार भी कर सकें। यह मॉडल उन्हें प्रतिदिन 340 रुपये तक की स्टेबल इनकम प्रदान करता है जो कृषि-आधारित गतिविधियों की तरह मौसमी नहीं है। सनबर्ड को अपने इनोवेशन के लिए भारतीय और अमेरिकी पेटेंट भी मिल चुका है।आगे का टारगेट भी साफ आगे का टारगेट भी साफ ' imgsize='30250' >वेंचर का तीन मुख्य मोर्चों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पहला, यह 20 लाख से ज्यादा सिंगल-यूज प्लास्टिक स्ट्रॉ की जगह समुद्री जीवन और लैंडफिल में होने वाले प्रदूषण को कम कर रहा है। दूसरा, यह नारियल के पत्तों को जलाने से रोकता है। इससे अब तक 5 करोड़ से ज्यादा पत्तों को जलने से बचाया गया है। इसके चलते 451 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है। तीसरा, यह ग्रामीण महिलाओं को नियमित आजीविका प्रदान करके सामाजिक समावेश को बढ़ावा देता है। स्ट्रॉ के अलावा, कंपनी पत्तों से पेन और नारियल से गार्निशिंग स्टिक भी बनाती है। वर्गीज का टारगेट तीन साल में 500 महिलाओं को रोजगार देना और इस टिकाऊ मॉडल को फिलीपींस और थाईलैंड जैसे अन्य नारियल-बहुल देशों में दोहराकर 'ग्लोबल ब्रांड ऑफ रूरल इंडिया' बनना है।.
नई दिल्ली: प्रोफेसर साजी वर्गीस ने गजब का काम किया है। उन्होंने टूटकर गिर चुके नारियल के पत्तों को कमाई का जरिया बना दिया है। वह इन पत्तों से इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ और पेन बनाते हैं। यह सिंगल-यूज प्लास्टिक स्ट्रॉ का टिकाऊ विकल्प है। उनकी कंपनी सनबर्ड स्ट्रॉज ने इसी एक काम से दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। साजी वर्गीज बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वह अंग्रेजी पढ़ाते हैं। उनके बिजनेस मॉडल ने स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के लिए उनके घर के करीब नियमित आय सुनिश्चित की है। अपने वेंचर से प्रोफेसर वर्गीज सालाना 70 लाख की कमाई करते हैं। उनके इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ पाइप और पेन की अमेरिका और यूरोप समेत कई देशों में डिमांड है। आइए, यहां साजी वर्गीस की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।बहुत पास से देखी गरीबी बहुत पास से देखी गरीबी ' imgsize='27474' >प्रोफेसर साजी वर्गीस बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। लेकिन, उनकी महारत केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। ग्रासरूट इनोवेशन में भी प्रोफेसर वर्गीस की गहरी दिलचस्पी है। इसका प्रेरणा उन्हें अफ्रीकी-अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक और आविष्कारक जॉर्ज वाशिंगटन कार्वर की जीवनी से मिली। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के एक दूरदराज के गांव में पढ़ाने के दौरान वर्गीस ने वहां की गरीबी और किसान आत्महत्याओं को करीब से देखा। इससे उनमें ग्रामीण समुदाय के लिए कुछ ठोस और सार्थक करने की इच्छा जगी। वह कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे उनकी जिंदगी में सकारात्मक असर पड़े। उन्होंने फैसला किया कि वह ऐसे साधारण प्रोडक्ट इनोवेशन पर फोकस करेंगे जो ग्रामीण महिलाओं के लिए संपत्ति का सृजन कर सकें और पर्यावरण को फायदा भी पहुंचाएं। नारियल के पत्तों से स्ट्रॉ का इनोवेशन नारियल के पत्तों से स्ट्रॉ का इनोवेशन' imgsize='18972' >एक दिन प्रोफेसर वर्गीस को क्राइस्ट यूनिवर्सिटी परिसर में गिरे हुए नारियल के सूखे पत्तों में खोखली नलियों जैसा आकार दिखा। यही उनके लिए इनोवेशन का पल था। उन्होंने पत्तों को घर ले जाकर इडली की तरह स्टीम किया। इससे पत्तों की सतह पर प्राकृतिक चमकदार मोम दिखाई दिया। यह उन्हें जल-प्रतिरोधी और टिकाऊ बनाता है। उन्होंने लाइफ साइंसेज के दो छात्रों की मदद से इसकी पुष्टि की। इस प्रक्रिया के बाद उन्होंने अपने सह-संस्थापकों के साथ मिलकर ऐसी मशीनें विकसित कीं जो इन पत्तों को बिना किसी केमिकल के सफाई और प्रोसेसिंग के बाद इको-फ्रेंडली स्ट्रॉ में बदल सकें।सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को रोजगार सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को रोजगार ' imgsize='100104' >प्रोफेसर वर्गीस का वेंचर 'हब-एंड-स्पोक' मॉडल पर काम करता है। इसके दो प्रकार के प्रोसेसिंग केंद्र गांवों में ही स्थापित हैं। यह मॉडल 115 से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देता है। इनमें से ज्यादातर पहले बेरोजगार थीं। प्रोफेसर वर्गीस ने सुनिश्चित किया है कि कार्यस्थल महिलाओं के घरों से केवल 10 मिनट की पैदल दूरी पर हों ताकि वे घर के काम के साथ रोजगार भी कर सकें। यह मॉडल उन्हें प्रतिदिन 340 रुपये तक की स्टेबल इनकम प्रदान करता है जो कृषि-आधारित गतिविधियों की तरह मौसमी नहीं है। सनबर्ड को अपने इनोवेशन के लिए भारतीय और अमेरिकी पेटेंट भी मिल चुका है।आगे का टारगेट भी साफ आगे का टारगेट भी साफ ' imgsize='30250' >वेंचर का तीन मुख्य मोर्चों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पहला, यह 20 लाख से ज्यादा सिंगल-यूज प्लास्टिक स्ट्रॉ की जगह समुद्री जीवन और लैंडफिल में होने वाले प्रदूषण को कम कर रहा है। दूसरा, यह नारियल के पत्तों को जलाने से रोकता है। इससे अब तक 5 करोड़ से ज्यादा पत्तों को जलने से बचाया गया है। इसके चलते 451 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन कम हुआ है। तीसरा, यह ग्रामीण महिलाओं को नियमित आजीविका प्रदान करके सामाजिक समावेश को बढ़ावा देता है। स्ट्रॉ के अलावा, कंपनी पत्तों से पेन और नारियल से गार्निशिंग स्टिक भी बनाती है। वर्गीज का टारगेट तीन साल में 500 महिलाओं को रोजगार देना और इस टिकाऊ मॉडल को फिलीपींस और थाईलैंड जैसे अन्य नारियल-बहुल देशों में दोहराकर 'ग्लोबल ब्रांड ऑफ रूरल इंडिया' बनना है।
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