DNA: सूत्रधार या सूत्रहार? बिहार ने चूर किया प्रशांत किशोर का अहंकार

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DNA: सूत्रधार या सूत्रहार? बिहार ने चूर किया प्रशांत किशोर का अहंकार
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प्रशांत किशोर को चुनावी रणनीतिकार माना जाता है, लेकिन वो अपनी ही पार्टी को बिहार में एक भी सीट नहीं दिला पाए. अपने गृह राज्य में वो पूरी तरह फेल हो गए.

Prashant Kishor Failed in Bihar : आज के चुनावी नतीजों के बाद एक शब्द बहुत ट्रेंड कर रहा है. वो शब्द है सूत्रहार. ये शब्द प्रशांत किशोर के लिए विशेषण के तौर पर प्रयोग हो रहा है. प्रशांत किशोर जनसुराज का सूत्रधार बनकर बिहार का सूत्रधार बनने चले थे.

लेकिन उनका राजनीतिक परिवर्तन वाला सूत्र. जीत के दावों का सूत्र. और उनकी रणनीति का हर एक सूत्र NDA की धार में छिन्न-भिन्न हो गया. इसलिए आज उन्हें सूत्रहार कहा जा रहा है. किंग मेकर रहे, लेकिन बिहार में क्या हुआ? ये वही प्रशांत किशोर हैं, जो 6 साल में 6 राज्यों में 6 मुख्यमंत्री बनवाने का दावा करते हैं, वो अपने घर में, अपने बिहार में अपना एक विधायक भी नहीं बनवा पाए. दावा है कि उनकी पार्टी के एक करोड़ सदस्य हैं, लेकिन उनमें से 10 लाख वोट भी वो अपने उम्मीदवारों को नहीं दिलवा पाए. जो 238 कैंडिडेट उतारकर बिहार में प्रचंड परिवर्तन का दावा करते रहे, उनके 95 प्रतिशत से अधिक उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. जी हां, प्रशांत किशोर की पार्टी के 100 में से 95 से ज्यादा उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा पाए. खारिज हुए प्रशांत किशोर ये वही जन सुराजी थे जिन्हें प्रशांत किशोर ने अपने रणनीतिक मंथन से निकाला था. जिनको विधायक बनकर वो बिहार का भाग्यविधाता बनना चाहते थे. लेकिन बिहार के जन-जन ने NDA के सुराज पर मुहर लगाकर प्रशांत को खारिज कर दिया. बिहार में उद्योग लगाकर परिवर्तन की कहानी लिखने का दावा करने वाले PK के खुद का सियासी स्टार्ट-अप कैसे फेल हो गया, अब हम इसका विश्लेषण करने वाले हैं. शून्य पर सिमटे इस बार के बिहार चुनाव में प्रशांत किशोर एक अहम फैक्टर थे. जिस तरह उन्होंने राजनीति में एंट्री की थी. उन्होंने जिस तरह का राजनीतिक आभामंडल तैयार किया था. लगातार तीन साल तक कैमरे लेकर घूमते रहे. जिस तरह उनके चाहने वाले उन्हें चाणक्य के तौर पर स्थापित करते रहे. और जिस तरह वो स्वयं भी बिहार में कालजयी परिवर्तन का दावा करते रहे उससे लग रहा था कि इस चुनाव के बाद जनसुराज की सरकार ही बन जाएगी. बाकी सब शून्य के आसपास ही सिमटे दिखेंगे. लेकिन बिहार के लोगों ने प्रशांत की राजनीति को शून्य पर समेट दिया है. सिर्फ एक सीट पर नंबर-2 पर रहे प्रशांत किशोर की पार्टी का एक भी कैंडिडेट नहीं जीत पाया. जनसुराज के सिर्फ एक कैंडिडेट नंबर 2 तक पहुंच पाया, वो भी इसलिए क्योंकि वहां से NDA की उम्मीदवारी खारिज हो गई थी. प्रशांत किशोर की पार्टी के 100 से अधिक कैंडिडेट को नोटा से भी कम वोट मिले हैं. प्रशांत किशोर रोहतास जिले से आते हैं. जहां विधानसभा की 7 सीटें हैं. उनके अपने जिलों की सभी सीटों पर भी पार्टी अपनी जमानत नहीं बचा पाई है. सोचिए हैदराबाद वाले ओवैसी भी बिहार में 5 सीट जीत ले गए, लेकिन प्रशांत किशोर पूरी तरह फेल हो गए. रुपौली में भी हार फिर याद दिलाना चाहेंगे कि ये वही वोट विशेषज्ञ प्रशांत किशोर हैं, जिन्होंने पिछले साल दावा किया था कि उनकी मदद से रूपौली उपचुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत गया था. लेकिन उसी रुपौली में जब इस बार उन्होंने जनसुराज का बस्ता छाप देकर उम्मीदवार उतारा तो उसे मुश्किल से ढाई हजार वोट मिल पाए हैं. जबकि कथित तौर पर उपचुनाव में पीके के योगदान सी जीतने वाले शंकर सिंह ने हारकर भी जनसुराज के कैंडिडेट से ग्यारह गुना अधिक वोट प्राप्त किया है. कई राज्यों में सीएम बनवाने का काम मित्रो, प्रशांत किशोर अपनी वोट-विशेषज्ञता वाले बायोडाटा पर बोल्ड फॉन्ट में लिखते हैं कि 2014 में केंद्र में बीजेपी की सरकार बनवाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था. उस बायोडाटा में ये भी लिखते हैं कि 2020 में उन्होंने ही अरविंद केजरीवाल को दोबारा दिल्ली का मुख्यमंत्री बनवाया. 2021 में एमके स्टालिन और ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनवाया. उसके बाद आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी, पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और बिहार में ही 2015 में उनकी ही रणनीति से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन पाए थे. बिहार में नहीं चला पॉलिटकल स्टार्टअप इसी विशेष अनुभव के आधार पर उन्होंने बिहार में अपना पॉलिटकल स्टार्टअप शुरू किया था. दूसरों को 6 महीने या सालभर में चुनाव जिताने वाले प्रशांत किशोर ने बिहार में तीन साल तक मेहनत की. लोगों को कनविंस करते रहे. अपना बायोडाटा बांचते रहे. 1280 दिन में 6 हजार किलोमीटर पैदल चले. 5 हजार गांवों तक पहुंचे और 5 हजार सभाएं की. खूब प्रचार-प्रसार किया. 21 अक्टूबर से हर दिन औसतन 200 किलोमीटर की दूरी तय की. प्रतिदिन 8 से 10 विधानसभा क्षेत्र का दौरा किया. लेकिन इसका परिणाम शून्य रहा. लोगों को पसंद नहीं आया जन सुराज अब लोग कह रहे हैं कि अगर प्रशांत किशोर इतने ही बड़े वोट-विशेषज्ञ रहते तो जिस कैंडिडेट के लिए अपना तन-मन-धन सबकुछ लगा दिया. जिसके आसरे वो खुद बिहार के नीति नियंता बनना चाहते थे. उन्हें क्यों नहीं जिता पाए. असल में जिस अंदाज़ में लोगों से समर्थन मांग रहे थे. जिस तरह खुद को भाग्यविधाता के तौर पर प्रचारित करते रहे, वो लोगों को पसंद नहीं आया. लोग उनके चुनावी सभाओं में भी गए. भीड़ भी दिखी. वोटों में नहीं बदली भीड़ कहीं कहीं तो इतनी भीड़ हो गई कि काबू करना तक मुश्किल हो गया था. लेकिन अब जब चुनाव का परिणाम आ चुके हैं तो पॉलिटिकल पंडित कह रहे हैं कि प्रशांत किशोर की सभाओँ की भीड़ आयातित थी. विशेष उद्देश्य के लिए गई थी. कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि पीके की सभा में लोग खाना खाकर निकल गए. इसका अंदाज़ा स्वयंभू वोट-विशेषज्ञ को भी नहीं था. यही कारण है कि आंकड़ों के साथ जवाब देने वाले प्रशांत किशोर के शब्दों में तर्क और तथ्य की मात्रा इतनी अधिक थी कि वो अहंकार में परिवर्तित हो गया था. अपनी वोट विशेषज्ञता की व्याख्या करते-करते प्रशांत के शब्दों पर किस तरह अहंकार हावी हो जाता था. वो सुनिए जरा. उलटे पड़े दावे प्रशांत किशोर ने जितने दावे किए, उसका उल्टा हुआ. ना जेडीयू 25 पर सिमटी. ना नीतीश मुख्यमंत्री के कुर्सी से उतरने वाले हैं. और ना ही जनसुराज चुनाव जीत पाई. यहां तक कि 238 में से एक भी सीट पर जन सुराज के कैंडिडेट फैक्टर नहीं बन पाए. मतलब एक भी कैंडिडेट को इतने वोट नहीं मिले जितने महागठबंधन और एनडीए उम्मीदवार के जीत के अंतर से अधिक हो. बोलचाल की भाषा में कहे तो जनसुराज के उम्मीदवार वोटकटवा भी नहीं बन पाए. पार्टी की दुर्गति मित्रो इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशांत पढ़े लिखे हैं. उन्हें आंकड़ों की जानकारी है. हर चुनाव में किसी की जीत होती है. तो किसी की हार होती है. लेकिन पीके की रणनीति की जो दुर्गति हुई है, वो क्यों महत्वपूर्ण है, उसे जरा ऐसे भी समझिए. भारतीय राजनीति के परिवर्तनकारी स्तम्भ माने जाते हैं कांशीराम. उन्होंने कहा था कि कोई भी पार्टी पहला चुनाव हारने के लिए. दूसरा हराने के लिए. और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ती है. गेमचेंजर नहीं चोकर्स यही सवाल जब प्रशांत किशोर से पूछा गया तो उन्होंने अपनी वोट-विशेषज्ञता का प्रयोग करते हुए दावा किया था कि ये सशोल मीडिया का दौर है. और इस दौर में जन सुराज सोशल मीडिया के जरिए पुरातन सोच को बदल देगा. बिहार की राजनीति 180 डिग्री पर बदल जाएगी. लेकिन उनके 1300 प्रोफेशनल्स की टीम पीके को सिर्फ सोशल मीडिया का चाणक्य ही बना पाई. पत्रकार जिन्हें गेमचेंजर बता रहे थे, वो चोकर्स बनकर ही रह गए. सूत्रधार या सूत्रहार? प्रशांत किशोर की वोट-विशेषज्ञता का जो परिणाम आया, उसके बाद मीडिया को भी आत्मचिंतन करने की जरूरत है. जन सुराज ने जो आभामंडल तैयार किया था, उसमें मीडिया का भी ठीकठाक योगदान था. कभी-कभी मीडिया.. अच्छा बोलने वालों को अच्छा नेता मान लेते हैं. जमीनी सच्चाई से दूर हो जाता है. प्रशांत के गांव-गांव घूमते तस्वीरों को देखकर विश्लेषण किया गया. लेकिन किसी ने ये नहीं देखा कि पीके के आगे बढ़ते ही पिछली जमीन खिसकती जा रही है. प्रशांत की जमीन खिसकती गई लेकिन जनता, जमीन पकड़कर रही. और बड़े-बड़े राजीतिक विशेषज्ञों को राजनीति का ककहरा पढ़ाने वाले बिहार ने वोट विशेषज्ञ सूत्रधार को सूत्रहार बना दिया.

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