DNA: विरोधी भले ही नीतीश को पलटूराम बताते रहे लेकिन बिहार ने नीतीश पर भरोसा बनाए रखा. आज आपको जानना चाहिए, कि नीतीश कुमार ने ऐसा क्या किया कि NDA के पक्ष में इतनी बड़ी सुनामी आ गई. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीतीश कुमार के नेतृत्व की तारीफ़ की.
DNA मित्रों, नीतीश कुमार ने अपने नेतृत्व में लगातार पांचवीं बार बिहार विधानसभा का चुनाव जिताया है. और इस पांचवीं बड़ी जीत के साथ, वो दसवीं बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. ये वही नीतीश कुमार हैं जिनके ख़िलाफ़ चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान ये नैरेटिव गढ़ा गया कि वो बीमार हैं.
महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव बार-बार नीतीश कुमार को बीमार बता रहे थे. कहते थे कि नीतीश कुमार से बिहार नहीं चलने वाला है. नीतीश कुमार पूरे चुनाव प्रचार के दौरान इस आरोप पर खामोश रहे. चुप रहे लेकिन चुनाव में बिहार की जनता ने नीतीश को बीमार बताने वालों का इलाज कर दिया है. चुनाव के नतीजों से साबित हो गया कि नीतीश बीमार नहीं, पूरा बिहार हैं. विरोधी भले ही नीतीश को पलटूराम बताते रहे लेकिन बिहार ने नीतीश पर भरोसा बनाए रखा. आज आपको जानना चाहिए, कि नीतीश कुमार ने ऐसा क्या किया कि NDA के पक्ष में इतनी बड़ी सुनामी आ गई. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीतीश कुमार के नेतृत्व की तारीफ़ की. नीतीश कुमार के नेतृत्व में आज NDA ने बिहार में डबल सेंचुरी मार दी. ये 2010 की जीत के आसपास ही है जब NDA ने 206 सीटों पर जीत हासिल की थी. आज के इस नतीजे के साथ ही ये साबित हो गया कि लोगों को नीतीश कुमार के सुशासन पर अब भी भरोसा है. नीतीश कैसे विरोधियों पर इक्कीस पड़े? आज हम आपको बताएंगे कि नीतीश कुमार इस चुनाव में विरोधियों पर इक्कीस कैसे पड़े. नीतीश कुमार ने कैसे पूरी बाज़ी पलटी ये बताने से पहले आपको जानना चाहिए कि इस चुनाव में नीतीश की पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा और पिछले चुनाव के मुक़ाबले जेडीयू कहां रही. इस बार जेडीयू ने 101 सीटों पर लड़कर 85 सीटों पर जीतती हुई दिख रही है. अभी तक के आंकड़े के मुताबिक़ जेडीयू को 19 प्रतिशत वोट मिले हैं. जबकि 2020 के चुनाव में जेडीयू 115 सीटों पर लड़कर सिर्फ़ 43 सीट जीतने में सफल रही थी. जेडीयू को 2020 में 15 प्रतिशत वोट मिले थे और वो तीसरे नंबर की पार्टी बनी थी. लेकिन 2020 के चुनावों को पीछे छोड़ते हुए इस बार नीतीश ने शानदार वापसी की है. पिछले 5 चुनावों में जेडीयू के प्रदर्शन की बात करें तो - 2005 में हुए पहले चुनाव में जेडीयू को 55 सीट मिली थी - जबकि 2005 में हुए दूसरे चुनाव में जेडीयू ने 88 सीटें जीती थी - 2010 में जेडीयू ने सबसे ज़्यादा 115 सीटें जीती थी. - 2015 में जेडीयू ने आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और उसे 71 सीट मिली थी - वहीं 2020 में उसकी सीट घटकर 43 हो गई - और इस बार उसने पिछली बार के मुक़ाबले लगभग दोगुनी सीट हासिल की है चुनाव से पहले ऐसा माहौल था कि जनता नीतीश से नाराज है DNA मित्रों, हम जेडीयू की इस बार की जीत इसलिए भी बड़ी कह रहे हैं क्योंकि उसका स्ट्राइक रेट सबसे अच्छा है. 2010 में जेडीयू ने 141 सीटों पर लड़कर 115 सीट जीती थी और उसका स्ट्राइक रेट 82 प्रतिशत था. लेकिन इस बार के चुनाव में वो सिर्फ़ 101 सीटों पर लड़कर 85 सीट जीत रही है. यानी उसका स्ट्राइक रेट इस बार 84 प्रतिशत के आसपास है. चुनाव से छह महीने पहले तक ऐसा लग रहा था कि लोग नीतीश कुमार से काफ़ी नाराज़ हैं, राजनीतिक पंडित कह रहे थे कि इस बार बिहार में एंटी-इनकम्बेंसी की लहर चलेगी लेकिन पिछले छह महीनों के दौरान नीतीश ने अपनी योजनाओं से विरोध की आवाज़ों को शांत कर दिया. तेजस्वी यादव लोगों से वादे कर रहे थे लेकिन नीतीश ने उनमें से ज़्यादातर वादों को पहले ही ज़मीन पर उतार दिया. चुनाव में नीतीश की वो योजनाएं जिनसे हुई उनकी जीत DNA मित्रों, आपको नीतीश कुमार की उन योजनाओं के बारे में जानना चाहिए जिसने चुनाव जिताने में उनकी सबसे ज़्यादा मदद की. नीतीश सरकार ने मुख्यमंत्री रोज़गार योजना के तहत 3 चरणों में 1 करोड़ 21 लाख महिलाओं को 10-10 हज़ार रुपये ट्रांसफर किए. इस योजना पर 12 हज़ार 100 करोड़ रुपये खर्च हुए. महिलाओं को इतनी बड़ी रक़म एक साथ इससे पहले किसी राज्य में नहीं भेजी गई थी. ग्राउंड रिपोर्ट बताती हैं कि नीतीश की इस योजना से महिलाएं ख़ुश थीं. महिलाओं की वोटिंग का आंकड़ा बढ़कर 72 प्रतिशत होने के पीछे ये भी एक कारण हो सकता है. - जीविका, आंगनवाड़ी और आशा वर्कर के मानदेय में भी बढ़ोतरी की गई - दिव्यांगों और बुजुर्गों की पेंशन 400 रुपये से बढ़ाकर 1,100 रुपये कर दी गई...इस पर 9 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च आएगा... - बेरोजगार ग्रेजुएट नौजवानों को 2 साल तक 1 हजार रुपये प्रति माह देने का एलान किया...इस पर 6 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च आएगा... - इसके अलावा बिहार के मिडिल क्लास और ग़रीबों के लिए 125 यूनिट बिजली मुफ्त कर दी गई...इसका फायदा 1 करोड़ 67 लाख परिवारों को हो रहा है...इस पर हर साल 10 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च आएगा... - चुनाव की घोषणा से कुछ घंटे पहले नीतीश ने पटना में मेट्रो की शुरुआत की. इसका भी युवा और मिडिल क्लास मतदाताओं के बीच अच्छा संकेत गया. योजनाओं से मचाई हलचल, मीडिया के सामने रहे खामोश DNA मित्रों, एक तरफ़ तो नीतीश ने अपनी योजनाओं से जनता के बीच हलचल मचाई वहीं दूसरी तरफ़ पूरे चुनाव के दौरान वो मीडिया के सामने साइलेंट बने रहे. आपने बिहार चुनाव के दौरान हर छोटे और बड़े नेताओं के कई-कई इंटरव्यू देखे होंगे. लेकिन मुख्यमंत्री होने के बावजूद नीतीश कुमार ने एक भी इंटरव्यू नहीं दिया. नीतीश कुमार के समर्थन में आपने शायद कोई वायरल सोशल मीडिया पोस्ट भी नहीं देखा होगा. इसके बदले नीतीश कुमार लोगों के बीच पहुंचे. विपक्ष के बीमार वाले तंज़ का जवाब नीतीश कुमार ने चुनावी मैराथन से दिया. इस बार के चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने कुल मिलाकर 84 रैलियां की. नीतीश ने न केवल हेलीकॉप्टर से रैलियां कीं, बल्कि खराब मौसम और भारी बारिश के बीच सड़क मार्ग से भी 1000 किलोमीटर की यात्रा की और 11 रैलियों को संबोधित किया. नीतीश ने नहीं दिया कोई विवादित बयान DNA मित्रों, नीतीश कुमार चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक डटे दिखे. इस तरह उन्होंने बताया कि भले ही वो 75 साल के होने वाले हैं लेकिन उनके भीतर ऊर्जा और उत्साह में कोई कमी नहीं आई है. नीतीश ने चुनाव के दौरान कोई भी विवादित बयान नहीं दिया. पिछली बार उन्होंने कई रैलियों में लालू परिवार पर व्यक्तिगत निशाना साधा था. लेकिन इस बार वो सिर्फ अपने 20 साल के काम-काज के लिए वोट मांगते नजर आए. जनता के बीच काम को गिनाने के अलावा नीतीश ने स्ट्रैटजी पर भी फोकस किया. - RJD के MY समीकरण यानी मुस्लिम-यादव समीकरण का जवाब उन्होंने NDA के MY समीकरण यानी महिला और युवा समीकरण से दिया. - RJD के जाति कार्ड के जवाब में सुशासन का नैरेटिव खड़ा किया - उन्होंने सभी जातियों और धर्मों को जोड़ने पर ध्यान दिया. विशेष रूप से अति पिछड़ी जातियों को जिनकी संख्या बिहार में सबसे ज़्यादा 36 प्रतिशत है. - 2020 की तरह चिराग पासवान को NDA से अलग नहीं रखा जिसका खामियाजा वो भुगत चुके थे. - लेकिन सीट बंटवारे के दौरान झुकने से भी इनकार कर दिया. JDU की कुछ सीटें जब चिराग़ पासवान की पार्टी को दी जा रही थी तो उन्होंने सख़्त नाराज़गी जताई. - तीसरे नंबर की पार्टी होने के बाद भी सीट बंटवारे के दौरान साफ कर दिया कि JDU, BJP से कम सीटों पर नहीं लड़ेगी. इस तरह उन्होंने अपनी पार्टी को सम्मानजनक सीटें दिलवाईं. - नीतीश कुमार ने ज़ोन बांटकर अपने नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी. जैसे कि मिथिलांचल में संजय झा को ज़िम्मा मिला, पटना के आसपास की ज़िम्मेदारी ललन सिंह को दी - नीतीश कुमार ने अपने परिवार से किसी को भी राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया है. उनके बेटे को बार-बार चुनाव लड़ाने की मांग पार्टी के नेताओं की तरफ से की गई लेकिन इसके लिए वो तैयार नहीं हुए. इस तरह परिवारवाद के मुद्दे पर NDA को लालू परिवार पर निशाना साधने का मौका मिला. नीतीश को लेकर सहानुभूति फैक्टर भी था इस रणनीति का ही नतीजा है कि मतदान के बाद नीतीश कुमार जीत को लेकर निश्चिंत नज़र आ रहे थे. उन्होंने पटना के महावीर मंदिर जाकर आशीर्वाद लिया. हाईकोर्ट के नज़दीक एक दरगाह पहुंचे और पटना साहिब गुरुद्वारा भी गए. यहां आपको ये भी जानना चाहिए कि इस बार के चुनाव में नीतीश को लेकर सहानुभूति फैक्टर भी था. जिस तरह से विपक्ष ने लगातार नीतीश कुमार की बीमारी को मुद्दा बनाया, उससे लोग नाराज़ दिखे. साथ ही लोगों को ये भी लग रहा था कि ये नीतीश कुमार का आख़िरी चुनाव है. इसलिए उनको जिताना चाहिए. महिलाओं को ये भी लग रहा था कि अगर नीतीश मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे तो एक बार फिर बिहार में शराब की बिक्री शुरू हो सकती है. इस डर ने भी महिलाओं को नीतीश के समर्थन में एकजुट किया. महिलाएं नीतीश के लिए ढाल बन गईं. बिहार की सत्ता 2005 से नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. अपने मज़बूत प्रदर्शन से नीतीश कुमार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि न तो वो टायर्ड हैं, न ही रिटायर्ड हैं. यह भी पढ़ेंः राम विलास पासवान, राजा भैया की जमात में शामिल हुईं मैथिली ठाकुर, रच दिया इतिहास
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