बसपा की मौजूदा राजनीति और नेतृत्व के नजरिये पर फिर से गंभीर सवाल उठ रहे हैं. क्या बसपा रास्ते से भटक गई है? ElectionsWithNews18 BattleOf2019
मुझे लगता है, दिवंगत कांशीराम के बाद की बसपा हमेशा ऐसी ही रही है. इसमें ज्यादा बदलाव या सुधार नहीं है. कांशीराम के निधन के बाद वह क्रमशः भटकती गई है. बीते पांच सालों में देश के बहुजन, खासकर दलितों पर अत्याचार और दमन की असंख्य घटनाएं हुईं पर पार्टी का रिस्पांस क्या रहा? एक आधी-अधूरी कोशिश के अलावा बसपा सुप्रीमो सुश्रीराष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के प्रामाणिक आंकड़ों के अनुसार दलितों के खिलाफ अपराध के रेट के मुताबिक मध्य प्रदेश अव्वल रहा, जबकि दलितों पर अत्याचार या उनके खिलाफ अपराध की संख्या के मामले में यूपी सबसे ऊपर रहा.
अचरज की बात है किने इन दोनों प्रदेशों में इस ज्वलंत सवाल पर कभी कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया. कई स्थानों पर बसपा के आम कार्यकर्ताओं ने जब प्रतिरोध शुरू किया तो उन्हें नेतृत्व की तरफ से आंदोलन का रास्ता अपनाने से रोका भी गया. बीते पांच सालों में बसपा सुप्रीमो मायावती ने दलितों पर अत्याचार के प्रतिरोध की एक आधी-अधूरी कोशिश सहारनपुर में की. वह दिल्ली से सड़क मार्ग से सहारनपुर गईं, जब वहां दलितों पर उच्चवर्ण के सामंतों ने मई, 2017 में हमले किए थे. तब वहां स्थानीय स्तर पर काम कर रहे एक दलित-युवा चंद्रशेखर और उसकी ‘भीम आर्मी’ का नाम राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था. उसकी एक सभा के बाद मायावती या बसपा ने उस घटनाक्रम को लेकर कोई पहल नहीं की. कुछ ही समय बाद चंद्रशेखर चंद्रशेखर को ‘एनएसए’ के तहत जेल में डाल दिया गया और वहां के उत्पीड़क सामंतों को छुट्टा छोड़ दिया गया, पर मायावती और उऩकी बसपा की तरफ से कोई पहल नहीं हुई. इसके उलट मायावती कुछ समय बाद चंद्रशेखर के प्रतिरोध अभियान में अपने लिए खतरा देखने लगीं. जेल में बंद चंद्रशेखर को उन्होंने भाजपा का एजेंट कहना शुरू कर दिया, जबकि चंद्रशेखर अपने आपको ‘बसपा का सिपाही’ बताते रहे. उन्होंने एक बार अपनी बिरादरी का हवाला देकर मायावती से ‘खून का रिश्ता’ जोड़ने की कोशिश की तो उन्होंने चंद्रशेखर को झिड़कते हुए कहा कि ऐसे किसी व्यक्ति से मेरा कोई रिश्ता नहीं!अगर राष्ट्रीय राजनीति में दलित-उत्पीड़ित समाज के बड़े मुद्दों पर गौर करें तो हैदराबाद में विश्वविद्यालय के उच्चाधिकारियों के दमन से तंग रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या कोरेगांव-प्रकरण का, मायावती किसी बड़े प्रतिरोध आंदोलन के लिए आगे नहीं आईं. इसके उलट, वह अपनी पार्टी के नेताओं को प्रतिरोध आंदोलन में शामिल होकर अपना ज्यादा वक्त खराब न करने की सलाह देती रहीं. अचरज की बात कि जुलाई, 2017 मे उन्होंने यह कहते हुए राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया कि अब वह दलित-उत्पीड़न के खिलाफ संसद छोड़कर सड़क पर उतरेंगी. पर ऐसा कुछ नहीं दिखा. आंदोलन और जनसभाओं के एक कार्यक्रम की घोषणा भी हुई, लेकिन घोषणा से बात आगे नहीं बढ़ी. वह एक अजीब किस्म की वैचारिकी बुनती रहीं कि बहुजन को संगठन पर जोर देना चाहिए, आंदोलन पर नहीं. बसपा के कई प्रमुख नेताओं के मुताबिक ‘सड़क पर उतरकर आंदोलन करने की वैचारिकी’ को अंबेडकरी-धारा से जोड़ने के लिए नेतृत्व की तरफ से यह भी कहा जाता रहा कि डॉ. अंबेडकर और कांशीराम ने संगठन पर जोर दिया, सड़क पर उतरकर संघर्ष करने या आंदोलन करने पर नहीं! कितनी हास्यास्पद दलील! कौन नहीं जानता कि अंबेडकर ने उस दौर में अपनी सीमित सांगठनिक शक्ति के बावजूद महाराष्ट्र में कितने बड़े-बड़े प्रतिरोध अभियानों का नेतृत्व किया. क्या लोगों को याद नहीं कि स्वयं कांशीराम ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए दिल्ली स्थित बोट-क्लब से बड़ा अभियान शुरू किया था? अगस्त सन् 1984 से शुरू उस अभियान को लगातार छह साल चलाया, परंतु मायावती अपने लखनऊ स्थित भव्य महल से बहुत कम बाहर निकलती हैं. जन अभियान की छोड़िये, संगठन भी आज उनकी प्राथमिकता में नहीं है. अगर बसपा का सांगठनिक विस्तार उनकी प्राथमिकता होता तो दलित समाज में जाटव के अलावा अन्य जातियों और ओबीसी की अत्यंत उत्पीड़ित जातियों के बीच से उभरते नये-नये राजनीतिक समूहों और नेताओं को क्या बसपा में समाहित करने की कोई कोशिश नहीं होती? ऐसा लगता है कि मायावती ने यह मान लिया है कि दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा, खासकर जाटव उनका हमेशा साथ देता रहेगा और इसके बल पर वह यूपी की सियासत में टिकी रहेंगी! लेकिन चंद्रशेखर के उभरने के बाद उन्हें हल्की ही सही एक चुनौती मिलती नजर आ रही है. चंद्रशेखर प्रतिरोध की जमीन से उभरे हैं पर उन्होंने अभी तक अपनी राजनीति का कोई बहुत सुसंगत और वैचारिक चेहरा नहीं दिखाया है, इसलिए उनके बारे में फिलहाल कोई भविष्यवाणी करना ठीक नहीं होगा. कुछ भी निश्चित नहीं कि उनकी राजनीतिक चमक किधर और कहां जाएगी? वह और चमकेगी या जल्दी ही बुझ जायेगी? और भी कई सवाल हैं, क्या कांग्रेस की तरफ मुखातिब होने से भविष्य में उन्हें बड़ा दलित-जनाधार मिलेगा या समस्याएं पैदा होंगी? क्या यूपी में कांग्रेस अपने खत्म हो चुके पारंपरिक सवर्ण-आधार को फिर से वापस लाने पर जोर देगी या दलित-ओबीसी-अल्पसंख्यक गोलबंदी को अपना भावी राजनीतिक एजेंडा बनाएगी? मायावती अपनी कई चुनावी विफलताओं और सांगठनिक निष्क्रियताओं के बावजूद इस बात से आश्वस्त नजर आती हैं कि उनकी बसपा उत्तर भारत में बड़े दलित-जनाधार की इकलौती पार्टी है. सही बात है कि बसपा एक समय बहुजन-आधार की बड़ी पार्टी बनने की तरफ अग्रसर थी, तब उसकी अगुवाई कांशी राम करते थे. संयोगवश, उनकी आज जयंती भी है. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक को हमारी सादर श्रद्धांजलि. उनके निधन के 12 साल बाद उऩकी पार्टी का मौजूदा हाल आज अंदर और बाहर से अच्छा नहीं है. क्या मायावती ने इस सच से कभी साक्षात्कार किया और इसे चुनौती के रूप में लेने का साहस दिखाया? यह बात सही कि उत्तर के हिन्दी भाषी क्षेत्र में में आज भी वह दलितों की सबसे बड़ी पार्टी है पर अपने नाम के मुताबिक वह बहुजनों की बड़ी पार्टी नहीं बन सकी. कांशीराम के निधन के बाद ही उसके बहुजन आधार में दरार पड़ने लगी थी. मायावती अपनी पार्टी को न तो ‘सर्वजन’ की बना पा रही हैं और न ही अपने पहले जैसे बहुजन आधार को बचा पा रही हैं. पिछले दोनों अहम चुनावों- 2014 के संसदीय चुनाव और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में उनका निराशाजनक प्रदर्शन इसके ठोस प्रमाण हैं. संसदीय चुनाव में उसे यूपी से 19.60 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 42.30 और सपा को 22.20 फीसदी वोट मिले थे. सन 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को लगभग 22 प्रतिशत वोट मिले और सीटें आईं 47, जबकि भाजपा के खाते में 312 सीटें और 39.7 फीसदी वोट आए. सन् 2007 के राज्य विधानसभा चुनाव में जब बसपा को सरकार बनाने लायक बहुमत मिला, उसने कुल 30.4 फीसदी वोट और 206 सीटें पाईं. राज्य विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं. याद रहे कि यह चुनाव कांशीराम के निधन के कुछ ही समय बाद हुआ था. पार्टी में न सिर्फ उनकी बहुजन राजनीति की चमक बरकरार थी अपितु संगठन में विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों की नुमाइंदगी भी बेहतर थी, लेकिन आज मायावती की बसपा में ऐसा कुछ भी नहीं बचा है. उसमें न किसी तरह की वैचारिक चमक है और न ही बहुजन के विभिन्न समुदायों की नुमाइंदगी. पार्टी ने चुनाव में उम्मीदवारी का आधार भी बदल दिया है. यह खुला सच है कि चुनावों में बसपा का उम्मीदवार बनने के लिए धन-बल आज एक बड़ा आधार है, राजनीतिक प्रतिबद्धता और जनाधार नहीं. अगर मायावती ने कांशीराम के रास्ते पर चलते हुए काम किया होता तो सिर्फ यूपी ही नहीं, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी वह बड़ी ताकत बनकर उभर चुकी होतीं. लेकिन मध्य प्रदेश में उन्होंने बसपा के पनपते हुए पौधे को स्वयं ही उसकी जड़ों से उखाड़ दिया. वहां बसपा के अध्यक्ष रहे फूल सिंह बरैया सहित अनेक नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया. आज बसपा वहां पूरी तरह बिखर चुकी है. निकाले गये नेता भी कोई वैकल्पिक संगठन नहीं बना सके. हिन्दी पट्टी के सभी प्रदेशों में इस बिखरते दलित आधार पर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, भाजपा की भी नजर है. भाजपा ने आरएसएस के अलग-अलग संगठनों के जरिये कुछ हलकों के आदिवासियों में प्रभाव भी जमाया पर दलितों में उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली. दलितों में भी वह कई सालों से काम कर रही है. उसके पास दलित समाज से आए कई नेता भी हैं पर वे ‘भाजपा के दलित’ हैं, ‘दलित नेता’ नहीं बन सके हैं. इस बीच रोहित वेमुला प्रकरण और फिर कोरेगांव कांड के बाद व्यापक दलित समाज में भाजपा-आरएसएस को लेकर सद्भाव के बजाय आक्रोश नजर आता है. महाराष्ट्र में तो दलित संगठनों ने अल्पसंख्यक समूहों के साथ मिलकर नया गठबंधन कायम किया है. हिन्दी भाषी यूपी सहित कुछ अन्य प्रदेशों में भाजपा ने दलितों की कुछ उपजातियों में अपनी जगह जरूर बनाई है. पर वह बड़े दलित-जनाधार के लिए काफी नहीं है. कांग्रेस ने तो अभी शुरुआत भर की है. देखना होगा, भविष्य में वह दलितों के बीच अपने पुराने आधार की वापसी के लिए किस तरह काम करती है? फिलहाल, बसपा की विचारहीनता और राजनीतिक निष्क्रियता के चलते हिन्दी भाषी प्रदेशों में दलित-राजनीति भटकती नजर आ रही है!
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