संपादकीय: अस्पताल में आग
संपादकीय: अस्पताल में आग जनसत्ता March 26, 2019 3:39 AM AIIMS के ऑपरेशन थिएटर में आग दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को रविवार को फिर बड़े अग्निकांड का सामना करना पड़ गया। ट्रॉमा सेंटर की इमारत में एक आॅपरेशन थिएटर में लगी आग तेजी से फैल गई और देखते ही देखते निचली मंजिल व ऊपरी मंजिल धुएं से भर गर्इं। हालांकि विस्तार से जांच के बाद ही पता चल पाएगा कि आग लगने के पीछे मूल वजह क्या रही, लेकिन माना जा रहा है कि आग शॉर्ट सर्किट से लगी होगी। राहत की बात यह है कि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ। मगर जो नुकसान हुआ है उसका खमियाजा शायद काफी समय तक इलाज कराने आने वालों को ही भुगतना पड़ेगा। आग से आॅपरेशन थिएटरों को भारी नुकसान पहुंचा। फिलहाल स्थिति यह है कि कई उपकरणों के नष्ट हो जाने से आॅपरेशन जैसे काम नहीं हो पाएंगे। ट्रॉमा सेंटर की इस इमारत में भूतल पर छह आॅपरेशन थिएटर हैं। आग से एक आॅपरेशन थिएटर की आॅक्सीजन पाइपलाइन में रिसाव हो शुरू गया था। पता चलते ही सप्लाई की मुख्य लाइन को बंद किया गया। वरना अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह हादसा कितना गंभीर हो सकता था! एम्स की आग यहां की सुरक्षा संबंधी खामियों को उजागर करने के लिए काफी है। जाहिर है, अस्पताल प्रशासन को आग से बचाव के लिए जो जरूरी कदम नियमित रूप से उठाने चाहिए, उसमें कोताही हुई। जिस तरह की सतत निगरानी और चौकसी रहनी चाहिए, वह नहीं थी। आग का पता तब चला जब चारों ओर तेजी से धुंआ फैलने लगा। सवाल है कि क्या आॅपरेशन थिएटरों में अग्निरोधक उपकरण नहीं लगे हैं? अगर हैं तो क्या काम नहीं कर रहे हैं? फायर सेंसर और अलार्म क्यों नहीं बजे? आॅपरेशन थिएटरों में नाइट्रस आॅक्साइड, हीलियम, कार्बन डाइआॅक्साइड और कार्बन मोनो आॅक्साइड जैसी गैसों का उपयोग होता है। हीलियम विस्फोटक गैस होती है। ऐसे में बरती गई इस तरह की लापरवाही की वजह से हालात कितने विस्फोटक हो सकते हैं, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। एम्स में आग की यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले साल भी यहां नर्सिंग कॉलेज की दूसरी मंजिल पर आग लग गई थी। लेकिन लगता है एम्स प्रशासन ने पिछली घटना से कोई सबक नहीं लिया, वरना इस घटना से बचा जा सकता था। ग्निकांड की सबसे ज्यादा घटनाओं के पीछे बड़ा कारण शॉर्ट सर्किट को ही माना जाता है। लेकिन लगता है कि एम्स प्रशासन शॉर्ट सर्किट जैसी घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेता। इमारतों में बिजली की लाइनों और उपकरणों से संबंधित जांच में लापरवाही इस तरह के हादसों को जन्म देती है। भारत में पिछले छह महीनों के भीतर अस्पतालों में दहला देने वाले अग्निकांड हो चुके हैं। कोलकाता में पिछले साल अक्तूबर में देश के दूसरे सबसे पुराने मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आग लग गई थी। इसके बाद दिसंबर में मुंबई के अस्पताल में आग से छह लोगों की मौत हो गई थी और सवा सौ से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। पिछले महीने नोएडा का एक निजी अस्पताल आग की लपटों से घिर गया था। जाहिर है, अस्पतालों में भी अग्नि सुरक्षा के उपायों की घोर अनदेखी की जाती है। मरीज अस्पताल का दरवाजा जान बचाने के लिए खटखटाते हैं, लेकिन अस्पताल जानलेवा साबित हो रहे हैं! Hindi News से जुड़े अपडेट और व्यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App.
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