'असमानता दूर किए बिना कोई देश लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता', CJI ने की बड़ी टिप्पणी

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'असमानता दूर किए बिना कोई देश लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता', CJI ने की बड़ी टिप्पणी
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प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि सामाजिक-आर्थिक न्याय के बिना कोई भी राष्ट्र प्रगतिशील नहीं हो सकता। उन्होंने भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में संविधान की भूमिका पर जोर दिया। जस्टिस गवई ने कहा कि न्याय केवल पुनर्वितरण नहीं है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने और देश के जीवन में समान रूप से भाग लेने में सक्षम बनाना...

पीटीआई, नई दिल्ली। प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई ने बुधवार को कहा कि समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर रखने वाली असमानताओं को दूर किए बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में प्रगतिशील या लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक स्थिरता, सामाजिक सामंजस्य और सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय एक व्यावहारिक आवश्यकता है। 'न्याय कोई अमूर्त आदर्श नहीं है' भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में संविधान की भूमिका विषय पर मिलान में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्याय कोई अमूर्त आदर्श नहीं है। इसे सामाजिक संरचनाओं, अवसरों का बंटवारा और लोगों के रहने की स्थितियों में जड़ें जमानी चाहिए। सीजेआई ने कहा कि यह केवल पुनर्वितरण या कल्याण का मामला नहीं है। यह प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने, पूर्ण मानवीय क्षमता का अहसास करने और देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में समान रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने के बारे में भी है। इस प्रकार किसी भी देश के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय राष्ट्रीय प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यह सुनिश्चित करता है कि विकास समावेशी हो, अवसर समान रूप से वितरित हों और सभी व्यक्ति सम्मान और स्वतंत्रता के साथ रह सकें, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। इस विषय पर भाषण देने के लिए उन्हें आमंत्रित करने के लिए चैंबर आफ इंटरनेशनल लायर्स को धन्यवाद देते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में पिछले 75 वर्षों में भारतीय संविधान की यात्रा महत्वपूर्ण सफलताओं की कहानी है।.

पीटीआई, नई दिल्ली। प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई ने बुधवार को कहा कि समाज के बड़े हिस्से को हाशिए पर रखने वाली असमानताओं को दूर किए बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में प्रगतिशील या लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक स्थिरता, सामाजिक सामंजस्य और सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय एक व्यावहारिक आवश्यकता है। 'न्याय कोई अमूर्त आदर्श नहीं है' भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में संविधान की भूमिका विषय पर मिलान में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्याय कोई अमूर्त आदर्श नहीं है। इसे सामाजिक संरचनाओं, अवसरों का बंटवारा और लोगों के रहने की स्थितियों में जड़ें जमानी चाहिए। सीजेआई ने कहा कि यह केवल पुनर्वितरण या कल्याण का मामला नहीं है। यह प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने, पूर्ण मानवीय क्षमता का अहसास करने और देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में समान रूप से भाग लेने में सक्षम बनाने के बारे में भी है। इस प्रकार किसी भी देश के लिए सामाजिक-आर्थिक न्याय राष्ट्रीय प्रगति का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यह सुनिश्चित करता है कि विकास समावेशी हो, अवसर समान रूप से वितरित हों और सभी व्यक्ति सम्मान और स्वतंत्रता के साथ रह सकें, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। इस विषय पर भाषण देने के लिए उन्हें आमंत्रित करने के लिए चैंबर आफ इंटरनेशनल लायर्स को धन्यवाद देते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करने में पिछले 75 वर्षों में भारतीय संविधान की यात्रा महत्वपूर्ण सफलताओं की कहानी है।

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