प्रियंका गांधी की एंट्री के बाद यूपी में कांग्रेस फ्रंटफुट पर खेल रही है. क्या इससे बसपा बेचैन है? ElectionsWithNews18 BattleOf2019 INCIndia Prakashnw18
-बसपा के रिश्तों की सियासी इबारत लिखी जाएगी. दोनों नेत्रियों के मिलने की यह तस्वीर न सिर्फ बीजेपी की बेचैनी बढ़ा रही थी बल्कि शपथग्रहण समारोह के पारंपरिक फोटो पर भारी भी पड़ी थी. लेकिन यह सियासत है जिसमें रिश्तों के बनते-बिगड़ते देर नहीं लगती.
लोकसभा चुनाव में पहले से अच्छे प्रदर्शन के लिए दोनों पार्टियों अपना-अपना दांव चल रही हैं. जिसमें से कुछ दांवको परेशान करते नजर आ रहे हैं. बताया जाता है कि इसलिए बसपा प्रमुख मायावती कांग्रेस से खासी नाराज हैं. उन्होंने किसी भी राज्य में कांग्रेस से गठबंधन न करने का एलान कर दिया है. सपा-बसपा ने कांग्रेस की पारंपरिक अमेठी और रायबरेली सीटों पर अपने प्रत्याशी न उतारने का फैसला कर दरियादिली दिखाने की कोशिश की थी. दोनों पार्टियों को उम्मीद थी कि कांग्रेस भी इसके बदले में बड़ा दिल दिखाएगी. सपा-बसपा को लग रहा था कि बीजेपी को आउट करने के लिए कांग्रेस गठबंधन की शर्तों पर राजी हो जाएगी. लेकिन कांग्रेस ने 11 प्रत्याशियों के नामों का एलान भी कर दिया. ऊपर से बुधवार को प्रियंका गांधी नेसे हॉस्पिटल में मुलाकात की. दोनों घटनाक्रमों के बाद कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन के बीच तल्खी बढ़ गई है. यह भी आशंका पैदा हो रही है कि गठबंधन अमेठी और रायबरेली में भी अपने प्रत्याशी उतार सकता है. आइए जानते हैं कि आखिर मायावती की कांग्रेस से नाराजगी की क्या वजहें हैः 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' किताब के लेखक अजय बोस के मुताबिक, ‘कांग्रेस और मायावती का वोट बेस लगभग एक ही है. गैर-जाटव दलित वोट पिछले एक दशक में काफी हद तक बीजेपी की तरफ शिफ्ट हुआ है. लेकिन, अब इन दलितों में बीजेपी के खिलाफ थोड़ी नाराजगी है. कांग्रेस अकेले लड़ी तो अब वे उसकी तरफ जा सकते हैं. मायावती को डर है कि कांग्रेस की तरफ गैर-जाटव वोट गया तो धीरे-धीरे जाटव भी जा सकता है. दलित वोट खिसकने का डर नाराजगी की सबसे बड़ी वजह है.’भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर पश्चिमी यूपी के दलितों में बड़े लीडर बनकर उभर रहे हैं. मायावती का मानना है कि चंद्रशेखर का उभार उनकी सियासी जमीन को कमजोर कर सकता है. ऐसे में मायावती ने कभी उन्हें स्वीकार नहीं किया. अब कांग्रेस का चंद्रशेखर पर हाथ रखना उन्हें रास नहीं आ रहा है. इसीलिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की चंद्रशेखर से मुलाकात के कुछ ही घंटे बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मायावती से मुलाकात की. दलितों के अलावा मुस्लिम भी बीएसपी के वोट बैंक के रूप में गिने जाते रहे हैं. यूपी में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद मुस्लिमों का एक तबका सपा के साथ जुड़ गया और दूसरा बसपा के साथ. बसपा मुस्लिमों को अच्छी खासी सीटें भी देती रही है. पश्चिमी यूपी में बसपा की मजबूती का आधार मुस्लिमों का बड़ा समर्थन था. अब बसपा को डर है कि अगर कांग्रेस यूपी में मजबूत हुई तो उसका मुस्लिम वोट बैंक भी उससे छिटक सकता है. बहुजन समाज पार्टी मायावती को पीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करने में जुटी हुई है. बीएसपी को उम्मीद थी कि कांग्रेस उसे इस मामले में सपोर्ट करेगी, लेकिन कांग्रेस ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. कांग्रेस की लीडरशिप का एक धड़ा चाहता है कि राहुल गांधी पीएम बनें. जैसे-जैसे कांग्रेस मजबूत होगी, मायावती के पीएम बनने की उम्मीद धूमिल होती जाएगी. मायावती को कमजोर कांग्रेस सत्ता दिला सकती है न कि मजबूत कांग्रेस. प्रियंका गांधी की एंट्री के बाद यूपी में कांग्रेस फ्रंटफुट पर खेल रही है. इसलिए बसपा में बेचैनी बढ़ रही है.दोनों में नाराजगी की पुरानी वजहें भी हैं. बसपा राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन यूपी को छोड़कर कहीं उसका ज्यादा आधार नहीं है. पार्टी ने कभी रीजनल लीडर नहीं स्थापित होने दिए. बसपा को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सहारे वो छत्तीसगढ़, राजस्थान और एमपी में अपनी जमीन मजबूत कर लेगी. लेकिन कांग्रेस ने बसपा से गठबंधन नहीं किया. मायावती के सपोर्ट के बिना भी कांग्रेस ने इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया. छत्तीसगढ़ में तो उसने बसपा को बड़ा झटका दिया. कांग्रेस ने गुजरात, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के चुनाव में भी मायावती को नाराज किया. कर्नाटक में मायावती ने जेडीएस के साथ गठबंधन किया. बसपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया ने कहा"मायावती जी ने पहले ही कहा था कि सम्मानजनक सीटें मिलेंगी तो ही समझौता होगा. कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात और हिमाचल कहीं भी हमसे समझौता नहीं किया. लेकिन उसे यूपी में अपनी शर्तों पर लोकसभा सीटें चाहिए, जहां वो सबसे कमजोर है. 49 फीसदी वोट वाली पार्टियों के सामने 6 फीसदी वाली कांग्रेस कैसे अपनी शर्तों पर समझौता कर सकती है. दरअसल, कांग्रेस अभी अपने पुराने अहंकार में जी रही है. जबकि उसे वर्तमान हालात के हिसाब से बात करनी चाहिए."
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