यूपी चुनाव 2024: मायावती का मिशन 2027, बसपा के लिए 'करो या मरो' की स्थिति

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यूपी चुनाव 2024: मायावती का मिशन 2027, बसपा के लिए 'करो या मरो' की स्थिति
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2024 से पहले राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। बसपा प्रमुख मायावती ने मिशन-2027 के तहत चुनावी रणनीति शुरू कर दी है, जिसका उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना और घटते जनाधार को वापस लाना है। मायावती ने आगामी चुनाव के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है और भाजपा सरकार पर निशाना साधा है।

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही सियासी हलचल तेज हो गई है। भले ही चुनाव की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन राजनीति क दलों ने अपनी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने दादरी से चुनावी अभियान का बिगुल बजा दिया है, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकास कार्यों के माध्यम से राजनीति क माहौल बनाने में जुटे हैं। सपा और भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) के चुनावी शंखनाद के बाद, बहुजन समाज पार्टी ( बसपा ) की

अध्यक्ष मायावती भी मिशन-2027 के तहत चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं, जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी रंग चढ़ गया है।\अखिलेश यादव की बढ़ती सक्रियता और रणनीति को देखते हुए मायावती ने तत्काल बसपा नेताओं की एक बैठक बुलाई, जिसमें पार्टी संगठन को मजबूत करने और बसपा के घटते जनाधार को वापस लाने के लिए 14 अप्रैल को मिशन-2027 शुरू करने की योजना बनाई गई। उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति में बसपा को लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ रहा है। मायावती का वोट बैंक भी चुनाव दर चुनाव घट रहा है, और कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। इस स्थिति में, बसपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। विपक्षी दलों की नजर बसपा के वोट बैंक पर है, जिसके मद्देनजर मायावती ने जमीनी स्तर पर काम करने की रणनीति बनाई है। अखिलेश यादव की रैली के बाद मायावती ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। अखिलेश यादव ने नोएडा के दादरी से 2027 के चुनाव का बिगुल बजाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। इसके बाद, मायावती भी सक्रिय हो गई हैं, और उन्होंने अचानक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग उठाई है। अखिलेश यादव भी पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने के समर्थन में दिख रहे हैं। मायावती को चिंता है कि अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित, गुर्जर और मुस्लिम मतदाताओं का वोट अखिलेश यादव ने अपनी ओर खींच लिया, तो बसपा के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में टिके रहना मुश्किल हो जाएगा। मायावती 14 अप्रैल को चुनावी हुंकार भरने की तैयारी में हैं।\2027 का विधानसभा चुनाव मायावती और बसपा के लिए 'करो या मरो' की स्थिति जैसा है। मायावती ने संविधान निर्माता और दलित समाज के मसीहा डॉ. भीमराव आंबेडकर का सहारा लेकर 'मिशन-2027' शुरू करने की योजना बनाई है, जिसके लिए राजनीतिक प्रयास भी शुरू कर दिए गए हैं। मंगलवार को मायावती ने अपने नेताओं से स्पष्ट किया कि पार्टी की राजनीति सामाजिक न्याय और संतुलन पर आधारित होगी। इसके अलावा, 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर लखनऊ में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की गई है, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं के शामिल होने की उम्मीद है। इस बार नोएडा के बजाय लखनऊ को कार्यक्रम का केंद्र बनाकर पार्टी ने राज्य की राजनीति में अपनी सक्रियता का संदेश देने की कोशिश की है। माना जा रहा है कि आंबेडकर जयंती पर मायावती अपने समर्थकों को एकजुट कर विपक्षी दलों को अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास कराना चाहती हैं। मायावती ने इंडिया ब्लॉक या किसी अन्य दल के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। बसपा अकेले ही विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इसके लिए आंबेडकर जयंती एक उपयुक्त अवसर माना जा रहा है। यही कारण है कि मायावती ने अपने सहयोगियों को रैली में भीड़ जुटाने का भी काम सौंपा है। मायावती पिछले 20 सालों से हर विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले अपने अभियान की शुरुआत करती रही हैं। इसलिए, 14 अप्रैल को लखनऊ में होने वाली रैली को बसपा के 'मिशन 2027' की शुरुआत माना जा रहा है। बसपा प्रमुख लखनऊ में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को पार्टी की आगामी रणनीति के बारे में जानकारी देंगी और उन्हें विपक्ष के झूठे प्रचार से भी अवगत कराएंगी। इस तरह, मायावती का उद्देश्य बसपा के घटते जनाधार को फिर से मजबूत करना है, क्योंकि सपा से लेकर भाजपा और कांग्रेस तक की नजर उनके वोट बैंक पर है।\उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय के 22 प्रतिशत वोट बैंक पर विपक्षी दलों की निगाहें टिकी हुई हैं। राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव तक दलित वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल ने कांशीराम को 'भारत रत्न' देने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा, जबकि अखिलेश यादव ने कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाया। सपा और कांग्रेस की रैलियों में 'जय भीम' के नारे भी गूंज रहे हैं, जो कभी बसपा की जनसभाओं में लगाए जाते थे। मायावती पर अक्सर भाजपा की बी-टीम होने का आरोप लगता है, क्योंकि वह भाजपा की बजाय कांग्रेस और सपा को निशाना बनाती रही हैं। विपक्ष उन्हें भाजपा के पक्ष में खड़ा करने की कोशिश करता रहा है। इसके परिणामस्वरूप, मुस्लिम मतदाता मायावती से दूर हो गए हैं, और दलितों का एक बड़ा वर्ग भी उनसे अलग हो गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखिलेश के चुनावी अभियान के बाद मायावती ने अपनी राजनीतिक रणनीति बदल दी है। क्या वह भाजपा की बी-टीम होने के आरोप को तोड़ पाएंगी? मंगलवार को पार्टी नेताओं के साथ बैठक के बाद मायावती ने एक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों पर निशाना साधते हुए महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ती जीवन-यापन लागत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी, खासकर गरीब और मेहनतकश वर्ग की कमर तोड़ दी है। उन्होंने सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाया और कहा कि जनता के मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। भाजपा पर हमला करके, मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उनका निशाना केवल सपा और कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा भी होगी। इससे यह स्पष्ट है कि मायावती भाजपा समर्थक होने की छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं ताकि अपने मूल वोट बैंक को बनाए रखा जा सके और घटते जनाधार को वापस लाया जा सके

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