भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.24 के नए निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आरबीआई दोहरे संकट में है। उसे विदेशी मुद्रा भंडार बचाना है और रुपये को और गिरने से रोकना है।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सोमवार को कारोबारी दिन में भारतीय रूपया डॉलर के मुकाबले 95.24 के नए सर्वकालिक निचले स्तर तक फिसल गया था। इस वित्तीय वर्ष की सबसे तेज एक दिन की गिरावट दर्ज होने के बाद अब भारतीय रिजर्व बैंक के सामने दोहरा संकट है, उसे एक तरफ विदेशी मुद्रा भंडार को बचाना है तो दूसरी तरफ रुपये को 95-96 के दायरे से और नीचे नहीं जाने देना है। आरबीआई द्वारा बैंकों की विदेशी मुद्रा पोजीशन पर सख्त कैप भी लगाया लेकिन तेल कंपनियों और बड़े आयातकों की भारी डॉलर मांग ने सारी राहत पर पानी फेर दिया है। इससे सवाल उठ खड़ा हुआ है कि स्थिरता लाने के लिए केंद्रीय बैंक को अब बाजार में आखिर कितना डॉलर खर्च करना पड़ेगा। 2013 से आज के समय की तुलना विशेषज्ञों की मानें तो आरबीआइ को वह सब कुछ करना चाहिए, जिससे रुपये में और ज्यादा गिरावट होने से बचाया जा सके। इस संबंध में एसबीआइ रिसर्च की ताजी रिपोर्ट में मौजूदा गिरावट की तुलना वर्ष 2013 के हालात से की गई है। इसमें कहा गया है कि तब रुपये में बहुत ही तेज गिरावट हुई थी लेकिन उस समय देश की घरेलू इकॉनमी की स्थिति बहुत ठीक नहीं थी और विदेशी मुद्रा भंडार भी ज्यादा नहीं था। आज इन दोनों मोर्चों पर स्थिति बेहतर है। इसके बावजूद रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। चूंकि अभी डॉलर की मांग घरेलू तेल कंपनियों की तरफ से काफी हो रही है लिहाजा एसबीआइ की सलाह है कि उन्हें विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने के लिए विशेष विंडो उपलब्ध कराया जाए। तेल कंपनियां रोजाना 25 से 30 करोड़ डॉलर की मांग करती है जो सालाना 75-80 अरब डॉलर बनता है। इस मांग को सामान्य बाजार से अलग करने से रुपये पर दबाव कम होगा और बाजार को सच्ची मांग-आपूर्ति की बेहतर विजिबिलिटी मिलेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पास 10 महीने से अधिक के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा भंडार है। 700 अरब डॉलर से अधिक का रिजर्व काफी मजबूत है। ऐसे में आरबीआइ को रुपये को संभालने के लिए बाजार में आक्रामक तरीके से हस्तक्षेप करने से नहीं हिचकिचाना चाहिए। वैसे आरबीआई ने रुपये की तेज गिरावट को थामने के लिए हाल के महीनों में भारी हस्तक्षेप किया है। मार्च 2026 के पहले तीन हफ्तों में ही केंद्रीय बैंक ने बाजार में 30 अरब डॉलर से अधिक बेचे, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय कमी आई। अप्रैल 2025 से अब तक पूरे वित्त वर्ष में आरबीआई ने कुल 40-50 अरब डॉलर नेट डॉलर बेचे हैं। विशेष रूप से जनवरी 2026 में अकेले 25.
47 अरब डॉलर बेचे गए। इस लगातार डॉलर बिक्री के बावजूद रुपया 95.24 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जिससे साफ है कि बाजार में दबाव इतना अधिक है कि आरबीआई के बड़े हस्तक्षेप के बावजूद स्थिरता लाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। पश्चिम एशिया विवाद के शुरू होने के बाद की भारतीय मुद्रा बाजार की स्थिति को देखें तो साफ होता है कि डॉलर के सापेक्ष रुपया 4.2 फीसद कमजोर हुआ है। ब्रिटिश पाउंड, चीनी युआन और इंडोनेशियाई रुपया को छोड़कर दुनिया की अन्य प्रमुख मुद्राओं की तुलना में रुपया सबसे अधिक गिरा है। इस दौरान यूरो, ब्राजीलियन रियल, दक्षिण अफ्रीकी रैंड, थाई बाह्ट, मलेशियन रिंग्गित, पोलिश ज्लोटी, रूसी रूबल, फिलीपींस पेसो, साउथ कोरियन वॉन और जापानी येन जैसी प्रमुख मुद्राओं की तुलना में रुपये की गिरावट कहीं अधिक रही। यह भी पढ़ें- युद्ध के बीच 4 शेयरों ने महीनेभर में 47% तक का क्रैश झेला, पर मुनाफा है तगड़ा; क्या पैसा लगाने का है सही समय?
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