करते हैं प्यार और पढ़ना चाहते हैं प्रेम कविताएं तो काव्य संकलन एकरंगा आपके लिए ही है...
पेशे से टेलीविजन पत्रकार कुमार विनोद का काव्य-संकलन 'एकरंगा' जब हाथ आया तो सबसे पहले जिस चीज ने ध्यान खींचा, वह था इस किताब का चटकीला कवर. पीले धूसर, काले, सफेद और लाल रंगों के संयोजन से अनु प्रिया की मनभावन चित्रकारी वाला बेहद आकर्षक कवर.
किताब की डिजाइन भी अलग थी. अनु प्रिया के रेखाचित्र किताब के अंदर भी कई पन्नों पर अंकित थे. कुमार विनोद को बतौर कवि, लेखक या पत्रकार पहले से जानता न था, इसलिए उनको व्यक्त करने के लिए उनके इस संकलन 'एकरंगा' के अलावा कोई दूसरी जानकारी न थी. किताब को पलटा तो जिस दूसरी चीज ने चौंकाया वह था हमारे दौर की चर्चित कथाकार मैत्रेयी पुष्पा की एकरंगा पर लिखी भूमिका. मैत्रेयी पुष्पा मूलतः कथाकार हैं, हालांकि उनका 'लकीरें' नाम से एक कविता-संकलन भी आया था, पर वह अपने को कविता पाठ तक सीमित रखकर अपनी कथाविधा से तुष्ट रहने वाली लेखिका हैं. जीवन की कुरीतियों और स्त्री पर किसी भी तरह के बंधन की विरोधी रचनाकार के विचारों को प्रेम कविताओं के संकलन पर पढ़ना रोचक लगा. 'एकरंगा' उठाया और एक ही बार में पढ़ गया. यह संयोग ही है कि जिस पहले काव्य-संकलन को एक ही सीटिंग में ही पढ़ा था, वह था प्रख्यात ओड़िया कवि रमाकांत रथ का खंडकाव्य 'श्री राधा'. कृष्ण और राधा के प्रेम का अद्भुत आख्यान 'श्रीराधा'. रथ को इस किताब के लिए प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान मिला था. तो क्या 'एकरंगा'.. मैत्रेयी पुष्पा ने संग्रह के बारे में 'प्रेम न बाड़ी उपजै...' शीर्षक से अपनी बात रखते हुए प्रेम पर एक व्याख्यान सा दे डाला है. शुरू से आखिरी तक उनकी बातें कुछ यों हैं. 'मेरे सामने कविताएं हैं. कविता, जिसे मैं हृदय की अभिव्यक्ति मानती हूं, क्योंकि यह कवि के अंतःस्थल से उठती है. क्रौंच वध पर महर्षि वाल्मीकि की काव्यमय प्रतिक्रिया, प्रसाद की 'मादक थी मोहमयी थी दिल बहलाने की क्रीड़ा; अब हृदय हिला देती है वह मधुर प्रेम की पीड़ा' और सुमित्रा नंदन पंत की 'वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान; निकलकर नयनों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान....' का जिक्र करते हुए वह पूछती हैं कि क्या कविता वियोग में ही समाहित रहती है? क्या मधुर मिलन की कविताएं नहीं लिखी गईं? फिर वह उत्तर देती सी खुद लिखती हैं, मिलन नहीं तो बिछोह भी संभव नहीं. प्रेम दोनों में अथाह होता है....' फिर इस संकलन के नाम और कविताओं का उल्लेख करते हुए वह निष्कर्ष सा देती हैं, ' आज इस दुनिया में जहां नफरत का बोलबाला है, आदमी घृणा का शिकार है, स्त्री दोयम दर्जे पर गिनी जाती है, ऐसे भीषण समय में कुमार विनोद प्रेम से भरी आवाज लगाते हैं, प्यार की तड़प से रूबरू कराते हैं. और, फिर तलाश-दर-तलाश प्रेम का यही अमृत तो चाहिए नफ़रत में जलते- मरते लोगों के लिए ताकि उनको मनुष्य की तरह बचा लिया जाये. यह मुख्यतः प्रेम को अक्षुण्य रखने वाला कविता संग्रह, एक जरूरी किताब है.' क्या वाकई ऐसा है? इसके लिए आपको संकलन पढ़ना होगा. 'एकरंगा' में 118 पृष्ठ हैं. पांच खंडों में इन शीर्षकों - 1. अंतहीन, तुम्हारे रंग में, बने रहने की संभावना, 2. मन के मौन में तुम, 3. औरों के लिए, न होना भी...तुम्हारे लिए जीना, 4. मुझे तुमारा शीर्षक नहीं बनना था, फिर भी... 5. अंत में, तुम्हारा दिया, एकांत में कुल 87 कविताएं हैं. इन कविताओं को लिखने में उन्हें एक लंबा अरसा लगा. डायरी में नोट्स की शक्ल से प्रकाशकों तक पहुंचने के बाद उन्हें प्रशंसक भी मिले और आलोचक भी. पर इन सबसे इतर वह रचते गए...बिना किसी साकार प्रेमिका के एक प्रेम काव्य. 'एकरंगा' कई मायनों में अन्य संकलनों से अलग है. इस संकलन की 'रहने दूं बेनाम' कविता की शुरुआती पंक्तियां हैँ - 'सुनो, अब पूछने लगे हैं/ सब तुम्हारा नाम/ पूछते हैं कौन है वो/ जो तुम्हारे शब्दों के आवेग में/ बहता चला जाता है पानी की तरह... 'एकरंगा' में कुमार विनोद की ऐसी ही बहुतेरी उम्दा पंक्तियां दिखती हैं. पर कवि के दावे से अलग सभी प्रेम कविताएं ही हों ऐसा नहीं है. कुछ कविताएं बेहद अच्छी तो कुछ सामान्य, और कुछ उससे भी कम. यों किसी भी कवि की सभी रचनाएं एक ही स्तर की हों, यह संभव नहीं. कुमार विनोद इसे स्वीकारते भी हैं. पर संग्रह को पूरा करने की हड़बड़ी में उन्हें ऐसे संयोजन से बचना चाहिए था. कहीं-कहीं प्रूफ की खामियां भी हैं. बावजूद इन सीमाओं के 'एकरंगा' पाठकों के साथ-साथ आलोचकों का ध्यान खींचने में सक्षम है.पृष्ठ संख्याः 118
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