सूफ़िया-ए-किराम हों या पीर-फ़क़ीर, दरवेश हों या साधू-संत सब अपने-अपने पीर-ओ-मुर्शिद और ख़ुदा से रिश्ता क़ायम करने के लिए इश्क़ पर ज़ोर देते हैं. इश्क़ के अनेक रंगों में एक रंग होली का है.
फाग, फगुआ और फागुन की मस्ती से हम सब वाक़िफ़ हैं. फाग-गीत के संग होली की मस्ती का आलम हर जगह कम-ओ-बेश एक सा होता है. चेहरे और मन की इस रंगीनी को ख़ास नज़र से देखिए तो महसूस होगा कि इंसान हर तरह के भेदभाव और ऊंच-नीच से अलग इंसानी अज़मत के तराने पर रक़्स करने वाला मासूम-सा बच्चा है.
मुझे रंगों के इस पर्व से इश्क़ है लेकिन हमारे चरित्र की तरह रंगों का ज़ायक़ा भी तब्दील होता रहता है, इसलिए रंगों की मस्ती में कुछ ऐसा भी हो जाता है जो इसके मिज़ाज के ख़िलाफ़ है. होली की मस्ती के बहाने हमारे अपने चरित्र का छोटापन जब भी सामने आता है, मुझे दुख होता है कि ये पर्व धर्म और मज़हब से कहीं आगे हमें इश्क़-ओ-आशिक़ी और उल्फ़त-ओ-मोहब्बत के धागे में बांधता है. फाग और फगुआ की अपनी-अपनी रिवायत है. मेरी बस्ती में भी फाग-गीत का जादू सर चढ़ कर बोलता है. मैथिली ज़बान की मिठास और विद्यापति के बारामासा से शायद आप भी वाक़िफ़ हों, हालांकि बिहार में फाग-गीत के लिए बेतिया-राज के महाराज नवल किशोर को एक ख़ास तरह की शोहरत हासिल है. असल में ईद की तरह होली भी मुझे बस्ती की याद दिलाती है, तो उसी वक़्त ये याद आता है कि बस्ती के शिव जी भाई, उनकी पत्नी और निर्मल बहन जो अब इस दुनिया में नहीं रही, उन सब को अपने बचपन में कैसे हसरत भरी निगाह से होली खेलते देखता था और बड़े-बुज़ुर्गों की इस नसीहत से कांप जाता था कि अगर कहीं रंग लग गया तो अल्लाह मियां जिस्म का वो हिस्सा काट लेंगें. लेकिन आसमानी जन्नत के लालच से जी कब बहलता था सो रू-ए-ज़मीन ही जन्नत हो जाती थी और ज़रा सी डांट-फटकार के बाद हम अपने अल्लाह मियां को राज़ी करने में जुट जाते थे. जी में आता है कि यादों की इस होली में आप सब को शरीक करूं लेकिन आज मुझे उस होली पर बात करनी है जो उर्दू साहित्य और उर्दू कल्चर का हिस्सा है सो यादों की होली को अगले वक़्तों के लिए उठा रखता हूं. उर्दू शाइरी और होली के बारे में जब भी कहीं कुछ पढ़ने का मौक़ा मिला, हर जगह यही बात नज़र आई कि होली हिंदुओं का पर्व है. बात सही भी है लेकिन मुझे इस में कुछ कमी महसूस होती थी. फिर बराह-ए-रास्त उर्दू शाइरी को पढ़ा तो एहसास हुआ कि भले ये मज़हबी तौर पर हिंदुओं का पर्व है लेकिन ये अपनी मज़हबी पहचान में बंद नहीं है. हो भी क्यों कि इश्क़ ही इस का मज़हब है.हों या सैयद अब्दुल्ला शाह क़ादरी उन सब के कलाम में होली का रंग ख़ूब नुमायां और गहरा है. होली को यूं तो मौसम के बदलने का प्रतीक भी माना जाता है, लेकिन ये इश्क़ और इश्क़-रंग में डूब जाने की कैफ़ियत का नाम है. क्या बादशाह और क्या फ़क़ीर सब के दिलों में इश्क़ और सिर्फ़ इश्क़ का जाप होता है. होली की मस्ती और इश्क़ की कैफ़ियत से उर्दू शाइरी की हर किताब रौशन है. आप कहीं से कोई किताब उठा लीजिए आंखों में रंगीन नज़ारे तुलूअ’ हो जाएंगे.देखो कुंवर जी दूंगी गारीहोली होए रही है अहमद जिया के द्वारऔर अपने बुल्ले शाह का क्या कहना कि वो अपने पीर-ओ-मुर्शिद के साथ इस तरह होली खेलते नज़र आते हैं कि,जो सखी होवे फ़ना-फ़ी-अल्लाहये है सूफ़िया-ए-किराम की होली, जहां इश्क़ ही मज़हब है और इश्क़ ही दीन-ओ-ईमान है. वैसे ये बातें यूं ही बरा-ए-बैत हैं. असल में कहना ये है कि होली की अपनी धार्मिक मान्यताओं से अलग भी होली के रंगों का एक प्रेम-इतिहास है और शायद ये सूफ़ी-संतो की इश्क़-रंग होली का फ़ैज़ ही हो कि हिंदुस्तान में एक-दूसरे के पर्व-त्योहार और मेलों-ठेलों में शिरकत की ख़ूबसूरत कहानियां जा-ब-जा मिल जाती हैं. हिंदुस्तान में मुग़लिया-होली का प्रेम-इतिहास भी रोमांचित करता है और ये महसूस होता है कि हम अपने सपनों के जहां की सैर कर रहे हैं. कहते हैं अपने समय का मुग़लिया-हिंदुस्तान दिवाली में जश्न-ए-चराग़ां करता था और होली में अबीर-ओ-गुलाल से लालों-लाल हो जाता था . इसी तरह राखी और सलोनो की ख़ूबसूरत और ख़ूबसीरत कहानियां मिल जाती हैं. दिल्ली के ही एक मुसलमान शाइर के बारे में किताबों में लिखा है कि वो होली के दिन गली-गली फिरते थे और दफ़ बजा कर अपना कलाम पढ़ते थे. किताबों की बात चली है तो शायद आप ने भी ये पढ़ा हो कि जहां अकबर-ए-आज़म रंगों के तालाब में डुबकी लगा कर होली मनाते थे, वहीं जहांगीर अपनी किताब तुज़्क-ए-जहांगीरी में न सिर्फ़ होली की महफ़िलों का ज़िक्र करता है बल्कि रंगों की मस्ती से भी सरशार नज़र आता है. गोवर्धन जैसे महान मुग़लिया चित्रकारों की चित्र-कला में भी जहांगीर अपनी मलिका नूरजहां के साथ होली खेलता नज़र आता है. गोवर्धन की कला के कुछ नमूने हमारे सामने हैं, लेकिन दुनिया भर के क़ुतुबख़ानों और म्यूज़ियम के अलावा रामपुर रज़ा पुस्तकालय में भी गोवर्धन-कला के वो पन्ने महफ़ूज हैं जो हमारे प्रेम-इतिहास और उस की साझी विरासत का हवाला हैं. होली और मुग़लिया-हिंदुस्तान की बात हो रही हो तो शाहजहां का ज़िक्र भी ज़रूरी हो जाता है कि शाहजहांनी दौर में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-पाशी के नाम से भी जाना जाता था. इन बातों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैसे कोई उत्सव और पर्व-त्योहार मज़हब से ज़्यादा इंसान के इश्क़-ओ-मोहब्बत के जज़्बे को बेदार करता है.उर्दू जर्नल तहज़ीब-उल-अख़लाक़ के एक अंक के पेश-ए-नज़र कई लोगों ने लिखा है कि बहादुर शाह ज़फ़र होली में अपनी पेशानी पर अबीर-ओ-गुलाल लगवाते थे, और उनकी ये रचना दिल्ली की गलियों में गाई जाती थी,इसी बात को कुछ लोगों ने इस तरह भी लिखा है कि बहादुर शाह ज़फ़र अपने हिंदू वज़ीरों से पेशानी पर अबीर-ओ-गुलाल लगवाते थे और ख़ास तरह से दरबार सजवाते थे. उर्दू के पहले अख़बार जाम-ए-जहां-नुमा के एक अंक के मुताबिक़ ज़फ़र के ज़माने में होली के लिए ख़ुसूसी इंतिज़ाम इस तरह किए जाते थे कि टेसू/तीसू के फूल से तैयार ज़र्द यानी पीला रंग एक-दूसरे को लगाया जाता था. इसके लिए धात, शीशा और लकड़ी की पिचकारियां इस्तेमाल की जाती थीं. होली की इस तहज़ीब पर कौन अश-अश नहीं करेगा कि बादशाह सलामत पर भी लाल और ज़र्द रंग डाला जाता था. मोहम्मद शाह रंगीला के हवाले से कई जगहों पर इस बात की चर्चा की गई है कि उस समय की चित्रकला में उन को अपनी मलिका के साथ होली खेलते दिखाया गया है. कुल मिलाकर उस वक़्त की होली का आलम ये था कि जब गहनों से लदी-फंदी लड़कियां रक़्स करती थीं और होली-गीत गाते हुए लाल-क़िले के क़रीब से गुज़रती थीं तो पर्दानशीं शहज़ादियों पर भी होली की मस्ती का रंग चढ़ने लगता था.
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