आशा की जा रही थी कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीरी हिंदू अपने घरों को लौट सकेंगे लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी ऐसी स्थितियां नहीं बन पा रही हैं। घाटी में कश्मीरी हिंदुओं की वापसी के लिए भारत सरकार को भले ही उन्हें किसी छावनी परिसर में बसाना पड़ता या उनके लिए विशेष क्षेत्र बनाना पड़ता उसे ऐसा करना चाहिए...
राजीव सचान। पिछले दिनों दिल्ली के सीलमपुर इलाके में एक किशोर की हत्या ने सारे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा, क्योंकि इस घटना के बाद कई स्थानीय लोगों ने अपने घरों पर ऐसे पोस्टर लगाए-हिंदू पलायन कर रहा है, ये मकान बिकाऊ है, योगी जी मदद करो.
.। ऐसे पोस्टर लगने के बाद सनसनी फैलनी ही थी। सीलमपुर में मीडिया का जमावड़ा भी पहुंचा और नेताओं एवं पुलिस अधिकारियों का अमला भी। इलाके में पुलिस की तैनाती भी बढ़ाई गई, क्योंकि तनाव की स्थिति थी। आखिर क्या कहते हैं सीलमपुर के ये पोस्टर? क्या यहां रहने वालों की लाचारी या फिर पुलिस और कानून के शासन के प्रति भरोसे में कमी? इन पोस्टरों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उल्लेख तो यही इंगित करता है कि सीलमपुर के लोगों को दिल्ली पुलिस और यहां के शासन पर भरोसा नहीं। सीलमपुर के मामले को अपवाद नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कुछ ही समय पहले ब्रह्मपुरी नामक मोहल्ले में ऐसे ही पोस्टर लगाए गए थे, क्योंकि मस्जिद के विस्तार को लेकर सांप्रदायिक तनाव फैल गया था। ब्रह्मपुरी और सीलमपुर जैसे मामले इसलिए बेहद चिंताजनक हैं, क्योंकि वे सुदूर इलाके नहीं, देश की राजधानी के मोहल्ले हैं। सीलमपुर से संसद और सुप्रीम कोर्ट की दूरी तो दस किलोमीटर भी नहीं है। यदि देश की राजधानी में एक तरह से संसद एवं सुप्रीम कोर्ट की नाक के नीचे रहने वालों के मन में कानून के शासन के प्रति ऐसा अविश्वास हो सकता है तो कल्पना की जा सकती है कि दूर-दराज के इलाकों में क्या स्थिति होगी? यह कल्पना करना इसलिए कठिन नहीं, क्योंकि वक्फ कानून विरोधियों की आतंक पैदा करने वाली हिंसा के भय से मुर्शिदाबाद से जो लोग मालदा भागने को मजबूर हुए, वे लौटने को तैयार नहीं। एक झटके में अपने ही देश में शरणार्थी बन गए इन अभागे लोगों का कहना है कि वे तभी लौटेंगे, जब वहां सीमा सुरक्षा बल के जवानों को स्थायी रूप से तैनात किया जाएगा। क्या ऐसा किया जाएगा? क्या मुर्शिदाबाद से मालदा भागे लोग अपने घरों को लौट सकेंगे? पता नहीं, क्योंकि समस्या केवल यह नहीं कि मुर्शिदाबाद से भागे लोगों को बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं। समस्या यह भी है कि इन लोगों ने वक्फ कानून के विरोध में उतरी हिंसक भीड़ के हाथों पुलिस की पिटाई भी देखी है। हिंसा पर आमादा इस भीड़ ने पुलिस के वाहनों को आग लगा दी थी और उन पर इतने बम फेंके थे कि पुलिस वालों को जान बचाकर भागना पड़ा था। इस हिंसा में दस पुलिसकर्मी घायल हुए थे। जो पुलिस अपनी रक्षा करने में समर्थ न हो, वह भला यह दिलासा कैसे दे सकती है कि वह आम लोगों की सुरक्षा करने में समर्थ होगी? मकान बिकाऊ है..के जैसे पोस्टर दिल्ली के सीलमपुर मोहल्ले में लगे, वैसे देश के अन्य हिस्सों में रह-रहकर लगते रहते हैं। निःसंदेह हर बार मामला गुंडों-दबंगों की अराजकता का नहीं होता। कई बार अपनी सामान्य समस्याओं से आजिज आए लोग शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी ऐसे पोस्टर लगा देते हैं, लेकिन ऐसे कुछ मामलों के आधार पर सभी मामलों की अनदेखी नहीं की जा सकती। पिछले एक दशक में मकान बिकाऊ है.. के पोस्टरों ने सबसे अधिक सनसनी तब पैदा की थी, जब 2016 में मुजफ्फरनगर के कैराना से कई हिंदू परिवारों के पलायन करने की खबर आई थी। ये परिवार अपने घरों पर मकान बिकाऊ है... के पोस्टर चस्पा कर गए थे। पहले तो इस खबर का खंडन-मंडन करने की कोशिश हुई, लेकिन आखिरकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक टीम ने अपनी जांच में माना कि बेलगाम अराजक तत्वों के भय से कई हिंदू परिवार सचमुच अपने घर छोड़ गए हैं। योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही ऐसे परिवार अपने घरों को लौट सके, लेकिन ऐसे उदाहरण कम ही हैं, जब अराजकता, उत्पीड़न के चलते पलायन कर गए लोग अपने घरों को लौट सके हों। इसका कारण यह है कि ऐसे मामलों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। प्रायः लोगों को समझा-बुझाकर शांत करने और इलाके में फौरी तौर पर सुरक्षा बढ़ाकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। जरूरी यह है कि ऐसी घटनाओं पर शासन-प्रशासन उदाहरण पेश करने वाली कार्रवाई करे, ताकि देश में कहीं भी कोई भी किसी की भी अराजकता के भय से अपना घर-बार छोड़ जाने के लिए विवश न हो। जब ऐसा होता है तो पीड़ित लोग नहीं, कानून का शासन लाचार साबित होता है। आतंक पैदा करने वाली अराजकता के खिलाफ उदाहरण पेश करने का सबसे पहला काम कश्मीर में किया जाना चाहिए था, जहां से लाखों कश्मीरी हिंदू आतंकियों के भय से अपना घर-बार छोड़ने को बाध्य हुए थे। यह उदाहरण न तो मनमोहन सरकार पेश कर सकी और न ही मोदी सरकार। आशा की जा रही थी कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीरी हिंदू अपने घरों को लौट सकेंगे, लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी ऐसी स्थितियां नहीं बन पा रही हैं। घाटी में कश्मीरी हिंदुओं की वापसी के लिए भारत सरकार को भले ही उन्हें किसी छावनी परिसर में बसाना पड़ता या उनके लिए विशेष क्षेत्र बनाना पड़ता, उसे ऐसा करना चाहिए था। अब भी करना चाहिए। इससे आतंकियों को यह आवश्यक संदेश जाएगा कि वे भारत के कानून को चुनौती नहीं दे सकते। अराजक तत्व लोगों को पलायन के लिए मजबूर करके भारत राज्य पर ही चोट नहीं करते, वे लोगों को उस माहौल में ले जाते हैं, जिसे आज की भाषा में जंगलराज कहते हैं।
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