चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार होने साथ एक प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। हालांकि बांग्लादेश चीन और भारत के बीच संबंधों को संतुलित करने की बात करता है पर तटीय बांग्लादेश में चीनी-वित्तपोषित बुनियादी ढांचा विशेषकर मोंगला पोर्ट और मुंशीरहाट के पास चीन की मजबूत रणनीतिक उपस्थिति भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए सकारात्मक नहीं कही...
डा. अभिषेक श्रीवास्तव। भारत-बांग्लादेश के बीच रणनीतिक-सांस्कृतिक-व्यापारिक संबंधों का एक लंबा इतिहास रहा है। भारत की न सिर्फ बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका थी, बल्कि उसके आर्थिक और लोकतांत्रिक विकास में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद से बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख बने मोहम्मद यूनुस बांग्लादेशी चरमपंथियों के साथ मिलकर इन ऐतिहासिक संबंधों को कमजोर कर रहे हैं। वह भारतीय हितों की अनदेखी कर इस क्षेत्र में नई भूराजनीति को हवा दे रहे हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश की नई करवट ले रही विदेश नीति में ढाका की इस्लामाबाद और बीजिंग से बढ़ती ‘नई दोस्ती’ भारत के रणनीतिक हितों की दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना है। खासकर रणनीतिक रूप से संवेदनशील सिलीगुड़ी कारिडोर के संबंध में, जिसे अक्सर ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। सिलीगुड़ी कारिडोर उत्तरी बंगाल में भूमि की एक 22 किलोमीटर चौड़ी पट्टी है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती है। यह नेपाल, बांग्लादेश और भूटान से घिरा हुआ है और चीन नियंत्रित तिब्बत के करीब है। इस कारिडोर में होने वाली किसी भी घटना को भारत राष्ट्रीय अखंडता और सामरिक दृष्टि से सीधे खतरे के रूप में देखता है। इस ‘चिकन नेक’ से 100 किलोमीटर से भी कम दूरी पर मुंशीरहाट स्थित है, जो भारत की सीमा के पास बांग्लादेश के खुलना डिविजन में स्थित है। खबर है कि हाल में वहां चीन ने बुनियादी ढांचागत विकास के नाम पर अपना एक नया रक्षा केंद्र खोला है। मुंशीरहाट एक ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में आता है, जहां कोई भी विदेशी उपस्थिति भारत के लिए रणनीतिक रूप से खतरनाक होती है। गत वर्ष नेतृत्व संभालने के बाद से मोहम्मद यूनुस ने चीन के साथ बांग्लादेश के संबंधों को गहरा करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किया है। पिछले दिनों बीजिंग यात्रा के दौरान मोहम्मद यूनुस ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की, जिसमें चीनी ऋणों पर ब्याज दरों में कमी और बांग्लादेश में चीनी विनिर्माण इकाइयों का स्थानांतरण शामिल है। हाल में चीन ने भी व्यापक निवेश और सैन्य सहयोग के माध्यम से बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति का काफी विस्तार किया है। यह चीन की व्यापक ‘स्ट्रिंग आफ पर्ल्स’ रणनीति का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारत को चीनी-मित्र राज्यों और सामरिक संपत्तियों के नेटवर्क से घेरना है। उल्लेखनीय रूप से बांग्लादेश में पनडुब्बी बेस के निर्माण से उसकी नौसैनिक क्षमताएं बढ़ी हैं और बंगाल की खाड़ी में उसकी रणनीतिक पहुंच का विस्तार हुआ है। इसके अतिरिक्त चीन ने बांग्लादेश में विभिन्न परियोजनाओं में 25 अरब डालर से अधिक का निवेश किया है, जिससे वह उसका एक प्रमुख आर्थिक भागीदार बन गया है। बांग्लादेश में चीनी ऋणों द्वारा वित्तपोषित पद्मा ब्रिज रेल लिंक, मोंगला पोर्ट एवं दक्षिण-पश्चिमी जिलों के बीच संपर्क मार्ग का निर्माण और बंगाल की खाड़ी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग अभ्यास में वृद्धि ढाका तथा बीजिंग की नई रणनीतिक साझेदारी का प्रमाण है। चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार होने साथ एक प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। हालांकि बांग्लादेश चीन और भारत के बीच संबंधों को संतुलित करने की बात करता है, पर तटीय बांग्लादेश में चीनी-वित्तपोषित बुनियादी ढांचा, विशेषकर मोंगला पोर्ट और मुंशीरहाट के पास चीन की मजबूत रणनीतिक उपस्थिति भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए सकारात्मक नहीं कही जा सकती है। यही कारण है कि दक्षिणी बांग्लादेश में चीनी फर्मों से जुड़ी हाल की सड़क संपर्क और अंतरदेशीय जलमार्ग परियोजनाओं पर भारत ने चिंता जाहिर की है। बांग्लादेश को सबक सिखाने के लिए भारत ने उसे अपनी जमीन के जरिये कारोबार करने की दी गई सुविधा वापस ले ली है। इसके जरिये भारत ने बांग्लादेशी निर्यात को अपनी भूमि के माध्यम से किसी तीसरे देश में जाने की अनुमति दी थी। इस सुविधा के खत्म होने से बांग्लादेश के व्यापार, विशेष रूप से रेडीमेड कपड़ों के निर्यात में बाधा उत्पन्न होने के साथ लागत में वृद्धि हो सकती है। हाल में हुए बैंकाक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मोहम्मद यूनुस से मुलाकात की। बातचीत में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी बयानबाजी से बचने के महत्व पर जोर दिया, जो द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना सकती है। साथ ही उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समूहों, विशेष रूप से हिंदुओं के खिलाफ हिंसक व्यवहार पर चिंता व्यक्त की तथा अत्याचारों की गहन जांच की वकालत की, परंतु उस पर इन कदमों का क्षणिक प्रभाव होगा। ऐसा संभव है कि भारत का यह कदम बांग्लादेश को चीन के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए प्रेरित करे। ऐसे में भारत को अपनी रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करते हुए एक दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी जिससे अपने पड़ोस में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके, क्योंकि जिस प्रकार से महाशक्तियां बंदरगाहों, गलियारों और डिजिटल बुनियादी ढांचे के माध्यम से दूसरे देशों पर प्रभाव डालती हैं, उसी प्रकार बांग्लादेश की दक्षिण-पश्चिमी सीमाएं उभरती हुई इंडो-पैसिफिक प्रतिद्वंद्विता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।.
डा. अभिषेक श्रीवास्तव। भारत-बांग्लादेश के बीच रणनीतिक-सांस्कृतिक-व्यापारिक संबंधों का एक लंबा इतिहास रहा है। भारत की न सिर्फ बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका थी, बल्कि उसके आर्थिक और लोकतांत्रिक विकास में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद से बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख बने मोहम्मद यूनुस बांग्लादेशी चरमपंथियों के साथ मिलकर इन ऐतिहासिक संबंधों को कमजोर कर रहे हैं। वह भारतीय हितों की अनदेखी कर इस क्षेत्र में नई भूराजनीति को हवा दे रहे हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश की नई करवट ले रही विदेश नीति में ढाका की इस्लामाबाद और बीजिंग से बढ़ती ‘नई दोस्ती’ भारत के रणनीतिक हितों की दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना है। खासकर रणनीतिक रूप से संवेदनशील सिलीगुड़ी कारिडोर के संबंध में, जिसे अक्सर ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। सिलीगुड़ी कारिडोर उत्तरी बंगाल में भूमि की एक 22 किलोमीटर चौड़ी पट्टी है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती है। यह नेपाल, बांग्लादेश और भूटान से घिरा हुआ है और चीन नियंत्रित तिब्बत के करीब है। इस कारिडोर में होने वाली किसी भी घटना को भारत राष्ट्रीय अखंडता और सामरिक दृष्टि से सीधे खतरे के रूप में देखता है। इस ‘चिकन नेक’ से 100 किलोमीटर से भी कम दूरी पर मुंशीरहाट स्थित है, जो भारत की सीमा के पास बांग्लादेश के खुलना डिविजन में स्थित है। खबर है कि हाल में वहां चीन ने बुनियादी ढांचागत विकास के नाम पर अपना एक नया रक्षा केंद्र खोला है। मुंशीरहाट एक ऐसे भौगोलिक क्षेत्र में आता है, जहां कोई भी विदेशी उपस्थिति भारत के लिए रणनीतिक रूप से खतरनाक होती है। गत वर्ष नेतृत्व संभालने के बाद से मोहम्मद यूनुस ने चीन के साथ बांग्लादेश के संबंधों को गहरा करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किया है। पिछले दिनों बीजिंग यात्रा के दौरान मोहम्मद यूनुस ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की, जिसमें चीनी ऋणों पर ब्याज दरों में कमी और बांग्लादेश में चीनी विनिर्माण इकाइयों का स्थानांतरण शामिल है। हाल में चीन ने भी व्यापक निवेश और सैन्य सहयोग के माध्यम से बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति का काफी विस्तार किया है। यह चीन की व्यापक ‘स्ट्रिंग आफ पर्ल्स’ रणनीति का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारत को चीनी-मित्र राज्यों और सामरिक संपत्तियों के नेटवर्क से घेरना है। उल्लेखनीय रूप से बांग्लादेश में पनडुब्बी बेस के निर्माण से उसकी नौसैनिक क्षमताएं बढ़ी हैं और बंगाल की खाड़ी में उसकी रणनीतिक पहुंच का विस्तार हुआ है। इसके अतिरिक्त चीन ने बांग्लादेश में विभिन्न परियोजनाओं में 25 अरब डालर से अधिक का निवेश किया है, जिससे वह उसका एक प्रमुख आर्थिक भागीदार बन गया है। बांग्लादेश में चीनी ऋणों द्वारा वित्तपोषित पद्मा ब्रिज रेल लिंक, मोंगला पोर्ट एवं दक्षिण-पश्चिमी जिलों के बीच संपर्क मार्ग का निर्माण और बंगाल की खाड़ी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग अभ्यास में वृद्धि ढाका तथा बीजिंग की नई रणनीतिक साझेदारी का प्रमाण है। चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार होने साथ एक प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। हालांकि बांग्लादेश चीन और भारत के बीच संबंधों को संतुलित करने की बात करता है, पर तटीय बांग्लादेश में चीनी-वित्तपोषित बुनियादी ढांचा, विशेषकर मोंगला पोर्ट और मुंशीरहाट के पास चीन की मजबूत रणनीतिक उपस्थिति भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए सकारात्मक नहीं कही जा सकती है। यही कारण है कि दक्षिणी बांग्लादेश में चीनी फर्मों से जुड़ी हाल की सड़क संपर्क और अंतरदेशीय जलमार्ग परियोजनाओं पर भारत ने चिंता जाहिर की है। बांग्लादेश को सबक सिखाने के लिए भारत ने उसे अपनी जमीन के जरिये कारोबार करने की दी गई सुविधा वापस ले ली है। इसके जरिये भारत ने बांग्लादेशी निर्यात को अपनी भूमि के माध्यम से किसी तीसरे देश में जाने की अनुमति दी थी। इस सुविधा के खत्म होने से बांग्लादेश के व्यापार, विशेष रूप से रेडीमेड कपड़ों के निर्यात में बाधा उत्पन्न होने के साथ लागत में वृद्धि हो सकती है। हाल में हुए बैंकाक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मोहम्मद यूनुस से मुलाकात की। बातचीत में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी बयानबाजी से बचने के महत्व पर जोर दिया, जो द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना सकती है। साथ ही उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समूहों, विशेष रूप से हिंदुओं के खिलाफ हिंसक व्यवहार पर चिंता व्यक्त की तथा अत्याचारों की गहन जांच की वकालत की, परंतु उस पर इन कदमों का क्षणिक प्रभाव होगा। ऐसा संभव है कि भारत का यह कदम बांग्लादेश को चीन के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए प्रेरित करे। ऐसे में भारत को अपनी रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करते हुए एक दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी जिससे अपने पड़ोस में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके, क्योंकि जिस प्रकार से महाशक्तियां बंदरगाहों, गलियारों और डिजिटल बुनियादी ढांचे के माध्यम से दूसरे देशों पर प्रभाव डालती हैं, उसी प्रकार बांग्लादेश की दक्षिण-पश्चिमी सीमाएं उभरती हुई इंडो-पैसिफिक प्रतिद्वंद्विता में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
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