जागरण संपादकीय: वक्फ कानून पर विभाजनकारी राजनीति, मुर्शिदाबाद हिंसा की कल्पना नहीं थी

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जागरण संपादकीय: वक्फ कानून पर विभाजनकारी राजनीति, मुर्शिदाबाद हिंसा की कल्पना नहीं थी
Sanjay GuptMurshidabad Violence
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आम तौर पर वक्फ संशोधन कानून का विरोध या तो वे मुस्लिम नेता और संगठन कर रहे हैं जो वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग करते थे या फिर वे राजनीतिक दल जो मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते हैं और वह भी उन्हें बरगलाकर और डराकर। पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में वक्फ कानून के बहाने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति चमकाने की होड़ लगी...

संजय गुप्त। संसद से वक्‍फ संशोधन विधेयक पारित होने और उसके कानून बनने के उपरांत पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में भयावह हिंसा के चलते वहां से सैकड़ों हिंदुओं का पलायन बहुत ही शर्मनाक और चिंताजनक है। इसकी तो आशंका थी कि कुछ मुस्लिम संगठन और राजनीतिक दल इस कानून के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करेंगे, पर मुर्शिदाबाद सरीखी हिंदू विरोधी हिंसा की कल्पना नहीं थी। यह हिंसा बंगाल सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करती है। मुर्शिदाबाद में दो हिंदुओं की घर से खींचकर हत्या भी की गई और बड़े पैमाने पर लूटपाट और आगजनी भी। इसके कारण ही सैकड़ों लोग पलायन करके मालदा और झारखंड भागने को विवश हुए। पता नहीं ये लोग अपने घरों को लौट सकेंगे या नहीं? यदि लौटते हैं तो अपने आपको सुरक्षित महसूस करेंगे या नहीं? वक्फ कानून विरोधियों के उपद्रव को रोकने की कोई कोशिश करने के बजाय बंगाल सरकार जिस तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही, उसे तृणमूल कांग्रेस की मुस्लिम तुष्‍टीकरण की विभाजनकारी राजनीति ही कहा जाएगा। मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद हिंसा से किस तरह मुंह मोड़ा, इसका पता इससे चलता है कि हिंसा के लिए उन्होंने विश्‍व हिंदू परिषद और सीमा सुरक्षा बल को जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने केंद्र सरकार पर भी दोष मढ़ा। उनकी मानें तो यह हिंसा बंगाल सरकार को बदनाम करने के लिए की गई। हिंसा के कारण जिन लोगों को पलायन करना पड़ा, उनसे ममता बनर्जी ने लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं दिखाई। इसका पता इससे भी चलता है कि उन्होंने राज्यपाल से कहा कि वह पीड़ितों से मिलने मालदा न जाएं। वह उनके आग्रह की अनदेखी कर वहां गए और उन्होंने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया, लेकिन अभी यह भरोसा नहीं कि हिंसा पीड़ितों को न्याय मिलेगा। वक्फ कानून के विरोध की आड़ में मुर्शिदाबाद और कुछ अन्य स्थानों में की गई हिंसा की सघन जांच जरूरी है। इस हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों को कठोर दंड का भागीदार बनाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही हिंसा पीड़ितों को पूरी राहत भी दी जानी चाहिए। आखिर वक्‍फ बिल में ऐसा क्‍या है कि उसके विरोध के नाम पर हिंसा का सहारा लिया गया और अब भी हिंसा फैलाने की धमकियां दी जा रही हैं? क्या यह किसी से छिपा है कि पुराने वक्फ कानून का विरोध अनेक मुस्लिम संगठन ही कर रहे थे? वे ऐसा इसलिए कर रहे थे, क्योंकि वक्फ बोर्डों की मनमानी से अनेक मुस्लिम भी पीड़ित थे। इन वक्फ बोर्डों से मुसलमानों का कोई भला भी नहीं हो रहा था। आज ऐसे मुस्लिमों को खोजना कठिन है, जिन्हें वक्फ बोर्डों से किसी तरह की सहायता मिली हो। इसके तमाम उदाहरण अवश्य हैं कि वक्फ बोर्ड पदाधिकारियों ने वक्फ संपत्ति बिल्डरों को बेच दी या फिर उसे मामूली किराए पर दे दिया। क्या इससे कोई इन्कार कर सकता है कि वक्फ संपत्तियों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ है? इसी दुरुपयोग के कारण पिछले दिनों बोहरा मुसलमानों के एक संगठन ने प्रधानमंत्री से मिलकर वक्फ कानून में संशोधन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। इसके अलावा कई अन्य मुस्लिम समूहों ने वक्‍फ संशोधन कानून की प्रशंसा की। केरल के ईसाई संगठनों ने भी इस कानून को सराहा है। वक्फ कानून के विरोधी इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि वक्फ बोर्ड किस तरह गांव के गांव की जमीन पर दावा कर दिया करते थे। इसका जिक्र ससंद में भी किया गया और उच्चतम न्यायालय में भी। यह भी किसी से छिपा नहीं कि अभी हाल में तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, गुजरात, बिहार आदि में वक्फ बोर्डों के मनमाने दावों से परेशान लोग खुद को वक्फ बोर्डों से बचाने की गुहार लगाते हुए सामने आए। वक्फ संशोधन विधेयक पर संसद में बहस के दौरान ऐसे आंकड़े दिए गए थे कि वक्फ कानून में 2013 में किए गए बदलाव के बाद किस तरह वक्फ संपत्ति में अनाप-शनाप वृद्धि दर्ज की गई। आम तौर पर वक्फ संशोधन कानून का विरोध या तो वे मुस्लिम नेता और संगठन कर रहे हैं, जो वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग करते थे या फिर वे राजनीतिक दल, जो मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते हैं और वह भी उन्हें बरगलाकर और डराकर। पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में वक्फ कानून के बहाने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति चमकाने की होड़ लगी है। वे इस झूठ के सहारे मुसलमानों को बरगलाने के साथ उकसा रहे हैं कि नया वक्फ कानून उनकी मस्जिदें और कब्रिस्तान छीनने का काम करेगा। नए वक्फ कानून में कमियां निकालने की होड़ में उसे संविधान विरोधी, मुस्लिम विरोधी वगैरह तो बताया जा रहा है, लेकिन इसकी अनदेखी की जा रही है कि संविधान विरोधी तो 1995 और 2013 का वक्फ कानून था। वक्फ कानून आजादी के बाद 1954 में ही बन गया था। समय-समय पर उसमें बदलाव कर वक्फ बोर्डों के अधिकार बढ़ाए गए, लेकिन उनकी संपत्तियों के दुरुपयोग के चलते मुसलमानों का कोई भला नहीं हुआ। आखिर क्या कारण है कि वक्फ बोर्डों के पास अरबों रुपये की जमीन होते हुए भी मुस्लिम समुदाय में गरीबी और अशिक्षा सबसे अधिक है? मुसलमानों को यह समझने की जरुरत है कि कथित मुस्लिम हितैषी राजनीतिक दल उनके वोट हासिल करने के लिए उनका भला करने के स्थान पर उनका तुष्‍टीकरण कर रहे हैं। उन्हें यह भी समझना होगा कि किसमें उनकी भलाई है और किसमें नहीं? यदि मुसलमान भाजपा को सिर्फ एक हिंदूवादी दल के रुप में देख कर अपने हित के लिए उठाए गए कदमों की अनदेखी करेंगे तो अपना नुकसान ही करेंगे। क्या वे इसकी अनदेखी कर सकते हैं कि तीन तलाक विरोधी कानून मुस्लिम महिलाओं की भलाई के लिए लाया गया था और इससे उनका सचमुच भला हुआ भी? कोई भी कानून पूर्णतया सही नहीं होता। यदि संशोधित वक्‍फ कानून में कोई खामी होगी तो उसे उच्चतम न्यायालय दूर कर देगा। मुसलमानों को न केवल उच्चतम न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, बल्कि वक्फ बोर्डों के कामकाज पर निगरानी भी बढ़ानी चाहिए, ताकि वक्फ संपत्तियों का सदुयपयोग हो और गरीब मुसलमानों का भला हो। उन्हें वक्फ कानून पर विभाजनकारी राजनीति करने वालों से सतर्क भी रहना होगा।.

संजय गुप्त। संसद से वक्‍फ संशोधन विधेयक पारित होने और उसके कानून बनने के उपरांत पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में भयावह हिंसा के चलते वहां से सैकड़ों हिंदुओं का पलायन बहुत ही शर्मनाक और चिंताजनक है। इसकी तो आशंका थी कि कुछ मुस्लिम संगठन और राजनीतिक दल इस कानून के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करेंगे, पर मुर्शिदाबाद सरीखी हिंदू विरोधी हिंसा की कल्पना नहीं थी। यह हिंसा बंगाल सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करती है। मुर्शिदाबाद में दो हिंदुओं की घर से खींचकर हत्या भी की गई और बड़े पैमाने पर लूटपाट और आगजनी भी। इसके कारण ही सैकड़ों लोग पलायन करके मालदा और झारखंड भागने को विवश हुए। पता नहीं ये लोग अपने घरों को लौट सकेंगे या नहीं? यदि लौटते हैं तो अपने आपको सुरक्षित महसूस करेंगे या नहीं? वक्फ कानून विरोधियों के उपद्रव को रोकने की कोई कोशिश करने के बजाय बंगाल सरकार जिस तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही, उसे तृणमूल कांग्रेस की मुस्लिम तुष्‍टीकरण की विभाजनकारी राजनीति ही कहा जाएगा। मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद हिंसा से किस तरह मुंह मोड़ा, इसका पता इससे चलता है कि हिंसा के लिए उन्होंने विश्‍व हिंदू परिषद और सीमा सुरक्षा बल को जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने केंद्र सरकार पर भी दोष मढ़ा। उनकी मानें तो यह हिंसा बंगाल सरकार को बदनाम करने के लिए की गई। हिंसा के कारण जिन लोगों को पलायन करना पड़ा, उनसे ममता बनर्जी ने लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं दिखाई। इसका पता इससे भी चलता है कि उन्होंने राज्यपाल से कहा कि वह पीड़ितों से मिलने मालदा न जाएं। वह उनके आग्रह की अनदेखी कर वहां गए और उन्होंने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया, लेकिन अभी यह भरोसा नहीं कि हिंसा पीड़ितों को न्याय मिलेगा। वक्फ कानून के विरोध की आड़ में मुर्शिदाबाद और कुछ अन्य स्थानों में की गई हिंसा की सघन जांच जरूरी है। इस हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों को कठोर दंड का भागीदार बनाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही हिंसा पीड़ितों को पूरी राहत भी दी जानी चाहिए। आखिर वक्‍फ बिल में ऐसा क्‍या है कि उसके विरोध के नाम पर हिंसा का सहारा लिया गया और अब भी हिंसा फैलाने की धमकियां दी जा रही हैं? क्या यह किसी से छिपा है कि पुराने वक्फ कानून का विरोध अनेक मुस्लिम संगठन ही कर रहे थे? वे ऐसा इसलिए कर रहे थे, क्योंकि वक्फ बोर्डों की मनमानी से अनेक मुस्लिम भी पीड़ित थे। इन वक्फ बोर्डों से मुसलमानों का कोई भला भी नहीं हो रहा था। आज ऐसे मुस्लिमों को खोजना कठिन है, जिन्हें वक्फ बोर्डों से किसी तरह की सहायता मिली हो। इसके तमाम उदाहरण अवश्य हैं कि वक्फ बोर्ड पदाधिकारियों ने वक्फ संपत्ति बिल्डरों को बेच दी या फिर उसे मामूली किराए पर दे दिया। क्या इससे कोई इन्कार कर सकता है कि वक्फ संपत्तियों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ है? इसी दुरुपयोग के कारण पिछले दिनों बोहरा मुसलमानों के एक संगठन ने प्रधानमंत्री से मिलकर वक्फ कानून में संशोधन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। इसके अलावा कई अन्य मुस्लिम समूहों ने वक्‍फ संशोधन कानून की प्रशंसा की। केरल के ईसाई संगठनों ने भी इस कानून को सराहा है। वक्फ कानून के विरोधी इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि वक्फ बोर्ड किस तरह गांव के गांव की जमीन पर दावा कर दिया करते थे। इसका जिक्र ससंद में भी किया गया और उच्चतम न्यायालय में भी। यह भी किसी से छिपा नहीं कि अभी हाल में तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, गुजरात, बिहार आदि में वक्फ बोर्डों के मनमाने दावों से परेशान लोग खुद को वक्फ बोर्डों से बचाने की गुहार लगाते हुए सामने आए। वक्फ संशोधन विधेयक पर संसद में बहस के दौरान ऐसे आंकड़े दिए गए थे कि वक्फ कानून में 2013 में किए गए बदलाव के बाद किस तरह वक्फ संपत्ति में अनाप-शनाप वृद्धि दर्ज की गई। आम तौर पर वक्फ संशोधन कानून का विरोध या तो वे मुस्लिम नेता और संगठन कर रहे हैं, जो वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग करते थे या फिर वे राजनीतिक दल, जो मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते हैं और वह भी उन्हें बरगलाकर और डराकर। पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में वक्फ कानून के बहाने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति चमकाने की होड़ लगी है। वे इस झूठ के सहारे मुसलमानों को बरगलाने के साथ उकसा रहे हैं कि नया वक्फ कानून उनकी मस्जिदें और कब्रिस्तान छीनने का काम करेगा। नए वक्फ कानून में कमियां निकालने की होड़ में उसे संविधान विरोधी, मुस्लिम विरोधी वगैरह तो बताया जा रहा है, लेकिन इसकी अनदेखी की जा रही है कि संविधान विरोधी तो 1995 और 2013 का वक्फ कानून था। वक्फ कानून आजादी के बाद 1954 में ही बन गया था। समय-समय पर उसमें बदलाव कर वक्फ बोर्डों के अधिकार बढ़ाए गए, लेकिन उनकी संपत्तियों के दुरुपयोग के चलते मुसलमानों का कोई भला नहीं हुआ। आखिर क्या कारण है कि वक्फ बोर्डों के पास अरबों रुपये की जमीन होते हुए भी मुस्लिम समुदाय में गरीबी और अशिक्षा सबसे अधिक है? मुसलमानों को यह समझने की जरुरत है कि कथित मुस्लिम हितैषी राजनीतिक दल उनके वोट हासिल करने के लिए उनका भला करने के स्थान पर उनका तुष्‍टीकरण कर रहे हैं। उन्हें यह भी समझना होगा कि किसमें उनकी भलाई है और किसमें नहीं? यदि मुसलमान भाजपा को सिर्फ एक हिंदूवादी दल के रुप में देख कर अपने हित के लिए उठाए गए कदमों की अनदेखी करेंगे तो अपना नुकसान ही करेंगे। क्या वे इसकी अनदेखी कर सकते हैं कि तीन तलाक विरोधी कानून मुस्लिम महिलाओं की भलाई के लिए लाया गया था और इससे उनका सचमुच भला हुआ भी? कोई भी कानून पूर्णतया सही नहीं होता। यदि संशोधित वक्‍फ कानून में कोई खामी होगी तो उसे उच्चतम न्यायालय दूर कर देगा। मुसलमानों को न केवल उच्चतम न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, बल्कि वक्फ बोर्डों के कामकाज पर निगरानी भी बढ़ानी चाहिए, ताकि वक्फ संपत्तियों का सदुयपयोग हो और गरीब मुसलमानों का भला हो। उन्हें वक्फ कानून पर विभाजनकारी राजनीति करने वालों से सतर्क भी रहना होगा।

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