जागरण संपादकीय: जरूरी था वक्फ कानून में बदलाव, संविधान की मूल भावना के खिलाफ ऐसा कानून

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जागरण संपादकीय: जरूरी था वक्फ कानून में बदलाव, संविधान की मूल भावना के खिलाफ ऐसा कानून
Waqf Amendment Bil 2024Sanjay Gupt
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वक्फ की व्यवस्था आजादी के पहले से ही चली आ रही है। आजादी के बाद पहली बार 1954 में वक्फ कानून बना। इसके बाद समय-समय पर उसमें बदलाव किए गए। सबसे उल्लेखनीय बदलाव 1995 में किया गया। इसके जरिये वक्फ बोर्डों को और अधिक अधिकार दिए गए। 2013 में इन अधिकारों को और पुष्ट करते हुए वक्फ बोर्डों को मनमाने अधिकार दे दिए...

संजय गुप्त। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल का प्रारंभ करते समय यह स्पष्ट किया था कि उनकी सरकार अपने एजेंडे के अनुरूप ही आगे बढ़ती रहेगी। इसी क्रम में उन्होंने वक्फ कानून में बदलाव का जो फैसला लिया, उस पर पिछले दिनों संसद की मुहर लग गई। संसद के दोनों सदनों ने व्यापक बहस के बाद वक्फ संशोधन विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दी। मोदी सरकार ने अपने पहले और दूसरे कार्यकाल में भी अनेक बड़े फैसले किए थे। इनमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा और नागरिकता कानून में संशोधन प्रमुख हैं। उनकी सरकार ने मुस्लिम समाज में सुधार लाने की दृष्टि से तीन तलाक की कुप्रथा के खिलाफ कानून बनाने का जो फैसला किया, वह भी एक बड़ा कदम था। इस फैसले ने मुस्लिम समाज की महिलाओं को उत्पीड़न और उपेक्षा से बचाने का काम किया। वक्फ कानून में बदलाव भी मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा करने वाला फैसला है। वक्फ की व्यवस्था आजादी के पहले से ही चली आ रही है। आजादी के बाद पहली बार 1954 में वक्फ कानून बना। इसके बाद समय-समय पर उसमें बदलाव किए गए। सबसे उल्लेखनीय बदलाव 1995 में किया गया। इसके जरिये वक्फ बोर्डों को और अधिक अधिकार दिए गए। 2013 में इन अधिकारों को और पुष्ट करते हुए वक्फ बोर्डों को मनमाने अधिकार दे दिए गए। वक्फ बोर्डों का मुख्य कार्य है सामाजिक-धार्मिक कार्यों के लिए दान की गई संपत्तियों की देखरेख करना और उनसे होने वाली आय से गरीब मुसलमानों की मदद करना। इसमें कोई संदेह नहीं कि वक्फ बोर्ड इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे। देश में सेना और रेलवे के बाद सबसे अधिक जमीन वक्फ बोर्डों के पास है। 1913 से 2013 तक वक्फ बोर्डों के पास कुल 18 लाख एकड़ जमीन थी। 2013 में वक्फ कानून में संशोधन कर वक्फ बोर्डों को दिए गए मनमाने अधिकारों के चलते उनकी कुल जमीन 39 लाख एकड़ हो गई। 2013 से 2025 के बीच यानी महज 12 साल में 21 लाख एकड़ जमीन बढ़ जाना यही बताता है कि वक्फ बोर्डों ने मनमाने तरीके से दूसरों की जमीनें अपने नाम कीं। इसके बाद भी उनकी आय नहीं बढ़ सकी। यह हैरानी की बात रही कि वक्फ बोर्डों से कोई भी यह पूछने-जांचने वाला नहीं रहा कि उनकी इतनी अधिक संपत्ति के बाद भी उनकी आय क्यों नहीं बढ़ी? वक्फ संशोधन विधेयक के जरिये वक्फ बोर्डों की कार्यप्रणाली में अनेक बदलाव करने के साथ वक्फ कानून के उस विभेदकारी प्रविधान को खत्म किया गया है, जिसके तहत वक्फ बोर्डों के फैसलों के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील का अधिकार नहीं था। वक्फ बोर्ड केवल इस गंभीर आरोप से ही दो-चार नहीं हैं कि वे मनमाने तरीके से सरकारी और गैर सरकारी जमीनों पर अपना दावा करते रहते हैं, बल्कि इससे भी हैं कि वे अपनी जमीनों को गैर कानूनी तरीके से औने-पौने दाम में बेच देते हैं या फिर उन्हें मामूली किराए पर दे देते हैं। वक्फ की न जाने कितनी जमीनें बिल्डरों को बेची जा चुकी हैं और वे उन पर रिहायशी और व्यावसायिक इमारतें खड़ी कर चुके हैं। इसी तरह यह भी किसी से छिपा नहीं कि जिन वक्फ संपत्तियों से लाखों रुपये किराया मिल सकता है, उनसे हजारों रुपये ही लिया जाता है। इससे यही पता चलता है कि वक्फ बोर्डों में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस भ्रष्टाचार में प्रभावशाली मुस्लिम नेता शामिल हैं। इनमें सियासी नेता भी हैं और मजहबी भी। कई राज्यों में ऐसे अनेक नेताओं के नाम भी सामने आ चुके हैं। इससे कोई भी और यहां तक तमाम मुस्लिम नेता भी असहमत नहीं कि वक्फ बोर्ड उस उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, जिनके लिए उनका गठन किया गया था। वे न तो अपनी संपत्तियों की सही तरह देखरेख कर पा रहे हैं और न ही उनसे उपयुक्त आय अर्जित कर गरीब मुसलमानों की किसी तरह की मदद कर पा रहे हैं। इससे निर्धन मुस्लिम समाज भी अच्छी तरह परिचित है। तथ्य यह भी है कि वक्फ बोर्डों की भ्रष्ट और मनमानी कार्यप्रणाली से पीड़ित लोगों में मुसलमानों की भी अच्छी-खासी संख्या है। इसी कारण वक्फ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद अनेक मुसलमानों ने खुशी जताई। इनमें वे मुस्लिम भी हैं, जिनकी जमीन-जायदाद को वक्फ बोर्डों ने मनमाने तरीके से हथिया लिया था। वक्‍फ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद विपक्षी दल भले ही यह कहें कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी है, लेकिन वे यह साबित करने में सक्षम नहीं कि पुराना कानून कैसे मुस्लिम हितैषी था? विपक्षी नेता जिस तरह वक्‍फ संशोधन विधेयक पर विचार के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति की बैठकों में कोई ठोस सुझाव देने के बजाय यह शोर मचाते रहे कि मोदी सरकार इस विधेयक के जरिये मुसलमानों की अनदेखी कर रही है, उसी तरह लोकसभा और राज्यसभा में भी। विपक्षी दलों ने यह आरोप भी बढ़चढ़ कर लगाया कि भाजपा अपने राजनीतिक स्वार्थ पूरे करने और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए मुसलमानों को दबा रही है। इनमें वे भी हैं, जो यह तो कह रहे थे कि वक्फ कानून में बदलाव आवश्यक है, लेकिन प्रस्तावित बदलावों से सहमत भी नहीं हो रहे थे। इसका एकमात्र कारण तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति है। विपक्षी नेताओं में से कुछ सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा कर रहे हैं। इसमें कोई रोक नहीं, लेकिन आखिर देश में ऐसा कोई भी कानून क्यों होना चाहिए, जो किसी संस्था-समुदाय को विशेष अधिकार देता हो? ऐसे कानून तो संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं। ऐसे ही कानून समाज में वैमनस्य पैदा करते हैं। एक पंथनिरपेक्ष देश में ऐसे किसी कानून के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, जो किसी समुदाय को विशेष अधिकार देता हो। इसी तरह अलग-अलग समुदायों को भिन्न-भिन्न अधिकार प्रदान करने वाले कानून भी नहीं होने चाहिए। उचित यह होगा कि अब मोदी सरकार समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़े। यह समय की मांग और आवश्यकता भी है कि देश के सभी समुदाय एक जैसे कानूनों से नियंत्रित हों। इसमें ही सभी समुदायों का हित है।.

संजय गुप्त। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल का प्रारंभ करते समय यह स्पष्ट किया था कि उनकी सरकार अपने एजेंडे के अनुरूप ही आगे बढ़ती रहेगी। इसी क्रम में उन्होंने वक्फ कानून में बदलाव का जो फैसला लिया, उस पर पिछले दिनों संसद की मुहर लग गई। संसद के दोनों सदनों ने व्यापक बहस के बाद वक्फ संशोधन विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दी। मोदी सरकार ने अपने पहले और दूसरे कार्यकाल में भी अनेक बड़े फैसले किए थे। इनमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा और नागरिकता कानून में संशोधन प्रमुख हैं। उनकी सरकार ने मुस्लिम समाज में सुधार लाने की दृष्टि से तीन तलाक की कुप्रथा के खिलाफ कानून बनाने का जो फैसला किया, वह भी एक बड़ा कदम था। इस फैसले ने मुस्लिम समाज की महिलाओं को उत्पीड़न और उपेक्षा से बचाने का काम किया। वक्फ कानून में बदलाव भी मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा करने वाला फैसला है। वक्फ की व्यवस्था आजादी के पहले से ही चली आ रही है। आजादी के बाद पहली बार 1954 में वक्फ कानून बना। इसके बाद समय-समय पर उसमें बदलाव किए गए। सबसे उल्लेखनीय बदलाव 1995 में किया गया। इसके जरिये वक्फ बोर्डों को और अधिक अधिकार दिए गए। 2013 में इन अधिकारों को और पुष्ट करते हुए वक्फ बोर्डों को मनमाने अधिकार दे दिए गए। वक्फ बोर्डों का मुख्य कार्य है सामाजिक-धार्मिक कार्यों के लिए दान की गई संपत्तियों की देखरेख करना और उनसे होने वाली आय से गरीब मुसलमानों की मदद करना। इसमें कोई संदेह नहीं कि वक्फ बोर्ड इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे। देश में सेना और रेलवे के बाद सबसे अधिक जमीन वक्फ बोर्डों के पास है। 1913 से 2013 तक वक्फ बोर्डों के पास कुल 18 लाख एकड़ जमीन थी। 2013 में वक्फ कानून में संशोधन कर वक्फ बोर्डों को दिए गए मनमाने अधिकारों के चलते उनकी कुल जमीन 39 लाख एकड़ हो गई। 2013 से 2025 के बीच यानी महज 12 साल में 21 लाख एकड़ जमीन बढ़ जाना यही बताता है कि वक्फ बोर्डों ने मनमाने तरीके से दूसरों की जमीनें अपने नाम कीं। इसके बाद भी उनकी आय नहीं बढ़ सकी। यह हैरानी की बात रही कि वक्फ बोर्डों से कोई भी यह पूछने-जांचने वाला नहीं रहा कि उनकी इतनी अधिक संपत्ति के बाद भी उनकी आय क्यों नहीं बढ़ी? वक्फ संशोधन विधेयक के जरिये वक्फ बोर्डों की कार्यप्रणाली में अनेक बदलाव करने के साथ वक्फ कानून के उस विभेदकारी प्रविधान को खत्म किया गया है, जिसके तहत वक्फ बोर्डों के फैसलों के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील का अधिकार नहीं था। वक्फ बोर्ड केवल इस गंभीर आरोप से ही दो-चार नहीं हैं कि वे मनमाने तरीके से सरकारी और गैर सरकारी जमीनों पर अपना दावा करते रहते हैं, बल्कि इससे भी हैं कि वे अपनी जमीनों को गैर कानूनी तरीके से औने-पौने दाम में बेच देते हैं या फिर उन्हें मामूली किराए पर दे देते हैं। वक्फ की न जाने कितनी जमीनें बिल्डरों को बेची जा चुकी हैं और वे उन पर रिहायशी और व्यावसायिक इमारतें खड़ी कर चुके हैं। इसी तरह यह भी किसी से छिपा नहीं कि जिन वक्फ संपत्तियों से लाखों रुपये किराया मिल सकता है, उनसे हजारों रुपये ही लिया जाता है। इससे यही पता चलता है कि वक्फ बोर्डों में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस भ्रष्टाचार में प्रभावशाली मुस्लिम नेता शामिल हैं। इनमें सियासी नेता भी हैं और मजहबी भी। कई राज्यों में ऐसे अनेक नेताओं के नाम भी सामने आ चुके हैं। इससे कोई भी और यहां तक तमाम मुस्लिम नेता भी असहमत नहीं कि वक्फ बोर्ड उस उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, जिनके लिए उनका गठन किया गया था। वे न तो अपनी संपत्तियों की सही तरह देखरेख कर पा रहे हैं और न ही उनसे उपयुक्त आय अर्जित कर गरीब मुसलमानों की किसी तरह की मदद कर पा रहे हैं। इससे निर्धन मुस्लिम समाज भी अच्छी तरह परिचित है। तथ्य यह भी है कि वक्फ बोर्डों की भ्रष्ट और मनमानी कार्यप्रणाली से पीड़ित लोगों में मुसलमानों की भी अच्छी-खासी संख्या है। इसी कारण वक्फ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद अनेक मुसलमानों ने खुशी जताई। इनमें वे मुस्लिम भी हैं, जिनकी जमीन-जायदाद को वक्फ बोर्डों ने मनमाने तरीके से हथिया लिया था। वक्‍फ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद विपक्षी दल भले ही यह कहें कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी है, लेकिन वे यह साबित करने में सक्षम नहीं कि पुराना कानून कैसे मुस्लिम हितैषी था? विपक्षी नेता जिस तरह वक्‍फ संशोधन विधेयक पर विचार के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति की बैठकों में कोई ठोस सुझाव देने के बजाय यह शोर मचाते रहे कि मोदी सरकार इस विधेयक के जरिये मुसलमानों की अनदेखी कर रही है, उसी तरह लोकसभा और राज्यसभा में भी। विपक्षी दलों ने यह आरोप भी बढ़चढ़ कर लगाया कि भाजपा अपने राजनीतिक स्वार्थ पूरे करने और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए मुसलमानों को दबा रही है। इनमें वे भी हैं, जो यह तो कह रहे थे कि वक्फ कानून में बदलाव आवश्यक है, लेकिन प्रस्तावित बदलावों से सहमत भी नहीं हो रहे थे। इसका एकमात्र कारण तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति है। विपक्षी नेताओं में से कुछ सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा कर रहे हैं। इसमें कोई रोक नहीं, लेकिन आखिर देश में ऐसा कोई भी कानून क्यों होना चाहिए, जो किसी संस्था-समुदाय को विशेष अधिकार देता हो? ऐसे कानून तो संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं। ऐसे ही कानून समाज में वैमनस्य पैदा करते हैं। एक पंथनिरपेक्ष देश में ऐसे किसी कानून के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, जो किसी समुदाय को विशेष अधिकार देता हो। इसी तरह अलग-अलग समुदायों को भिन्न-भिन्न अधिकार प्रदान करने वाले कानून भी नहीं होने चाहिए। उचित यह होगा कि अब मोदी सरकार समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़े। यह समय की मांग और आवश्यकता भी है कि देश के सभी समुदाय एक जैसे कानूनों से नियंत्रित हों। इसमें ही सभी समुदायों का हित है।

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