जागरण संपादकीय: शोध और विकास की प्राथमिकता, भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में पैठ मजबूत

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आरएंडी में निवेश बढ़ाकर भारत न केवल घरेलू समस्याओं का समाधान कर सकता है बल्कि उलझे हुए वैश्विक मुद्दों को सुलझाने का माध्यम भी बन सकेगा। इससे विदेशी निवेश को भी लुभाने में मदद मिलेगी। तकनीकी संप्रभुता में भी इसकी महत्ता है। याद रहे कि रक्षा अंतरिक्ष इलेक्ट्रानिक्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीकी विकास से ही आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियान...

आदित्य सिन्हा। चीन की चमत्कृत करने वाली प्रगति में उसके दूरगामी सोच की अहम भूमिका रही है। चीन ने शोध एवं विकास यानी आरएंडडी में काफी पहले से निवेश करना आरंभ कर दिया था। इससे कम लागत में प्रतिस्पर्धी उत्पाद तैयार करने की उसने जो क्षमता हासिल की उससे वह वैश्विक विनिर्माण बाजार का सिरमौर बन गया। चीन ने सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों की व्यवस्था से नवाचार केंद्रित आर्थिकी की ओर कदम बढ़ाने आरंभ किए। इसका परिणाम हुआवे, अलीबाबा और बीआइडी जैसी दिग्गज कंपनियों के रूप में सामने आया। ऐसी कंपनियों की सूची अंतहीन दिखती है। चीन अपनी जीडीपी का 2.

6 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करता है जो दर्शाता है कि वह भविष्य की अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को मूर्त रूप देने के लिए कितना गंभीर है। भारत ने भी बीते एक दशक के दौरान इस मोर्चे पर काफी प्रगति की है, लेकिन निवेश एवं उत्पादन के लिहाज से वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में यह अभी भी अपर्याप्त है। भारत अपनी जीडीपी का केवल 0.64 से 0.7 प्रतिशत तक आरएंडडी पर निवेश कर रहा है। चीन का तो ऊपर उल्लेख है ही, जबकि अमेरिका भी अपनी जीडीपी का 3.47 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करता है। ये दोनों ही अर्थव्यवस्थाएं भारत की तुलना में बहुत बड़ी हैं तो कुल राशि कितनी विशाल होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। स्पष्ट है कि इस महत्वपूर्ण मद में सीमित निवेश भारत की संभावनाओं को प्रभावित कर रहा है। सीमित निवेश के बावजूद प्रदर्शन को देखा जाए तो वैश्विक नवाचार परिदृश्य पर भारत ने अपनी छाप छोड़ी है। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स की 133 देशों की सूची में 2015 में 81वें स्थान पर रहने वाला भारत 2024 में 39वें पायदान पर पहुंच गया। प्रदर्शन में यह उल्लेखनीय सुधार भारत के विस्तार लेते डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर, अकादमिक जगत एवं उद्योग जगत के बीच बेहतर होते जुड़ाव और तेजी से बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम को दर्शाता है। हालांकि इस प्रगति में वित्तीय प्रतिबद्धताएं अपेक्षित रूप से मेल नहीं खा रही हैं। ऐसे में, निजी क्षेत्र को निवेश बढ़ाना होगा। सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से आरएंडडी में अभी निजी निवेश करीब 36.4 प्रतिशत के आसपास है जबकि अमेरिका और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्र का यह योगदान 75 से 77 प्रतिशत के दायरे में है। ऐसे में निजी क्षेत्र की सक्रिय सहभागिता के बिना औद्योगिक क्रांति के मामले में अनुकूल परिणाम प्राप्त होने संभव नहीं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बीते दिनों चीन से तुलना करते हुई भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम को सही आईना दिखाया है। भारतीय इकोसिस्टम के रुख-रवैये पर उनकी चिंता वाजिब है। भारत में भले ही डेढ़ लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप हों, लेकिन इनमें से अधिकांश ई-कामर्स, फूड डिलिवरी और गिग इकोनमी से जुड़े हैं। इसकी तुलना में चीन का जोर डीप-टेक, एआइ और हार्डवेयर इनोवेशन और देसी टेक दिग्गजों के निर्माण पर है। इसमें भारत के अपेक्षाकृत रूप से पिछड़ने का संबंध केवल आकांक्षाओं से न होकर ढांचागत रूप से जुड़ा है। उद्योग जगत को अपेक्षाओं के अनुरूप कर्मियों का न मिलना, शोध एवं विकास के लिए संसाधनों का अभाव और सीमित पेटेंट पूंजी से जोखिम लेने की वह क्षमता नहीं उत्पन्न हो पाती जो वास्तविक इनोवेशन और दीर्घकालिक निवेश के लिए जरूरी है। ऐसे में, ‘क्या हम आइसक्रीम और चिप्स ही बनाते रहेंगे’ वाली गोयल की टिप्पणी भले ही कुछ तीखी लगे, लेकिन इसमें गहरा मर्म छिपा हुआ है। स्थितियां बदलने के लिए हमें अपनी प्राथमिकताएं तय कर उन्हें मूर्त रूप देना होगा। सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र द्वारा आरएंडडी में निवेश बढ़ाना इसकी पहली सीढ़ी होगी। हमें सुनिश्चित करना होगा कि आरएंडडी में निवेश दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को गति देने वाला हो। नवाचार बढ़ाए, नए उद्योगों के उद्भव का आधार बने, उत्पादकता बढ़ाए और उच्चस्तरीय रोजगारों का सृजन करे। भारत जैसी आर्थिकी में यह ऊंची वृद्धि के लिए उत्प्रेरक हो सकता है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार के लिए भी आरएंडडी में निवेश आवश्यक है। तकनीकी नवाचार के आधार पर भारतीय कंपनियां ऊंचे मुनाफे वाले अंतरराष्ट्रीय बाजार के फार्मा, इलेक्ट्रानिक्स, हरित ऊर्जा और एआइ जैसे क्षेत्रों में अपनी पैठ बढा सकती हैं। एक मजबूत आरएंडडी ढांचे के अभाव में भारत विदेशी तकनीकों पर निर्भर होकर वैश्विक आपूर्ति शृंखला में पिछड़ जाएगा। हेल्थकेयर से लेकर जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा से लेकर स्वच्छ ऊर्जा जैसी चुनौतियों के समाधान में भी आरएंडडी निवेश की उपयोगिता किसी से छिपी नहीं है। इसमें जहां सरकारी निवेश सार्वजनिक प्रणाली और राष्ट्रीय मिशनों में उपयोगी होगा तो निजी क्षेत्र का निवेश किफायती और दायरा बढ़ाने वाले नवाचारों में लाभकारी होगा। आरएंडी में निवेश बढ़ाकर भारत न केवल घरेलू समस्याओं का समाधान कर सकता है, बल्कि उलझे हुए वैश्विक मुद्दों को सुलझाने का माध्यम भी बन सकेगा। इससे विदेशी निवेश को भी लुभाने में मदद मिलेगी। तकनीकी संप्रभुता में भी इसकी महत्ता है। याद रहे कि रक्षा, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रानिक्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीकी विकास से ही आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियान को सफलता मिल सकती है। घरेलू आरएंडडी क्षमताओं का विकास आयात पर निर्भरता घटाने के साथ ही आर्थिकी को बाहरी झटकों से बचाने में ढाल का काम करता है। यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में राष्ट्रीय क्षमताओं को बढ़ाने के साथ ही अकादमिक उत्कृष्टता का भी आधार बनता है। एक ऐसे दौर में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ वार का बिगुल बजा दिया है तो एक प्रकार की यह आपदा भारत के लिए नए अवसर लेकर आई है। भारत के प्रमुख प्रतिस्पर्धी देशों पर जहां ट्रंप ने ज्यादा आयात शुल्क लगाया है तो उसकी तुलना में भारत को कुछ रियायत दी है। ऐसे में भारत अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है तो उसकी कुंजी शोध एवं विकास में निवेश बढ़ाने में ही निहित है। भारत के लिए यह निवेश बढ़ाना अब यह कोई विकल्प नहीं अनिवार्यता बन गई है।

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