जागरण संपादकीय: भाषा पर भड़काने वाली राजनीति, स्टालिन हिंदी विरोध के लिए हद से ज्यादा आगे बढ़ गए

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जागरण संपादकीय: भाषा पर भड़काने वाली राजनीति, स्टालिन हिंदी विरोध के लिए हद से ज्यादा आगे बढ़ गए
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संविधान के अनुसार 1965 में हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित होना था। तब अंग्रेजी संघ की सहयोगी राजभाषा नहीं रह जाती किंतु उसके कुछ दिन पूर्व ही मद्रास में सी .

कृपाशंकर चौबे। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रमुक नेता एमके स्टालिन हिंदी विरोध के लिए हद से ज्यादा आगे बढ़ गए हैं। वह अब हिंदी के खिलाफ उसकी बोलियों को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा है, ‘अन्य राज्यों के मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, कभी सोचा है कि हिंदी ने कितनी भारतीय भाषाओं को निगल लिया है? भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खरिया, खोरठा, कुरमाली समेत कई अन्य अब अस्तित्व के लिए हांफ रही हैं। एक अखंड हिंदी पहचान के लिए जोर देने से प्राचीन मातृभाषाएं खत्म हो रही हैं। यूपी और बिहार कभी भी सिर्फ हिंदी के गढ़ नहीं थे। उनकी असली भाषाएं अब अतीत की निशानी बन गई हैं। तमिलनाडु इसका विरोध करता है।’ कहने की जरूरत नहीं कि स्टालिन का यह वक्तव्य भड़काने वाला है। स्टालिन द्वारा हिंदी पर लगाया गया यह आरोप इसलिए निरर्थक है, क्योंकि हिंदी क्षेत्र की इन बोलियों-भाषाओं के सम्मिलित रूप को ही हिंदी कहा जाता है। इनसे प्राप्त जीवनशक्ति से हिंदी फलती-फूलती है। ठेठ हिंदी का ठाठ उसकी बोलियों के सौंदर्य से निर्मित होता है। हिंदी समाज एक साथ अपनी जनपदीय भाषा जैसे भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही भी बोलता है और हिंदी भी। लिखने-पढ़ने का अधिकांश कार्य वह हिंदी में जरूर करता है। इसीलिए राजभाषा अधिनियम के अनुसार उन्हें ‘क’ श्रेणी में रखा गया और दस राज्यों में बंटने के बावजूद उन्हें ‘हिंदी भाषी’ कहा गया। भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, ब्रज आदि हिंदी के अभिन्न अंग हैं। इन बोलियों एवं उपभाषाओं की समृद्धि से हिंदी को और हिंदी की समृद्धि से उसकी उपभाषाओं एवं बोलियों को लाभ होता रहा है। जब हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है, तब स्टालिन जैसे नेता उसके घर को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। सूचना-संचार में हिंदी का हस्तक्षेप तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया के तमाम देश भारत जैसे बड़े बाजार के निमित्त हिंदी को अपने भविष्य का रास्ता मान रहे हैं। हिंदी के घर को बांटकर और समाज में विभेद पैदा कर स्टालिन खाई खोदने का काम कर रहे हैं। इसके पहले उन्होंने संस्कृत का भी बेतुका विरोध किया था। इसी तरह वह यह दुष्प्रचार भी कर रहे हैं कि त्रिभाषा फार्मूला दरअसल हिंदी थोपने की कोशिश है। क्या ऐसे बयान देकर स्टालिन भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने और अंग्रेजी को आधिपत्य जमाए रखने का अवसर नहीं दे रहे हैं? हिंदी थोपने का नाहक आरोप लगाने वाले स्टालिन को यह बोध होना चाहिए कि भारतीय भाषाओं को खतरा अंग्रेजी से है। हिंदी का तमिल या किसी भारतीय भाषा से कोई झगड़ा नहीं। यह नहीं भूलना चाहिए कि सभी भारतीय भाषाओं में एक सहकार संबंध रहा है। भारतीय भाषाओं एवं राज्यों को अलग-अलग खंडों में बांटे जाने के बावजूद भारत अपने सांस्कृतिक संदर्भों के कारण एक सूत्र में बंधा है। भारतीय भाषाओं के सहकार संबंध से तमिल कवि सुब्रह्मण्य भारती भलीभांति परिचित थे। इसीलिए वह हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। वह तमिल समाचार पत्र ‘इंडिया’ के संपादक थे और उसमें वह एक पृष्ठ हिंदी को देते थे। ‘इंडिया’ के 15 दिसंबर, 1906 के अंक में उन्होंने लिखा था, ‘तीस करोड़ लोगों में से आठ करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं। महाराष्ट्र से लेकर बंगाल के लोग हिंदी आसानी से समझ लेते हैं। तमिलभाषी, तेलुगुभाषी थोड़ा सा परिश्रम करेंगे तो हिंदी सीख सकते हैं।’ केंद्र सरकार 2022 से सुब्रह्मण्य भारती के जन्मदिन 11 दिसंबर को भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाती है। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के संबंध को बल देने के लिए तीन वर्षों से काशी तमिल संगमम का आयोजन सफलतापूर्वक किया जा रहा है। लगता है इन आयोजनों से स्टालिन की बेचैनी बढ़ी है। तमिलनाडु में सत्ता विरोधी माहौल भी है। कदाचित स्टालिन ने इसीलिए भाषा के पुराने हथियार का उपयोग शुरू किया है। तमिलभाषी क्षेत्र में भाषा को राजनीति का हथियार बनाने का प्रयोग दशकों पुराना है। 1937 में मद्रास सरकार के प्रमुख के रूप में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हाईस्कूल स्तर पर हिंदुस्तानी को अनिवार्य विषय बना दिया तो उसके खिलाफ उग्र आंदोलन शुरू हो गया था। आत्मसम्मान आंदोलन के नेता ईवी रामास्वामी नायकर यानी पेरियार ने गिरफ्तारी दी थी। इनमें पेरियार की छत्रछाया में ही पनपे सीएन अन्नादुरई और करुणानिधि जैसे नेता भी थे। करुणानिधि की राजनीति हिंदी विरोधी आंदोलन में हुई उनकी गिरफ्तारी से ही चमका। इस आंदोलन का प्रभाव दक्षिण के अन्य हिस्सों में भी दिखा, मगर उसकी तीव्रता और विस्तार तमिलनाडु जैसा नहीं था। संविधान के अनुसार 1965 में हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित होना था। तब अंग्रेजी संघ की सहयोगी राजभाषा नहीं रह जाती, किंतु उसके कुछ दिन पूर्व ही मद्रास में सी.

राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी और अन्नादुरई की द्रमुक के नेतृत्व में तमिलभाषियों ने राजभाषा के रूप में हिंदी का विरोध करते हुए हिंसक आंदोलन शुरू कर दिया। यह वही राजगोपालाचारी थे, जिन्होंने कभी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्ष में न केवल वक्तव्य दिया था, बल्कि मद्रास की सरकार के प्रमुख के तौर पर हिंदी को लागू भी किया था। तब से नाहक हिंदी विरोध की राजनीति वहां जारी है। यह देश की एकता के लिए घातक है।

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