भाषाएं केवल संचार की माध्यम नहीं साहित्य-सांस्कृतिक समझ को विकसित कर सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा भी देती हैं। शिक्षा समवर्ती सूची में है लेकिन अनुच्छेद 254 के अनुसार यदि राज्य और केंद्र के कानून में विरोधाभास हो तो केंद्र का कानून प्रभावी होगा। इसके अलावा अनुच्छेद 257 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य सरकारें ऐसे कदम न उठाएं जो केंद्र की नीतियों में...
प्रो. निरंजन कुमार। प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक प्लेटो का कथन है, ‘शिक्षा राजनीति की दासी नहीं, बल्कि सत्य और प्रगति का मार्गदर्शक होनी चाहिए।’ दुर्भाग्य से ब्रिटिश शासन में मैकाले और स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े शिक्षाविदों ने राजनीतिक स्वार्थों के लिए शिक्षा का दुरुपयोग किया, जिससे छात्रों, समाज और राष्ट्र को खासा नुकसान हुआ। वर्तमान में भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को लेकर तमिलनाडु सरकार द्वारा केंद्र सरकार से की जा रही राजनीतिक रस्साकशी न केवल अवांछनीय है, बल्कि तमिलनाडु के छात्रों के हित में भी नहीं है। यह भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप भी नहीं है। वर्तमान विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के कुछ और विशेष रूप से उसके भाषाई प्रविधानों को लेकर उठा है। स्टालिन एनईपी-के कई पहलुओं, जैसे त्रिभाषा सूत्र और कामन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट का विरोध कर रहे हैं। त्रिभाषा सूत्र को लेकर उनका आरोप है कि यह तमिलनाडु पर हिंदी और संस्कृत को थोपता है और इससे तमिल भाषा और संस्कृति पर खतरा है। स्टालिन ने एनईपी को समग्र शिक्षा अभियान और पीएमश्री स्कूल से जोड़ने के लिए भी केंद्र सरकार की आलोचना की है और प्रधानमंत्री मोदी से समग्र शिक्षा अभियान के तहत धन जारी करने की अपील की है। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय संविधान के संघीय चरित्र का भी हवाला दिया है कि शिक्षा समवर्ती सूची में आती है और इसमें राज्यों को पूरी स्वायत्तता है। तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक लाभ की कोशिश में स्टालिन सरकार इस तरह के दावे कर रही है। इस आशंका में कि द्रमुक इस मुद्दे पर राजनीतिक लाभ न उठा ले, तमिलनाडु की विभिन्न राजनीतिक पार्टियां भी स्टालिन के स्वर में स्वर मिला रही हैं। मुद्दे को पूरी तरह से समझने के लिए एनईपी-2020 की निर्माण प्रक्रिया को जानना प्रासंगिक होगा। 21वीं सदी की सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हुई एनईपी-2020 को दुनिया भर में सराहा गया। तमिलनाडु सहित देश के चारों कोनों से 2.
5 लाख ग्राम पंचायतों और 676 जिलों के शिक्षाविदों, जनप्रतिनिधियों से प्राप्त सुझावों के आधार पर तैयार एनईपी-2020 सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय है। एनईपी तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन स्वयं तमिल मूल के हैं। एनईपी तो भारतीय भाषाओं और बहुभाषावाद को बढ़ावा देती है। इसमें संविधान की आठवीं अनुसूची की सभी 22 भाषाएं शामिल हैं। नया त्रिभाषा सूत्र पहले यानी 1968 और 1986 की त्रिभाषा नीतियों की तुलना में अधिक समावेशी और लचीला है। पहले की त्रिभाषा नीति में हिंदी-भाषी राज्यों में अंग्रेजी, हिंदी और एक अन्य भारतीय भाषा की पढ़ाई जाती थी, जबकि हिंदीतर राज्यों में अंग्रेजी, राज्य की क्षेत्रीय भाषा और हिंदी का प्रविधान था, लेकिन नई नीति में छात्र कोई भी दो भारतीय भाषाएं पढ़ सकते हैं। अब हिंदी या कोई भी भाषा विशेष अनिवार्य नहीं है यानी तमिलनाडु या किसी भी राज्य का छात्र तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, मराठी, हिंदी, संस्कृत, या आठवीं अनुसूची की कोई भी भाषा पढ़ सकता है। इसलिए स्टालिन का यह दावा कि तमिलनाडु पर हिंदी या संस्कृत थोपी जा रही है, भ्रामक और भड़काऊ है। नए त्रिभाषा सूत्र से छात्रों को अन्य भाषाओं और संस्कृतियों को समझने का अवसर मिलेगा। इससे तमिलनाडु सहित सभी राज्यों के लोगों को व्यापार, व्यवसाय और अन्य क्रियाकलापों में आसानी होगी। संवैधानिक दृष्टिकोण से भी त्रिभाषा नीति भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप है, क्योंकि त्रिभाषा से उपजे बहुभाषावाद से लोगों में आपसी समझ एवं आत्मीयता बढ़ेगी। भाषाएं केवल संचार की माध्यम नहीं, साहित्य-सांस्कृतिक समझ को विकसित कर सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा भी देती हैं। शिक्षा समवर्ती सूची में है, लेकिन अनुच्छेद 254 के अनुसार यदि राज्य और केंद्र के कानून में विरोधाभास हो, तो केंद्र का कानून प्रभावी होगा। इसके अलावा अनुच्छेद 257 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य सरकारें ऐसे कदम न उठाएं, जो केंद्र की नीतियों में अवरोध बनें। कामन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट या मल्टीपल एंट्री-एग्जिट जैसी व्यवस्था तो सराहनीय और छात्रहित में हैं। इनका विरोध विशुद्ध राजनीति ही है। यदि भविष्योन्मुखी एनईपी-2020 तमिलनाडु में लागू नहीं होगी तो वहां के छात्र राष्ट्रीय और वैश्विक अवसरों से वंचित रह जाएंगे। स्टालिन बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार तमिल भाषा और संस्कृति को कमजोर कर रही है, जबकि मोदी संभवतः पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने तमिल भाषा-संस्कृति को बढ़ावा देने का अधिकतम प्रयास किया है। तमिल कवि-दार्शनिक तिरुवल्लुवर के नाम पर विश्वभर में तिरुवल्लुवर सांस्कृतिक केंद्र स्थापित करने की योजना, तमिल साहित्य को बढ़ावा देने के लिए तिरुक्कुरल और अनेक प्राचीन तमिल ग्रंथों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराकर उन्हें प्रसारित करना, वाराणसी में ‘काशी-तमिल संगमम’ के जरिये उत्तर भारत में तमिल भाषा-संस्कृति के प्रचार की दूरदर्शी पहल, तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती की जयंती पर देश भर में भारतीय भाषा उत्सव मनाना या तमिल भाषा में विभिन्न अखिल भारतीय परीक्षाओं का आयोजन कराना, ये सभी कदम प्रधानमंत्री मोदी की तमिल भाषा-संस्कृति के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
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