जहाँ 21 सिख भिड़ गए दस हज़ार पठानों से

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अक्षय कुमार की फ़िल्म केसरी 122 साल पहले हुई सारागढ़ी की लड़ाई पर बनी है. क्या हुआ था सारागढ़ी में?

गुरमुख सिंह का आख़िरी संदेश इस बीच सिग्नल की व्यवस्था देख रहे गुरमुख सिंह ने अपना आख़िरी संदेश भेजा कि पठान मुख्य ब्लॉक तक पहुंच आए हैं. उन्होंने कर्नल हॉटन से सिग्नल रोकने और अपनी राइफ़ल संभालने की इजाज़त माँगी.

कर्नल ने अपने आखिरी संदेश में उन्हें ऐसा करने की इजाज़त दे दी. गुरमुख सिंह ने अपने हेलियो को एक तरफ़ रखा, अपनी राइफ़ल उठाई और मुख्य ब्लॉक में लड़ाई लड़ रहे अपने बचे खुचे साथियों के पास पहुंच गए. तब तक ईशेर सिंह समेत सिख टुकड़ी के अधिकतर जवान मारे जा चुके थे. पठानों की लाशें भी चारों तरफ़ बिखरी पड़ी थीं. उनके द्वारा बनाया गया छेद और जल चुका मुख्य द्वार पठानों की लाशों से अटा पड़ा था. आख़िर में नायक लाल सिंह, गुरमुख सिंह और एक असैनिक दाद बच गए. बुरी तरह ज़ख्मी होने के कारण लाल सिंह चल नहीं पा रहे थे, लेकिन वो बेहोश नहीं हुए थे और एक स्थान पर गिरे हुए ही लगातार राइफ़ल चला कर पठानों को धराशाई कर रहे थे.ब्रिटिश फ़ौज में तब तक एक अजीब सा क़ानून था कि फ़ौज के साथ काम कर रहे असैनिक बंदूक नहीं उठाएंगे. दाद का काम था घायल हुए लोगों की देखभाल करना, सिग्नल के संदेश ले जाना, हथियारों के डिब्बे खोलना और उन्हें सैनिकों तक ले जाना. जब अंत करीब आने लगा तो दाद ने भी राइफ़ल उठा ली और मरने से पहले उन्होंने पाँच पठानों को या तो गोली से उड़ाया या उनके पेट में संगीन भोंकी. अमरिंदर सिंह लिखते हैं,"आख़िर में सिर्फ़ गुरमुख सिंह बचे. उन्होंने उस जगह जा कर 'पोज़ीशन' ली, जहाँ जवानों के सोने के लिए कमरे थे." "गुरमुख ने अकेले गोली चलाते हुए कम से कम बीस पठानों को मारा. पठानों ने लड़ाई ख़त्म करने के लिए पूरे क़िले में आग लगा दी."गैरबराबरी की ये लड़ाई करीब 7 घंटे तक चली, जिसमें सिखों की तरफ़ से 22 लोग और पठानों की तरफ़ से 180 से 200 के बीच लोग मारे गए. उनके कम से कम 600 लोग घायल भी हुए.सारागढ़ी की लड़ाई में ब्रितानी सिपाहियों ने .303 ली मेटफोर्ड राइफल का इस्तेमाल किया थाब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह बताते हैं,"लड़ाई के बाद सारागढ़ी क़िले के 'डिज़ाइन' में एक और कमी पाई गई.""वो पठानों की 'जिज़ेल' राइफ़लों से आ रहे लगातार फ़ायर को नहीं झेल पाया और टूट गया." "तीन बजे तक सिखों की सारी गोलियाँ ख़त्म हो गई थीं और वो आगे बढ़ते पठानों से सिर्फ़ संगीनों से लड़ रहे थे."इमेज कॉपीरइटएक दिन बाद ही औरकज़ई सारागढ़ी से भगाए गए 14 सितंबर को कोहाट से 9 माउंटेन बैटरी वहाँ अंग्रेज़ों की मदद के लिए पहुंच गई. पठान अभी भी सारागढ़ी के क़िले में मौजूद थे. उन्होंने उन पर तोप से गोले बरसाने शुरू कर दिए. रिज पर अंग्रेज सैनिकों ने ज़बरदस्त हमला किया और सारागढ़ी को पठानों के चंगुल से छुड़ा लिया. जब ये सैनिक अंदर घुसे तो वहाँ उन्हें नायक लाल सिंह की बुरी तरह से क्षत-विक्षत लाश मिली. वहाँ बाकी सिख सैनिकों और दाद के शव भी पड़े हुए थे.लेकिन पठान इतनी अधिक संख्या में थे कि वो बहुत चाह कर भी उनकी मदद के लिए नहीं आ सके. लेफ़्टिनेंट कर्नल जॉन हॉटन पहले शख़्स थे, जिन्होंने उन बहादुरों की वीरता को पहचाना. उन्होने सारागढ़ी पोस्ट के सामने मारे गए अपने साथियों को सैल्यूट किया.सारागढ़ी की लड़ाई में भारतीय सैनिक .303 मार्टिनी हेनरी सिंगल शॉट राइफलों से लड़े थेइस लड़ाई को दुनिया के सबसे बड़े 'लास्ट स्टैंड्स' में जगह दी गई. जब इन सिखों के बलिदान की ख़बर लंदन पहुंची तो उस समय ब्रिटिश संसद का सत्र चल रहा था.'लंदन गज़ेट' के 11 फ़रवरी, 1898 के अंक 26937 के पृष्ठ 863 पर ब्रिटिश संसद की टिप्पणी छपी,"सारे ब्रिटेन और भारत को 36 सिख रेजिमेंट के इन सैनिकों पर गर्व है. यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि जिस सेना में सिख सिपाही लड़ रहे हों, उन्हें कोई नहीं हरा सकता."21 सिख सैनिकों को सर्वोच्च वीरता पुरस्कार जब महारानी विक्टोरिया को इसकी ख़बर मिली तो उन्होंने सभी 21 सैनिकों को इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मैरिट देने का ऐलान किया. ये उस समय तक भारतियों को मिलने वाला सबसे बड़ा वीरता पदक था जो तब के विक्टोरिया क्रॉस और आज के परमवीर चक्र के बराबर था.1911 में जा कर जॉर्ज पंचम ने पहली बार घोषणा की कि भारतीय सैनिक भी विक्टोरिया क्रॉस जीतने के हक़दार होंगे.इन सैनिकों के आश्रितों को 500-500 रुपये और दो मुरब्बा ज़मीन जो कि आज 50 एकड़ के बराबर है, सरकार की तरफ़ से दी गई. सिर्फ़ एक असैनिक दाद को कुछ नहीं दिया गया, क्योंकि वो 'एनसीई' था और उसे हथियार उठाने की इजाज़त नहीं थी. ब्रिटिश सरकार की ये बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी थी, क्योंकि असैनिक होते हुए भी दाद ने अपनी राइफ़ल या संगीन से कम से कम पाँच पठानों को मारा था. लड़ाई के बाद मेजर जनरल यीटमैन बिग्स ने कहा,"21 सिख सैनिकों की बहादुरी और शहादत को ब्रिटिश सैनिक इतिहास में हमेशा स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा."

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