महाभारत में दो बातें प्रमुख हैं. पहला तो ये कि इसका सबसे संक्षिप्त रूप पाप-पुण्य की व्याख्या है, जिसे एक पंक्ति में बेहद आसानी से बता दिया गया है कि किसी को कष्ट पहुंचाना पाप है और परोपकार ही पुण्य है.
पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखते हुए हिम शिखरों से लेकर, सागर की लहरों तक और खाड़ी से लेकर पश्चिम के रेगिस्तान के बीच बसे जिस भारतीय परिवेश का जिक्र किया है, और जिसकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पारंपरिक चेतना का खाका खींचते हुए उसे किसी दिव्यता के सूत्र से बंधा हुआ दिखाया है, वह क्या है? यह प्रश्न नेहरू खुद से भी पूछते हैं, अपने मिलने वाले लोगों से भी करते हैं.
इतिहास-भूगोल के विद्वानों से भी और चिंतन करते हुए योगियों-संन्यासियों से भी. आखिरी में उन्होंने किसानों-मजदूरों से भी जब यही प्रश्न किया तो उन्हें इसका सटीक उत्तर मिला कि, पर्वत और सागरों से घिरी हुई यह भूमि भारत है और भारतीयता ही इसकी आत्मा है. प्रदेश, नगर, जिले, गांव और क्षेत्र भले ही बदलते जाते हैं, पर नहीं बदलती है तो इस देश में बसने वाली भारतीयता. यही भारतीयता ही मिले-जुले रूप में भारत माता है. यह देश युगों से चली आ रही अपनी श्रुति परंपरा वाली कहानियों से जीवन पाता है और जीवन जीना सीखता भी है. रामायण और महाभारत इसकी दो बड़ी किताबें है. रामायण जहां, जीवन की मर्यादा सिखाती है, तो महाभारत जीवन को जीना सिखाती है, मर्यादा की हद तय करती है और बताती है कि जिंदगी में जब अनुशासन टूटता है, तो जो घटना घटित होती है, उसे ही विनाश कहते हैं. इस महाभारत में दो बातें प्रमुख हैं. पहला तो ये कि इसका सबसे संक्षिप्त रूप पाप-पुण्य की व्याख्या है, जिसे एक पंक्ति में बेहद आसानी से बता दिया गया है कि किसी को कष्ट पहुंचाना पाप है और परोपकार ही पुण्य है. जीवन अगर तराजू है तो पाप और पुण्य इसके दो पलड़े हैं और ये आपको तय करना है कि आप जीवन में कौन सा पलड़ा भारी रखेंगे. ये आपके कर्म पर निर्भर करेगा. इस इतनी सी ही बात को विस्तार देते हुए महाभारत की कथा महर्षि वेदव्यास ने गढ़ी थी, जिसे उनके निवेदन पर प्रथम पूज्य गणपति ने लेखबद्ध किया था. आप उन्हें संसार का पहला स्टेनो कह लीजिये, जिन्होंने लगातार सुनकर एक महागाथा का रिटेन डॉक्यूमेंट तैयार किया था, लेकिन ये गाथा आज हमारे तक उसी रूप में नहीं पहुंचती है, जिसे श्रीगणेश जी ने जैसा लिखा था, बल्कि यह कहानी भी श्रुति परंपरा यानी पीढ़ी दर पीढ़ी सुन-सुनकर ही आज के युग तक का सफर तय कर पाई है. इसलिए इस गाथा की शुरुआत कहां से मानी जाए, यह कहना मुश्किल है. क्योंकि यह सिर्फ कौरव-पांडवों की पारिवारिक लड़ाई तक ही सीमित कहानी नहीं है. यह उनके पूर्वजों के द्वारा की गई छोटी-छोटी गलतियों की भी गाथा नहीं है, यह उस समय भारत के भूभाग पर राज कर रहे राजवंशों का स्मृति ग्रंथ भी नहीं है. इसे श्रीकृष्ण के कर्मयोग सिद्धांत और उनकी लीलाओं की व्याख्या तक भी सीमित नहीं किया जा सकता है. यह कहानी मूल रूप से ब्रह्मांड के शुरुआत की कहानी है, फिर उसमें पुण्य को भूलकर पाप के पलड़े को भारी करते जाने वाले लोगों की कहानी है, उनके दंड और अंत की कहानी है और धर्म को फिर से स्थापित करने की कहानी है.नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्। नारायण को, सभी मनुष्यों में उत्तम मनुष्य अर्जुन को, देवी सरस्वती को और व्यास जी को नमस्कार करने के बाद जय पाठ करना चाहिए. यह महाभारत का प्रथम श्लोक है, यह श्लोक 'आदिपर्व' में सबसे पहले लिखा है. इस आदिपर्व में बहुत सी कहानियां शामिल हैं. इसकी शुरुआत नैमिषारण्य में तपस्या कर रहे ऋषियों के बीच कथा सुनने से होती है, जहां उग्रश्रवा ऋषि जनमेजय के नागयज्ञ का वर्णन करते हैं और फिर बताते हैं कि कैसे उस यज्ञ को माता मनसा और ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने रोका और फिर शोक में बैठे जनमेजय को ऋषि वैशम्पायन ने महाभारत की कथा सुनाई. ऋषि वैशम्पायन ही बताते हैं कि कैसे इस महाभारत ग्रंथ को महर्षि वेदव्यास ने पहले ही अपनी त्रिकालदर्शी याद्दाश्त के सहारे मन में ही रच दिया था और फिर उन्होंने श्रीगणेश जी को यह कथा सुनाकर उनसे ही लिखवाई. महाभारत कथा में आदिपर्व का पहला श्लोक नारायण भगवान विष्णु, नर अर्जुन, देवी सरस्वती और वेद के ज्ञाता महर्षि वेदव्यास को प्रणाम करता है. इसी श्लोक के बाद दूसरा श्लोक भगवान वासुदेव, परमपिता ब्रह्मा, प्रजापति, महर्षि कृष्ण द्वैपायन और श्रीगणेश को नमस्कार करता है. सबसे पहली कथा यहीं से शुरू होती है, जिसमें दो खास बातों का जिक्र है. पहला तो यह कि इतना महान ग्रंथ लिखा कैसे गया और दूसरी ये कि, इस गाथा को किसने-किसको सुनाया. कथा यहीं से शुरू होती है. द्वापरयुग का अंतिम चरण था. इसी युग में नैमिषारण्य तीर्थ में महर्षि शौनक का आश्रम था. वह आश्रम के कुलपति थे. उनके आश्रम में बहुत से ऋषि 12 वर्षों की कठोर नियम वाले यज्ञ और तपस्या के लिए इकट्ठे थे. एक दिन अवकाश के समय वे सभी पुराण चर्चा कर रहे थे. इसी दौरान वहां सूतकुल के महर्षि लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सौति आए. उग्रश्रवा ऋषि बहुत विद्वान और पुराण कथाओं को सरल भाषा में कथा के तौर पर कहने के लिए प्रसिद्ध थे. उनकी इसी खासियत को जानने वाले सभी ऋषियों ने उनसे उनका हाल-चाल पूछा और ये भी पूछा कि वह कहां थे और अभी कहां से आ रहे हैं? इस पर उग्रश्रवा ऋषि ने कहा- ऋषियों मैं सम्राट जनमेजय के सर्पयज्ञ में गया था. वहीं ऋषि वैशाम्पायन और खुद महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास भी मौजूद थे. उन्होंने ही महाभारत की कथा लिखी है. मैं वहीं उसी यज्ञ से विचित्र और रहस्य भरी महाभारत कथा सुनकर आ रहा हूं. इतना बताकर उग्रश्रवा सौति ऋषि ने सभी ऋषियों से पूछा कि, अब मैं आप लोगों को क्या सुनाऊं? राजाओं के तीर्थ, कुल और उनके परोपकार चरित्र के साथ वीरता की गाथाएं या पुराणों की कथाएं या फिर कोई और गाथा? इस पर ऋषियों ने कहा- आपने बताया कि आप राजा जनमेजय का सर्पयज्ञ देखने गए थे. इसी यज्ञ के दौरान आपने ऋषि वैशम्पायन से महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास के सामने उनकी ही रची महाभारत कथा सुनी है तो हम उसी महागाथा को सुनना चाहते हैं. हमने सुना है कि यह महागाथा सभी पुराणों के मर्म को खुद में समेटे हुए है. ऋषियों की इस बात को सुनकर ऋषि उग्रश्रवा ने कहा- यह आपने बहुत अच्छी बात कही है ऋषियों, मैं जैसा-जैसा ऋषि वैशम्पायन से सुनकर आ रहा हूं वैसे ही आपको सुनाता हूं. यह जय काव्य, जिसे महाभारत कहते हैं वह बहुत ही सुंदर लिखा और रचा गया है. इसमें अनुष्टुप, इंद्रवज्रा जैसे कठिन, लेकिन आलंकारिक छंद प्रयोग किए गए हैं. इसमें कई कूटपद भी हैं और कई समास-विभाग भी. यह कथा जितनी रोचक है, इसकी लेखन शैली ने उसे और भी रोचक बना दिया है, इसलिए कहते हैं कि इस कथा में सारा संसार ही समा गया है. इसके बाद उग्रश्रवा ऋषि ने महाभारत में लिखा हुआ ब्रह्नांड की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी बताया कि कैसे ब्रह्मा जी के इस संसार में अलग-अलग जीव-जंतुओं की रचना हुई. दिन, महीने, साल और युगों के निर्माण का भी वर्णन किया. यहां से आगे बढ़कर उग्रश्रवा ने राजाओं के वंश और उनके वंशजों के बारे में बताया और फिर सृष्टि का विकास कैसे हुआ, इन सारे रहस्यों की जानकारी संक्षेप में दी. उग्रश्रवा ऋषि ने कहा- सृष्टि और ब्रह्मांड का जो रहस्य मैंने आपसे संक्षेप में कहा है, इन सभी को भगवान वेदव्यास ने अपनी तपस्या के बल पर जान लिया था और उन्होंने इस ज्ञान को अंतिम छोर तक पहचान लिया, उन्होंने ही संक्षेप और विस्तार दोनों ही तरीकों से इस गाथा को कहा है.लेकिन, इतना ज्ञान पा लेने के बाद भी महर्षि वेदव्यास के मन में एक दुविधा थी. वह सोचने लगे कि इस महान रहस्य का अध्ययन लोगों को कैसे कराऊं? यह प्रश्न ही उनकी तपस्या बन गया और उनके चिंतन और उनकी परेशानी को देखकर खुद परमपिता ब्रह्ना उनके सामने आए. ब्रह्नाजी को देखकर महामुनि व्यास ने उनका अभिनंदन किया और फिर उनकी पूजा कर उनसे अपना प्रश्न किया. उन्होंने कहा, हे परमपिता- मैंने अपने मन में ही जय काव्य की रचना कर डाली है. इसमें चारों वेद, उपनिषद, पुराणों का सार और तमाम ग्रंथों की व्याख्या समेत धर्म का विस्तार है, अब मैं इसे कैसे लिखूं? तब ब्रह्माजी ने कहा- हे वेद को विभाजित करने वाले वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन. मैं हर रचना करने वाले की रचना शक्ति में मौजूद हूं. मैंने तुम्हारी रचना को भी देख-परख लिया है. वास्तव में आप कवियों में सबसे महान हैं, लेकिन आपने अपने मन ही में जिस महाकाव्य की रचना कर ली है, उसका लेखन कठिन है. संसार में कोई भी इसे लिखित रूप में नहीं उतार सकेगा, तुम्हारे लिए भी यह कठिन होगा. ऐसे में तुम्हें अपना काव्य लिखवाने के लिए श्रीगणपति का स्मरण करना चाहिए. वह विघ्नहर्ता हैं और वही इस कार्य को बिना किसी विघ्न और बाधा के पूरा कर सकेंगे. ब्रह्माजी के सुझाव पर व्यासजी ने श्रीगणेश का आह्वान किया और अपनी मंशा जाहिर की. उन्होंने कहा- मैंने मन ही मन एक महाकाव्य की रचना कर ली है और इसके लेखन में आपकी सहायता चाहता हूं. ऐसा सुनकर श्रीगणेशजी ने कहा- आपकी प्रार्थना स्वीकार है, लेकिन एक शर्त है, लिखते समय मेरी लेखनी एक पल के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए. अगर ऐसा हो सके तो मैं इस महाकाव्य ग्रंथ का लेखक बन सकता हूं. व्यासजी ने कहा- आपकी आज्ञा मैं मानता हूं, लेकिन निवेदन है कि किसी भी प्रसंग में बिना उसके मर्म को समझे एक भी अक्षर न लिखिएगा, उसके गूढ़ को जाने बिना आगे न बढ़िएगा, गणेशजी ने ऋषि वेदव्यास को तथास्तु कहा. इस तरह वह महाभारत, जिसका नाम जय काव्य था, उसके लेखक बन गए. यह ग्रंथ मन की विजय का प्रतीक है और अनिष्ट करने वाली कामनाओं पर विजय पाने की साधना है, इसलिए वेदव्यास ने इसे सबसे पहले 'जयकाव्य' नाम ही दिया था. आगे चलकर भरतवंशियों की गाथा के तौर पर पहचाने जाने के कारण यही जयकाव्य, महाभारत नाम से भी विख्यात हो गया. उग्रश्रवा जी कहते हैं कि, इस तरह महाभारत का लेखन शुरू हुआ. व्यास जी ने छंद बद्ध, अलंकार की शैली में कूट पदों और कई तरह के अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग करते हुए श्लोक रचना शुरू की और गणेश जी अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से उसके सही अर्थ और उद्देश्य को समझते हुए लेखन करने लगे. इस तरह श्लोक को बोलने और समझकर लिखने के कारण दोनों के बीच गति का संतुलन बना रहा. गणेशजी व्यास जी की छंद रचना से बहुत प्रभावित होते गए और मंद मुस्कान के साथ रोचक काव्य लिखते गए. इस तरह उग्रश्रवा ऋषि ने नैमिषारण्य में कथा सुनने वाले ऋषियों को 'महाभारत कथा कैसे लिखी गई.' इसका प्रसंग सुनाया. यह कथा ग्रंथ के आदिपर्व की सबसे पहली कथा है. आदि पर्व में, नाग यज्ञ, ब्रह्मांड की उत्पत्ति, पुलोमा राक्षस की कथा, सागर मंथन, गरुण की कथा, नागों को उनकी माता का श्राप, राजवंशों की स्थापना और उनके कुलों का वर्णन, दुष्यंत-शकुंतला की कथा, कुरुवंश का वर्णन, शांतनु-गंगा का विवाह, दोनों के पूर्व जन्म की कथा, भीष्म का जन्म, उनके पूर्व जन्मों की कथा, धृतराष्ट्र-पांडु-विदुर का जन्म, सभी का विवाह, कौरवों-पांडवों का जन्म, पांडवों के सभी देव अंशों के पूर्व जन्म की कथा, श्राप और वरदानों का प्रभाव, कर्ण के जन्म का रहस्य शामिल है. असल में आदिपर्व बहुत बड़ा है, घटनाओं के लिहाज से इसमें पांडवों के जीवन के संबंधित कई प्रसंग शामिल हैं. यह प्रसंग न सिर्फ उनके इस जन्म से जुड़े हैं. बल्कि वह पूर्व जन्मों की कथा भी कहते है. कर्ण के जन्म के रहस्य के बाद आदि पर्व में पांडु की मृत्यु, दुर्योधन-भीम में बचपन से ही शत्रुता, भीम को विष देना, राजकुमारों की शिक्षा, द्रोणाचार्य द्वारा उन्हें योग्य बनाना, उनके जन्म की कथा, द्रुपद-द्रोण की मित्रता-शत्रुता. पांडवों के प्रति नगरवासियों का प्रेम, युधिष्ठिर का युवराज बनना, लाक्षागृह षड्यंत्र, हिडिंब और बकासुर का वध, भीम का विवाह, घटोत्कच के जन्म का वर्णन है. इसके बाद ही, द्रौपदी स्वयंवर, अर्जुन का स्वंयवर जीतना और पांचों पांडवों से विवाह, द्रौपदी के पूर्व जन्म का रहस्य, पांडवों के जीवित होने का समाचार हस्तिनापुर में पहुंचना, भीष्म की चिंता और राज्य विभाजन. खांडव प्रस्थ का इंद्रप्रस्थ बनना. अर्जुन का वनवास और सुभद्रा समेत अनेक राजकुमारियों से विवाह. खांडव वन को जलाना. इंद्र आदि देवताओं से अर्जुन का युद्ध और विजय. मय दानव द्वारा इंद्रप्रस्थ में माया महल के निर्माण का आश्वासन. अग्निदेव और अरुण के द्वारा पांचों पांडवों को दिव्य अस्त्र, धनुष बाण, गदा, शंख और अर्जुन को दिव्य रथ का वरदान, ये सभी कथाएं आदि पर्व में शामिल हैं.
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