केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'केलि' में प्रेम, वासना और खजुराहो के मंदिरों का सुंदर वर्णन है, जो चंदेलों की कला और प्रेम को दर्शाती है। कविता में उस समय की जीवनशैली और संस्कृति का चित्रण है, जब भोग-विलास और शारीरिक सुख प्रमुख थे।
हिंदी हैं हम शब्द शृंखला में आज का शब्द है- केलि , जिसका अर्थ है- खेल, क्रीड़ा, रति, स्त्रीप्रसंग, हँसी-ठट्ठा। प्रस्तुत है केदारनाथ अग्रवाल की कविता - खजुराहो के मन्दिर चंदेल ों की कला - प्रेम की देन-- देवताओं के मन्दिर बने हुए हैं अब भी अनिंद्य जो खड़े हुए हैं खजुराहो में, याद दिलाते हैं हम को उस गए समय की जब पुरुषों ने उमड़-उमड़ कर रोमांचित होकर समुद्र-सा, कुच-कटाक्ष वैभव-विलास की कला - केलि की कामिनियों को बाहु-पाश में बांध लिया था, और भोग-सम्भोग-सुरा का सरस पान कर, देश-काल को, जरा-मरण को भुला
दिया था । चले गए वे कामकण्ठ-आभरण पुरुष-जन; चली गईं वे रूप-दीप-दीपित-बालाएँ; लोप हुई वे मदन-महोत्सव की लीलाएँ; शेष नहीं रह गईं हृदय की वे स्वर-ध्वनियाँ ! किन्तु मूर्तियाँ पुरुष-जनों की और मूर्तियाँ कामिनियों की ज्यों की त्यों निस्पन्द खड़ी हैं उसी तरह से देव-मन्दिरों की दीवारों पर विलास के हाव-भाव से । काल नहीं कर सका उन्हें खण्डित कृपाण से किन्तु किसी दुर्धर मनुष्य ने गदा मार कर कहीं-कहीं पर तनिक-तनिक-सा तोड़ दिया है; और आज तक इसीलिए वे उसे कोसती हैं क्षण-प्रतिक्षण । नर हैं तो आजानु-बाहु उन्नत ललाट रागानुराग-रंजित शरीर हैं, अधर-पान, कुच-ग्रहण, और आलिंगन में आसक्त लीन हैं। तिय हैं तो आकुलित केश-पट-नदी-वेश, कामातुर-मद विह्वल अधीर हैं, सदियों से पुरुषों की जांघों पर बैठी करती विहार हैं । इन्हें नहीं संकोच-शील है; यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं, आदि काल से इसी मोद के अधिकारी हैं; चाहे हम-तुम कहें इन्हें, ये व्याभिचारी हैं ! यह कविता केलि, यानी खेल, क्रीड़ा, रति, और हँसी-ठट्ठा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है। कवि खजुराहो के मंदिरों का वर्णन करते हैं, जो चंदेल शासकों की कला और प्रेम का प्रतीक हैं। इन मंदिरों में बनी मूर्तियाँ उस समय की याद दिलाती हैं जब पुरुष और स्त्रियाँ विलासिता और भोग में लिप्त थे। कवि उस बीते हुए समय को याद करते हैं जब पुरुष कामिनियों के साथ शारीरिक सुखों में डूबे हुए थे, और देश-काल की सीमाओं को भूल गए थे। यह कविता मानव स्वभाव और समय के परिवर्तन का चित्रण करती है, जहाँ भौतिक सुख और वासनाएँ प्रमुख थीं। कविता में प्रेम, वासना और भोग के मानवीय अनुभवों को दर्शाया गया है।\केदारनाथ अग्रवाल की कविता खजुराहो के मंदिरों में मौजूद मूर्तियों के माध्यम से उस युग की कहानियों को उजागर करती है, जहाँ प्रेम और शारीरिक सुख जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। कविता में पुरुष और स्त्रियों के बीच के संबंधों, उनके शारीरिक हाव-भाव, और भोग-विलास को दर्शाया गया है। मूर्तियाँ उस समय की जीवनशैली और संस्कृति का प्रतीक हैं, जो आज भी हमें मोहित करती हैं। कवि उन मूर्तियों के माध्यम से उस समय के लोगों की भावनाओं, इच्छाओं, और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं। यह कविता हमें उस युग की याद दिलाती है जब जीवन सादगी से परे, आनंद और मनोरंजन से भरपूर था। कवि उस समय के सौंदर्य और विलासिता को शब्दों में चित्रित करते हैं, जो हमें उस युग की कल्पना करने पर मजबूर करता है। कविता हमें बताती है कि कैसे समय के साथ चीजें बदलती हैं, लेकिन कला और प्रेम की भावनाएँ हमेशा जीवित रहती हैं।\खजुराहो के मंदिरों में बनी मूर्तियाँ आज भी खड़ी हैं, समय के क्रूर प्रहार के बावजूद। कवि उन मूर्तियों के माध्यम से उस समय की कहानियों को कहते हैं, जहाँ प्रेम, वासना, और आनंद का बोलबाला था। इन मूर्तियों को देखकर, हम उस युग की संस्कृति और जीवनशैली का अनुमान लगा सकते हैं। कवि उन मूर्तियों के माध्यम से उस समय के लोगों की भावनाओं, इच्छाओं, और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं। यह कविता न केवल अतीत को याद करती है, बल्कि वर्तमान में भी उस भावना को जीवित रखती है। कविता में प्रेम और वासना की गहराई को दर्शाया गया है, जो मानव जीवन का एक अभिन्न अंग है। कवि हमें बताते हैं कि कैसे कला और प्रेम समय के साथ जीवित रहते हैं, और हमें उनकी सुंदरता का आनंद लेने के लिए प्रेरित करते हैं। कवि खजुराहो के मंदिरों की मूर्तियों के माध्यम से उस समय के सौंदर्य और विलासिता को शब्दों में चित्रित करते हैं, जो हमें उस युग की कल्पना करने पर मजबूर करता है। हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें
केदारनाथ अग्रवाल केलि खजुराहो मंदिर प्रेम वासना चंदेल कला संस्कृति कविता
