इस लोकसभा सीट पर हार गए थे राम मनोहर लोहिया और कांशीराम– News18 हिंदी

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इस लोकसभा सीट पर हार गए थे राम मनोहर लोहिया और कांशीराम Prakashnw18

ने छीन लिया था. यह दो प्रधानमंत्री देने वाली वीआईपी सीट है. यह वो सीट है, जहां राम मनोहर लोहिया और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जैसे दिग्गज भी चुनाव हार चुके हैं. फूलपुर सीट कांग्रेसियों और समाजवादियों की गढ़ रही है.

ने 2014 में पहली बार इस पर भगवा लहराने में कामयाबी पाई थी. बीजेपी फूलपुर में दोबारा फूल खिलाने की तैयारी से मैदान में उतरेगी. जबकि समाजवादी पार्टी उपचुनाव में जीती हुई सीट को 2019 के आम चुनाव में भी अपने पास रखने की कोशिश करेगी. यह कभी कांग्रेस की पारंपरिक सीट रही है लेकिन उपचुनाव में उसकी जमानत जब्त हो गई थी. पहले चुनाव से लेकर वर्ष 1971 तक फूलपुर में कांग्रेस का कब्जा रहा. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फूलपुर से हैट्रिक लगाई थी. धीरे-धीरे यह सीट समाजवादियों के गढ़ के रूप में बदल गई. पहले जनता पार्टी तो बाद में समाजवादी पार्टी ने इस सीट से राजनीतिक फसल काटी. इस सीट पर दोबारा कब्जा जमाने के लिए कांग्रेस ने 2014 में क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को मैदान में उतारा. गणित मुस्लिम वोटरों की अच्छी-खासी संख्या और क्रिकेटर के रूप में लोकप्रियता थी. इसके बावजूद जीत तो दूर कैफ जमानत तक नहीं बचा सके थे.1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में पंडित नेहरू ने इस सीट पर विजय हासिल की. फिर 1957 और 1962 के लोकसभा चुनाव में भी वह जीते. साल 1962 में डॉ. राम मनोहर लोहिया खुद जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़े, लेकिन वे हार गए. 1964 में नेहरू के निधन के बाद यहां उपचुनाव हुआ. जिसमें उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को भी जनता ने संसद भेज दिया. विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ 1967 के चुनाव में समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र खड़े थे. जनता ने उन्हें हराकर विजय लक्ष्मी पंडित पर ही भरोसा जताया. वर्ष 1969 में विजय लक्ष्मी ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद सांसद पद से इस्तीफा दे दिया.इस्तीफे के बाद हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने नेहरू के सहयोगी रहे केशवदेव मालवीय को उतारा लेकिन संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले लड़े समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र ने उन्हें हरा दिया. 1971 में फूलपुर वालों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को संसद भेजा, जो आगे चलकर प्रधानमंत्री बने. आपातकाल के दौर 1977 में हुए आम चुनाव में जनता पार्टी की कमला बहुगुणा ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली. कांग्रेस ने यहां से रामपूजन पटेल को उतारा था. दिलचस्प बात यह है कि 1980 में इसी कमला बहुगुणा ने खुद कांग्रेस से चुनाव लड़ा. नेहरू के बाद इस सीट पर सिर्फ रामपूजन पटेल ही हैट्रिक लगाई. उन्होंने 1984 , 1989 और 1991 में जीत हासिल की. 1996 से 2004 तक हुए चार लोकसभा चुनावों में यहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का कब्जा रहा. 1996 में यहां बीएसपी के संस्थापक कांशीराम चुनाव में खड़े हुए, लेकिन वह सपा के जंग बहादुर सिंह पटेल से 16021 वोट से हार गए. सपा ने 2004 में यहां से बाहुबली अतीक अहमद को मैदान में उतारा और वह चुनाव जीत गए. बहुजन समाज पार्टी के कपिल मुनि करवरिया ने इस सीट पर कांशीराम की हार का बदला 2009 के चुनाव में ले लिया. जवाहरलाल नेहरू, पंडित विजय लक्ष्मी पंडित, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कमला बहुगुणा की राजनैतिक जमीन पर 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने पहली बार भगवा लहराया. जबकि राम मंदिर लहर में भी उसे इस सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी.चुनाव में जातीय गणित महत्वपूर्ण है. भाजपा के लिए फायदे की बात यह है कि यूपी में कुर्मियों की पार्टी कही जाने वाले अपना दल के साथ उसका गठबंधन है. इस पार्टी की प्रमुख अनुप्रिया पटेल मोदी सरकार में मंत्री हैं. अगर वो एनडीए में बनी रहीं तो बीजेपी के लिए कुर्मी वोटरों को रिझाने का प्रयास कर सकती हैं. इस सीट पर सबसे अधिक 2.25 लाख कुर्मी वोटर बताए जाते हैं. फूलपुर सीट समाजवादी पार्टी के हिस्से आई है. ऐसे में उसे यहां बसपा का सपोर्ट मिलेगा. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर एचके शर्मा के मुताबिक"किसी भी चुनाव में केवल जातीय आधार पर विजय पाना मुश्किल है. सिर्फ जाति के आधार पर प्रत्याशी खड़ा कर देने से काम नहीं चलता. यह सीट पहले कांग्रेस के पास थी. फिर समाजवादियों के पास आई. अब बीजेपी ने यहां अपना आधार बना लिया है. जनता विकास के नाम पर भी वोट करती है और यहां विकास के नाम पर सिर्फ एक यूरिया फैक्ट्री है."फूलपुर से सभी पार्टियां जातीय समीकरण को देखकर टिकट देती हैं. सपा कुर्मी को टिकट देती रही हैं. बीजेपी ने 2014 में मौर्य जबकि 2018 के उप चुनाव में पटेल को उम्मीदवार बनाया था. इस बार भी दोनों पार्टियों से पटेलों की दावेदारी सबसे ऊपर हो सकती है. वजह साफ है कि यहां सात बार पटेल प्रत्याशी चुनाव जीत चुके हैं. इस सीट पर सबसे ज्यादा कुर्मी वोट हैं इसलिए भी पार्टियां उन पर दांव लगाती हैं. बसपा के संस्थापक कांशीराम को भी पराजित करने वाला पटेल ही था.

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