योगेश शिंदे बैम्बू इंडिया के संस्थापक और सीईओ हैं। उन्होंने अपना बचपन पुणे, महाराष्ट्र के एक मध्यमवर्गीय परिवार में बिताया। अपना कारोबार करने से पहले योगेश ने लगभग 14 साल कॉर्पोरेट इंडस्ट्री में बिताए। उन्होंने ब्रिटिश टेलीकॉम, टी-मोबाइल, एटीएंडटी, आईआरसीटीसी और बार्कलेज बैंक जैसी जानी-मानी कंपनियों के साथ काम...
नई दिल्ली: पुणे के योगेश शिंदे की कहानी कॉर्पोरेट की चमक-धमक छोड़कर मिट्टी से जुड़ने की है। यूरोप में वह बार्कलेज बैंक में वाइस प्रेसिडेंट रह चुके हैं। हालांकि, अपने एक किसान दोस्त की आत्महत्या ने उन्हें बेचैन कर दिया। उन्होंने उसी पल तय किया कि वह किसानों के लिए कुछ सार्थक करेंगे। साल 2016 में पत्नी अश्विनी के साथ मिलकर उन्होंने 'बैम्बू इंडिया' की नींव रखी। आज यह स्टार्टअप न सिर्फ करोड़ों का टर्नओवर हासिल कर रहा है। बजाय इसके बांस को 'गरीब की लकड़ी' से 'बुद्धिमान की लकड़ी' में बदलकर पर्यावरण और किसानों की जिंदगी संवार रहा है। आइए, यहां योगेश शिंदे की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।नौकरी छोड़ने का लिया बड़ा फैसला नौकरी छोड़ने का लिया बड़ा फैसला' imgsize='34262' >यूरोप में शानदार करियर और लाखों की सैलरी होने के बावजूद योगेश शिंदे का मन भारतीय किसानों की बदहाली देखकर दुखी था। जर्मनी में काम करते वक्त उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में भारतीय किसानों की छवि बहुत खराब दिखाई जा रही है। जब उनके एक किसान दोस्त ने आत्महत्या कर ली तो उन्होंने विदेश की नौकरी छोड़ भारत लौटने का साहसी फैसला लिया। उनका टारगेट सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि किसानों को सम्मानजनक आजीविका देना था।2016 में रखी कंपनी की नींव 2016 में रखी कंपनी की नींव' imgsize='34952' >साल 2016 में योगेश ने पत्नी अश्विनी के साथ स्वतंत्रता दिवस के दिन 'बैम्बू इंडिया' की नींव रखी। मन में यह संकल्प लेकर कि देश को प्लास्टिक से आजादी दिलानी है। इसके विकल्प पेश करने हैं। उन्होंने टूथब्रश, ईयरबड्स और स्टेशनरी जैसे रोजमर्रा के सामानों को बांस से बनाना शुरू किया। शुरुआत कठिन थी। किसानों का भरोसा जीतना भी चुनौतीपूर्ण था। इसके लिए उन्होंने बिचौलियों को हटाकर किसानों को सीधे एडवांस भुगतान करना शुरू किया। इससे किसानों की आय करीब 275% तक बढ़ गई।48 देशों में मौजूदगी 48 देशों में मौजूदगी ' imgsize='39688' >कंपनी ने धीरे-धीरे बड़ी पहचान बनाई। शार्क टैंक इंडिया सीजन 1 में भी हिस्सा लिया। हालांकि, उन्होंने निवेशकों की शर्तों के बजाय अपने सामाजिक उद्देश्यों को प्राथमिकता दी। बूटस्ट्रैप्ड रहने का फैसला किया। आज बैम्बू इंडिया के पास 1 लाख से ज्यादा ग्राहक और टाटा, गूगल, रिलायंस जैसे 500 से ज्यादा कॉर्पोरेट क्लाइंट्स हैं। उनके प्रोडक्ट अब दुनिया के 48 देशों में पहुंचकर भारतीय बांस का लोहा मनवा रहे हैं।प्लास्टिक कचरे को किया कम प्लास्टिक कचरे को किया कम' imgsize='76386' >योगेश का मानना है कि उनकी सफलता केवल 4.
5 करोड़ रुपये के रेवेन्यू में नहीं, बल्कि पर्यावरण पर पड़े प्रभाव में है। अब तक उनकी कंपनी ने 65 लाख किलोग्राम से ज्यादा प्लास्टिक कचरे को कम करने में मदद की है। वह मानते हैं कि अगर भविष्य में कोई प्रतियोगी उनसे आगे निकलता है तो उन्हें खुशी होगी क्योंकि उनका शुरू किया हुआ 'प्लास्टिक मुक्त आंदोलन' सफल हो जाएगा।
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