‘चुनाव में हिजाब खींचते हैं, इसलिए महिलाओं को टिकट नहीं’: जमात लीडर बोले- हिंदू हमारे भाई, सरकार बनी तो भार...

Bangladesh Election 2026 News

‘चुनाव में हिजाब खींचते हैं, इसलिए महिलाओं को टिकट नहीं’: जमात लीडर बोले- हिंदू हमारे भाई, सरकार बनी तो भार...
Ahsanul Mahboob ZubairJamaat-E-IslamiBangladesh Elections
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Bangladesh Election 2026 Jamaat-e-Islami Leader Ahsanul Mahboob Zubair Exclusive Interview Update.

जमात लीडर बोले- हिंदू हमारे भाई, सरकार बनी तो भारत से झगड़े खत्म करेंगेबांग्लादेश में कल यानी 12 फरवरी को चुनाव हैं। 13 साल बैन रहने के बाद जमात-ए-इस्लामी पहली बार चुनाव लड़ रही है। कट्‌टरपंथी पार्टी माने जाने वाली जमात ने पिछला चुनाव 2008 में लड़ा था। जमात ने इस बार एक हिंदू कैंडिडेट उतारा है, वहीं किसी महिला को टिकट नहदैनिक भास्कर से बातचीत में जमात के चुनाव प्रभारी एहसान-उल-जुबैर कहते हैं कि मर्दों के लिए चुनाव लड़ना जितना आसान होता है, उतना महिलाओं के लिए नहीं होता। विरोधी उन पर हमला करते है, हिजाब उतार देते हैं। सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। इसलिए सभी महिलाएं चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं। उन्होंने भारत से रिश्तों, संविधान में बदलाव के लिए हो रहे जनमत संग्रह और हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा पर भी जवाब दिए।हम सम्मान और मर्यादा के आधार पर दूसरे देशों से रिश्ते रखना चाहते हैं। पिछले 16 साल में जो लोग सत्ता में थे, उन्होंने बांग्लादेश की विदेश नीति को पूरी तरह एक देश पर फोकस कर दिया था। ये बांग्लादेश के सम्मान और मर्यादा के मुताबिक नहीं था। हम चाहते हैं कि पड़ोसियों के साथ दोबारा रिश्ते बनाए जाएं। भारत के साथ हमारे कई मुद्दे हैं, जैसे तीस्ता बैराज, बॉर्डर पर हत्याएं और 54 नदियों के पानी का बंटवारा। भारत ऊपरी देश होने की वजह से पानी रोकता है। इससे बांग्लादेश को बहुत नुकसान होता है। यहां सूखे जैसे हालात बन रहे है। इन समस्याओं को आपसी समझ के जरिए सुलझाना चाहिए।हम अपने लोगों को बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक में अलग नहीं बांटते। जो यहां जन्मे हैं, वे देश के नागरिक हैं। शेख हसीना के राज में कई घटनाएं हुईं। इन्हें हमारे और विपक्ष के खिलाफ इस्तेमाल किया गया। बाद में साबित हुआ कि वे सच नहीं थीं। पिछले 17-18 महीनों में जो घटनाएं हुईं, उनकी वजह धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। हमने किसी घटना का समर्थन नहीं किया। उनकी निंदा की और कहा कि सरकार जांच करके दोषियों को कानून के सामने लाएं। हम कानून हाथ में लेने का समर्थन नहीं करते। सवाल: आपने खुलना-1 सीट से हिंदू कैंडिडेट कृष्णा नंदी को उतारा है। ये चुनाव जीतने की रणनीति है या आप वाकई सभी को साथ लेकर चलना चाहते हैं?हमने कई बार कोशिश की, लेकिन बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति अस्थिर थी। 2014 में हमें चुनाव नहीं लड़ने दिया गया। 2018 में रातोंरात चुनाव हो गया। 2024 में भी हमें नहीं लड़ने दिया गया। इस साल हम बातचीत के बाद एक कैंडिडेट उतार पाए। जिन सीटों पर जमात-ए-इस्लामी और BNP को चुनाव नहीं लड़ने दिया गया, वहां वास्तव में चुनाव हुआ ही नहीं। अब हालात मुफीद होने की वजह से हमें चुनाव लड़ने का मौका मिल रहा है। एक गैर-मुस्लिम उम्मीदवार ने इच्छा जताई, हमने उसे टिकट दिया।अगर और लोग चाहेंगे तो हम उन्हें भी टिकट देंगे। हम देखते हैं कि उम्मीदवार में संसद के लायक काबिलियत हो, करप्ट न हो, चाहे वह मुस्लिम हो या गैर-मुस्लिम। हम उसकी निजी इच्छा भी देखते हैं। हमने ढाका यूनिवर्सिटी के चुनाव में एक स्टूडेंट को टिकट दिया था। उसके समुदाय और परिवार ने रोका, फिर भी वह चुनाव लड़ा और जीता। सुरक्षा की वजह से कई बार समुदाय या परिवार से दिक्कतें आती हैं। हम किसी को चुनते हैं, वह सहमति देता है, हम उसका नॉमिनेशन करवाते हैं और उम्मीद करते हैं कि वह जीतेगा। सवाल: जमात पर 1971 में बांग्लादेश की आजादी के आंदोलन को दबाने और पाकिस्तान का साथ देने का दाग है, ये कैसे मिटेगा?अवामी लीग ने अपनी राजनीति में इन मुद्दों का इस्तेमाल किया। हमारे खिलाफ उनके पास कहने को कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने यह सब किया। वे हमें राजनीति में नहीं हरा पाए, तो कानून और ट्रिब्यूनल बनाए। ये बाद में गलत साबित हुए। हमारे एक लीडर को बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। पूरे मामले की समीक्षा कर कहा कि यह इतिहास का सबसे बुरा ट्रायल था। इंग्लैंड के सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा। अब साफ हो चुका है कि इन आरोपों के पीछे राजनीति थी।जवाब: हिंदू, ईसाई, बौद्ध, सब इस देश के नागरिक हैं। हम सब मिलकर देश बनाना चाहते हैं। हर आपदा में हमने धर्म नहीं देखा, मानवता देखी। 5 अगस्त 2024 के बाद सभी धर्मों के पूजा स्थलों की सुरक्षा की। हमने उन्हें भरोसा दिया कि किसी तरह की नाइंसाफी नहीं होगी।बांग्लादेश के कुल वोटर में आधी महिलाएं हैं। बांग्लादेश के समाज में महिलाओं के लिए कुछ तयशुदा नियम, परंपराएं और मान्यताएं हैं। हर देश का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक इतिहास और परंपराएं होती हैं। उसी के हिसाब से उस देश की राजनीति और सिस्टम चलता है। जमात-ए-इस्लामी में करीब 40% महिलाएं हैं। जमीनी कैडर से लेकर संगठन में ऊपर तक हर जगह महिलाओं की मौजूदगी है। हर जगह उन्हें सम्मान मिलता है। मर्यादा में रहकर संगठन चलाने का मौका मिलता है। कोई महिला राजनीति करे या चुनाव लड़े या न लड़े, यह उसका निजी और पारिवारिक फैसला होता है। हम किसी महिला पर चुनाव लड़ने के लिए दबाव नहीं डालते। फिर भी यूनियन परिषद और उपजिला परिषद में हमारी महिला प्रतिनिधि रही हैं। उन्होंने अच्छे से जिम्मेदारी निभाई है। संसद में भी 2001 और 1991 में हमारी महिला सदस्य रही हैं। उन्होंने अच्छा काम किया है। सवाल: आप कह रहे हैं कि महिलाओं और पुरुषों में फर्क नहीं है, फिर कुछ महिलाओं को तो टिकट देना चाहिए था?हमने कोशिश की है। मर्दों के लिए जो आसान है, वह महिलाओं के लिए नहीं है। 11 दिसंबर को चुनाव की तारीख का ऐलान हुआ था। अगले ही दिन ढाका-8 सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे शरीफ उस्मान हादी को दिनदहाड़े गोली मार दी गई। चार दिन पहले हमारी पार्टी से जुड़े एक नेता की शेरपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके अलावा हमारी महिला कार्यकर्ता चुनाव में काम कर रही होती हैं, तब दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता उन पर हमला करते हैं। उनका हिजाब उतार देते हैं। उनका सामान छीन लेते हैं। उन्हें परेशान करते हैं। महिलाओं की सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। इसलिए सभी महिलाएं चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं। वे राजनीति करेंगी या नहीं, यह उनका फैसला है। हम किसी पर दबाव नहीं डालते। हम मानते हैं कि माहौल और बेहतर बनाया जाए, तो भविष्य में महिलाएं चुनाव में ज्यादा हिस्सा लेंगी। सवाल: बांग्लादेश में दो महिलाएं प्रधानमंत्री रही हैं, फिर कोई काम महिलाओं के लिए कैसे मुश्किल हो सकता है?दोनों ने पिछले 30 साल में दो पार्टियों का नेतृत्व किया और प्रधानमंत्री बनीं। आगे भी कोई महिला आ सकती है। इसमें बांग्लादेश के संविधान में कोई रुकावट नहीं है। संसद में बहुमत पाने वाली पार्टी तय करेगी कि उसका नेता कौन होगा।जवाब: हर पार्टी की अपनी नीति और विचारधारा होती है। लोग नेताओं का बर्ताव, काबिलियत, लीडरशिप देखकर सही व्यक्ति और सही पार्टी को चुनेंगे। हमें उम्मीद है कि बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी को समर्थन मिलेगा। सवाल: बांग्लादेश में चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी हो रहा है। अगर फिर से संविधान बनाने की बात आई, तो क्या ये इस्लामिक कानूनों के हिसाब से बनेगा?12 फरवरी को होने वाले चुनाव से लोगों को बहुत उम्मीद हैं। 2014, 2018 और 2024 में हुए तीनों चुनाव देश की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सके। बल्कि चुनाव के नाम पर मजाक हुआ था। इस बार चुनाव के साथ-साथ जनमत संग्रह भी होगा। हमने लंबे विचार-विमर्श के बाद जुलाई चार्टर बनाया है। इसमें सुधार के कई प्रस्ताव शामिल हैं। हम उम्मीद कर रहे हैं कि बांग्लादेश के करीब 13 करोड़ वोटर इसमें शामिल होंगे। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी डेमोक्रेटिक और इस्लामी उसूलों के हिसाब से काम करने वाली पार्टी है। ये बांग्लादेश के लोगों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद बन गई है। शेख हसीना सरकार के दौरान जमात पर बहुत ज्यादा जुल्म हुआ। इस वजह से जमात-ए-इस्लामी के लिए लोगों में भावनाएं, उम्मीदें और समर्थन बढ़ा है। हम लोगों के साथ रहे, उनकी मदद की। हमेशा हमारी पॉलिसी रही है कि लोगों के साथ खड़े रहें। इसलिए आने वाले चुनाव में हम उम्मीद कर रहे हैं कि जमात जनता के समर्थन से अच्छी स्थिति में रहेगी।बांग्लादेश में हमने संविधान के लिए लड़ाई लड़ी है। पिछले डेढ़ साल से देश में अंतरिम सरकार है। उसके साथ राष्ट्रीय सुधार आयोग और जातीय ऐकमत्य कमीशन नाम से दो आयोग बने। इनके जरिए कई सुधार किए गए। इन सुधारों के आधार पर नया संविधान बन रहा है। बांग्लादेश अब उसी के आधार पर चलेगा। जनमत-संग्रह में कुल 48 धाराएं बदलेंगी। बांग्लादेश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच शक्तियों का बंटवारा होगा। अभी पूरी ताकत प्रधानमंत्री के पास है। ऐसी स्थिति अब नहीं रहेगी। कुछ शक्तियां राष्ट्रपति को मिलेंगी। प्रधानमंत्री का कार्यकाल ज्यादा से ज्यादा 10 साल का ही होगा। अगर जनमत संग्रह में हां के पक्ष में ज्यादा वोट होते हैं, तो फिर उसी के आधार पर बांग्लादेश और सरकारें चलेंगी। यह लोगों की उम्मीदों के मुताबिक होगा।तब हालात के मुताबिक, फैसला लेंगे। पहले भी बांग्लादेश में गठबंधन सरकारें रही हैं। 1991 में हमने BNP का समर्थन किया, 2001 में सरकार में रहे। इसमें कोई समस्या नहीं है।बांग्लादेश का सबसे बड़ा इस्लामिक संगठन है हिफाजत-ए-इस्लाम। ये संगठन बांग्लादेश में इस्लामिक राज चाहता है। पूरे बांग्लादेश में हिफाजत का नेटवर्क है। इसलिए चुनाव के दौर में हिफाजत की अहमियत बढ़ जाती है। संगठन के लीडर अजीज-उल-हक कहते हैं अगर जमात देश में इस्लामिक शासन नहीं लाता है तो हम उसके भी खिलाफ हो जाएंगे।2.

जमात के पहले हिंदू कैंडिडेट बोले- शरिया नहीं लाएंगे, पैसे बांटते कैमरे में कैद बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से ही माहौल हिंदुओं के खिलाफ है। शरिया कानून की वकालत करने वाली जमात की छवि हमेशा कट्टरपंथी पार्टी की रही है। हालांकि, इस बार जमात ने पहली बार चुनाव में हिंदू कैंडिडेट उतारा है। खुलना जिले की दाकोप सीट से लड़ रहे कृष्णा नंदी दावा करते हैं कि जमात बांग्लादेश में शरिया नहीं लाएगी। नंदी रैली में वोटरों को खुलेआम कैश बांटते कैमरे में भी कैद हो गए।हिमाचल में आज रात बारिश-बर्फबारी के आसारहरियाणा के 15 जिलों में 10 डिग्री से कम तापमानलखनऊ में तेज धूप निकली, बढ़ेगा तापमानदिन में गर्मी, सुबह-रात में ठंडपंजाब-चंडीगढ़ में अब ठंड और कम होगीबर्फ पिघलने से MP में आएंगी सर्द हवाएं…ठिठुरन रहेगी

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