Opinion : आंखों की शर्म समाप्त जाए तो सबकुछ खत्म होता सा लगता है... लोकतंत्र में वंशतंत्र का वर्चस्व! बिहार...

Bihar Chunav 2025 News

Opinion : आंखों की शर्म समाप्त जाए तो सबकुछ खत्म होता सा लगता है... लोकतंत्र में वंशतंत्र का वर्चस्व! बिहार...
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Bihar Chunav 2025 : बिहार के चुनावी मैदान में विधानसभा चुनाव में परिवारवाद का वो स्वरूप सामने आ गया है जो लोकतांत्रिक सोच पर ही सवाल खड़ा कर रहा है. राज्य की राजनीति में यह प्रवृत्ति अब केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं रही, बल्कि 'इस हम्माम में सब नंगे' हैं वाली बात को चरितार्थ करती दिख रही है.

पटना. बिहार के चुनावी मैदान में राजनीतिक परिवारों का बोलबाला है. विधानसभा चुनाव में कम से कम 42 प्रत्याशी ऐसे हैं, जिनके घरवाले पहले भी सांसद या विधायक रहे हैं. भाजपा, जदयू, राजद जैसी बड़ी पार्टियों से लेकर छोटी पार्टियों तक में परिवारवाद का बोलबाला है.

नई नवेली पार्टी जनसुराज ने भी परिवारवाद को बढ़ावा देते हुए ऐसे टिकट बांटे हैं जिससे ‘वंश तंत्र’ की तस्वीर साफ झलकती है. दरअसल, यह बिहार की राजनीति का कटु सत्य है और यह स्थिति सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और आंखों की शर्म को खत्म करती हुई प्रतीत हो रही है. पार्टी के मुखिया अपनी ही पार्टी में परिवार के सदस्यों को टिकट देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. समधन, बहू, पत्नी, भांजे और बहन… सबको टिकट देना, और फिर उनके साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया में सार्वजनिक करने की ‘हिम्मतगोई’… यह साफ-साफ बता रहा है कि परिवारवाद किस तरह से राजनीतिक पार्टियों में हावी हो गया है. सवाल यह है कि क्या राजनीतिक पार्टियां परिवारवाद को खत्म कर पाएंगी या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? हम ‘लोकतंत्र के नाम पर वंश तंत्र’ के इस मॉडल को आंकड़ों से भी समझते हैं. जब पूरा परिवार मैदान में उतरा पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने इस बार वंशवाद की हदें पार कर दी हैं. छह में से पांच उम्मीदवार उनके परिवार या फिर किसी न किसी नेता के रिश्तेदार हैं. जीतन राम मांझी की पारिवारिक सेवा में बहू भी और समधन भी… सब मैदान में उतर आई हैं. गया की इमामगंज सीट से जीतन राम मांझी की बहू दीपा कुमारी मैदान में हैं, तो बाराचट्टी से मांझी की समधन ज्योति देवी ताल ठोक रही हैं. वहीं, सिकंदरा सीट से उनके दामाद प्रफुल्ल मांझी चुनावी मैदान में हैं तो अतरी से एमएलए अनिल कुमार के भतीजे रोमित कुमार उम्मीदवार बनाए गए हैं. जबकि टिकारी से पूर्व एमपी अरुण कुमार के रिश्तेदार अनिल कुमार चुनाव लड़ रहे हैं. मांझी का ‘फैमिली पॉलिटिकल मॉडल’ मांझी की बहू दीपा कुमारी इमामगंज सीट से मैदान में हैं. मांझी की समधन ज्योति देवी बाराचट्टी सीट से चुनाव लड़ रही हैं. मांझी के दामाद प्रफुल्ल मांझी सिकंदरा सीट से खड़े हैं. विधायक अनिल कुमार के भतीजे रोमित कुमार अतरी से चुनाव लड़ रहे हैं. पूर्व एमपी अरुण कुमार के रिश्तेदार अनिल कुमार टिकरी से उम्मीदवार हैं. परिवारवाद पर मांझी का जवाब ‘लाजवाब’! आंकड़े देख-समझ लिए तो सवाल उठाने वालों को जीतन राम मांझी ने जो जवाब दिया वह भी काबिले गौर है. इरशाद फरमाइये- ”परिवार भी समाज का हिस्सा है और इसलिए क्षमता है तो उनका भी अधिकार है चुनाव लड़ने का. ” मांझी के जवाब के बाद सवाल यही है कि क्या राजनीति अब परिवार की जागीर बन चुकी है? अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं का फिर क्या होगा, जनता किसी परिवार की सेवा में क्यों लग जाए? ‘जेंडर-फेस’ भी परिवारवाद का हिस्सा राजनीति में परिवारवाद का चेहरा अब पति-पत्नी के बीच भी उलट-पलट हो गया है. अनंत सिंह पूर्व आरजेडी विधायक नीलम देवी के पति हैं, लेकिन अब जेडीयू के टिकट पर मैदान में हैं. उन्होंने खुद कहा- पत्नी क्षेत्र में नहीं जाती, इसलिए मैं खुद लड़ूंगा.” इसी तरह, स्वर्णा सिंह 2020 में बीजेपी से विधायक बनीं, लेकिन अब उनकी जगह उनके पति सुजीत सिंह को टिकट दिया गया है. पार्टी में शामिल होने के अगले ही दिन उन्हें टिकट मिल गया. जाहिर है ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि टिकट अब जनता की निष्ठा से नहीं, बल्कि परिवार की सदस्यता से तय हो रहे हैं. बीजेपी में 11% ‘परिवारवादी उम्मीदवार’ सबसे पहले बात भाजपा की क्यों कि खुद को ‘पार्टी विद डिफरेंट’ कहने वाली बीजेपी हमेशा परिवारवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करती आई है. लेकिन, वास्तविक आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं. पार्टी की 101 उम्मीदवारों की सूची में 11 उम्मीदवार यानी 10.9% ऐसे प्रत्याशी हैं जो किसी न किसी राजनीतिक परिवार से हैं. नाम पर भी नजर डालिए- नितिन नवीन – पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा विधायक रहे. नीतीश मिश्रा – पूर्व सीएम डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के पुत्र. राघवेंद्र प्रताप सिंह – पिता अंबिका शरण सिंह उप वित्त मंत्री रह चुके. संजीव चौरसिया – पिता गंगा प्रसाद चौरसिया, पूर्व राज्यपाल. श्रेयसी सिंह – पिता दिग्विजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री. नीतीश का जदयू भी परिवारवाद से दूर नहीं साफ है कि भाजपा में भी ‘परिवारवाद की एंट्री बाय बैकडोर’ साफ दिखती है. वहीं, जदयू, लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियों में भी वंशवाद साफ-साफ सामने है. जदयू ने भी परिवारवाद से दूरी नहीं बनाई और बाहुबली आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद और पूर्व मंत्री मंजू वर्मा के बेटे अभिषेक कुमार को टिकट दिया है. चिराग और कुशवाहा की पार्टी का हाल जानिए लोक जनशक्ति पार्टी में तो यह अनुपात और भी ज्यादा है. चिराग पासवान ने अपनी पार्टी की 29 सीटों में से 8 यानी 27.6 प्रतिशत सीटों पर परिवारवादी उम्मीदवार उतारे हैं. इनमें उनका भांजा सिमंत मृणाल भी शामिल है. वहीं, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मंच में भी परिवारवाद हावी है. कुशवाहा ने अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को सासाराम से टिकट दिया है. आरजेडी में परिवारवाद का ‘राजनीतिक डीएनए’ लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है. उनके दोनों बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव पहले से राजनीति में हैं. तेज प्रताप यादव की साली करिश्मा राय को तेजस्वी यादव ने परसा से टिकट दिया है. पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब रघुनाथपुर से उम्मीदवार हैं. राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल तिवारी शाहपुर से मैदान में हैं. राजनीति के जानकार कहते हैं कि राजद का यह राजनीतिक ढांचा ही ऐसा है जहां वंशवाद ही संगठन की पहचान बन चुका है. जनसुराज का ‘परिवारवाद मुक्त’ दावा और हकीकत प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने बड़े जोश से दावा किया था कि- यह बाप-दादा की पार्टी नहीं है. लेकिन, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की बेटी लता सिंह को अस्थावां से टिकट मिला और समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर की पोती जागृति ठाकुर को मोरवा से उम्मीदवार बनाया. जाहिर है यह दिखाता है कि परिवारवाद अब टिकट वितरण का आधार बन चुका है-चाहे पार्टी नई हो या पुरानी. सच बोलते आंकड़े, बिहार में 27% विधायक वंशवादी एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट बताती है कि बिहार विधानसभा के मौजूदा जनप्रतिनिधियों में 27% वंशवादी हैं. विधानसभा की 243 सीटों में से 66 विधायक, विधान परिषद की 75 सीटों में से 16 एमएलसी वंशवाद की पृष्ठभूमि से आते हैं. वहीं, 40 लोकसभा सांसदों में से 15 सांसद और राज्यसभा में 16 में से 1 सांसद राजनीतिक परिवार से आते हैं. यह अनुपात बताता है कि लोकतंत्र में जनता की भागीदारी घट रही है और परिवार की पकड़ बढ़ रही है. जनता के सवाल और सियासत की ‘नैतिक दिवालियापन’ जब पार्टी प्रमुख अपने परिवार को टिकट देकर ‘गठबंधन की मजबूरी’ कहते हैं तो सवाल उठता है कि क्या बिहार में राजनीति अब जनसेवा नहीं, पारिवारिक विरासत के लिए मेवा का जरिया बन चुकी है? सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और आंखों की शर्म खत्म हो जाए तो सबकुछ खत्म हो जाता है और ऐसा लग रहा है कि बिहार की राजनीति आज इसी मोड़ पर खड़ी है. कर्पूरी और जेपी से मिली ‘पहचान’ को कर रहे बदनाम! दुख की बात तो यह है कि यह वही राज्य है जहां कभी कर्पूरी ठाकुर और जेपी आंदोलन ने राजनीतिक शुचिता की मिसाल कायम की थी, लेकिन अब वही बिहार परिवारवादी उम्मीदवारों की दौड़ में आगे है. खास बात यह कि इसमें कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श करने वाले और जेपी के अनुयायी बताने वाले नेता इस में सबसे आगे हैं. ऐसे में आम जनता के लिए विकल्प सीमित हैं- या तो किसी के बेटे को वोट दीजिए या किसी की बहू को या फिर किसी नाते-रिश्तेदारों! अब अंतिम भरोसा तो बस हम पर-आप पर ही… बिहार की राजनीति में परिवारवाद अब अपवाद नहीं, बल्कि सियासत की संरचना का आधार बन चुका है. जो पार्टियां ‘नया बिहार’ या ‘बदलाव की राजनीति’ का दावा करती हैं… उन्होंने भी परिवार को टिकट देने में कोई परहेज़ नहीं किया. सवाल अब यही है-क्या लोकतंत्र में जनता की भागीदारी खत्म होती जा रही है और राजनीति, परिवारों की निजी संपत्ति बनती जा रही है? ऐसे में उम्मीद की रोशनी आम लोग हैं और लोकतंत्र के इस वंशवादी चक्र को तोड़ना अब मतदाता के विवेक पर निर्भर है.

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