Opinion: बिहार चुनाव में 'फैक्टर D' फिक्स करेगा NDA की जीत, 20% वोट खींचने के लिए तेजस्वी-राहुल एंड टीम के ...

बिहार के दलित वोटर News

Opinion: बिहार चुनाव में 'फैक्टर D' फिक्स करेगा NDA की जीत, 20% वोट खींचने के लिए तेजस्वी-राहुल एंड टीम के ...
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Bihar Dalit voters News: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का रंग चढ़ने लगा है. इस चुनाव में कई मुद्दे हैं, लेकिन दलित वोटरों का रुझान निर्णायक साबित हो सकता है. एनडीए खेमा जहां जीतन राम मांझी, चिराग पासवान, श्याम रजक और अशोक चौधरी चेहरों के साथ है, वहीं महागठबंधन राजेश राम के चेहरे के साथ मुद्दों के जरिए अपनी बात पहुंचाने के प्रयास में है.

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 अब अपने उठान पर है. एनडीए और महागठबंधन दोनों गठबंधन में प्रत्याशियों को लेकर करीब-करीब क्लैरिटी दिखने लगी है. गठबंधन के सहयोगियों के बीच सीट बंटवारे को लेकर एनडीए खेमा बाजी मार चुका है, तो महागठबंधन में अभी भी छह सीटों पर सहयोगी दलों के प्रत्याशी अब तक आमने-सामने हैं.

हालांकि महागठबंधन लगातार दावा कर रहा है कि नाम वापसी की प्रक्रिया पूरा होने के बाद एक सीट पर उनके गठबंधन का एक ही प्रत्याशी होगा. चलिए, महागठबंधन सीट बंटवारे की समस्या को अपने स्तर पर जैसे भी सुलझाए, यह तो कैंडिडेट की फाइनल लिस्ट आने के बाद साफ हो जाएगा. लेकिन अबतक की तैयारी में ‘फैक्टर D’ के मोर्चे पर दोनों गठबंधन के बीच बड़ा गैप नजर आ रहा है. यहां ‘फैक्टर D’ का मतलब दलित वोट बैंक से है. बिहार चुनाव में निर्णायक रोल निभा सकते हैं दलित बिहार की लगभग 13 करोड़ आबादी में दलितों की हिस्सेदारी करीब 19.65 फीसदी है. यानी लगभग 2.57 करोड़ दलित या अनुसूचित जाति के लोग हैं. यहां बता दें कि पूरे देश की 8.5 फीसदी दलित आबादी केवल बिहार में है. बिहार में 23 अनुसूचित जातियों को सरकारी मान्यता है, जिनमें से छह प्रमुख जातियां- दुसाध , रविदास , मुसहर , पासी , धोबी और भुइयां - बिहार के 90% दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं. यह तय है कि आगामी विधानसभा चुनावों में दलितों का वोट हर बार की तरह निर्णायक साबित होगा. सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और विपक्षी महागठबंधन दोनों ही इस महत्वपूर्ण वोटबैंक को लुभाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं. दलित वोटरों के लिए NDA के पास चिराग, मांझी और श्याम का चेहरा चुनावों में मुद्दों के साथ चेहरे का भी खास रोल होता है. मौजूदा वक्त में बिहार में दलित चेहरे की बात करें तो चिराग पासवान और जीतन राम मांझी सबसे बड़े दो नाम जेहन में आते हैं. गौर करने वाली बात यह है कि 2025 के चुनाव में बिहार के दोनों बड़े दलित चेहरे NDA खेमा के साथ हैं. केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और केंद्रीय मंत्री और पूर्व सीएम जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा एनडीए का घटक दल है. जीतन मांझी इस समय गया लोकसभा सीट से सांसद हैं. पिछले दो चुनावों के वोटिंग ट्रेंड को देखकर राजनीतिक अनुमान है कि बिहार के मगध क्षेत्र में 2-3 फीसदी वोटों पर जीतन मांझी का प्रभाव है. बिहार में सामाजिक रूप से सबसे अधिक पिछड़ी मुसहर जाति मानी जाती है. जीतन मांझी उसी बिरादरी से आते हैं. चिराग पासवान बिहार के सबसे प्रभावशाली युवा दलित नेता के रूप में उभार पर हैं. माना जाता है कि चिराग जिस गठबंधन में होते हैं उनकी जाति पासवान बिरादरी के ज्यादातर वोट उसी तरफ जाते हैं. इसके अलावा चिराग पासवान भुइयां जाति के लोगों के बीच भी काफी लोकप्रिय माने जाते हैं. बिहार के दलितों में बड़ी हिस्सेदारी वाली जाति धोबी भी है. कभी आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के साथ साए की तरह रहने वाले धोबी समाज के सबसे बड़ा चेहरा श्याम रजक इस वक्त जेडीयू के टिकट पर पटना जिले की फुलवारीशरीफ सीट से भाग्य आजमा रहे हैं. इसके अलावा पासी समाज के बड़े चेहरे के रूप में नीतीश कैबिनेट के कद्दावर नेता अशोक चौधरी हैं. लोकसभा चुनाव 2024 में चिराग पासवान के उभार का देखते हुए विधानसभा चुनाव में भी NDA गठबंधन ने उन्हें खास तवज्जो दी है. एनडीए में चिराग की पार्टी LJP को 29 सीटें दी गई हैं. महागठबंधन के पास क्या है दलितों को लुभाने की रणनीति? लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव मुख्य रूप से मुस्लिम+यादव ‘MY’ आधार वोटबैंक को बरकरार रखते हुए दलितों समेत समाज के अन्य तबके का वोट हासिल करना चाहते हैं. गौर करने वाली बात यह है कि आरजेडी के पास मौजूदा वक्त में दलितों का कोई बड़ा और चर्चित चेहरा नहीं है. महागठबंधन में सहयोगी कांग्रेस दलितों को ध्यान में रखकर राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. राजेश कुमार राम औरंगाबाद के कुटुंबा सीट से विधायक और इस चुनाव में प्रत्याशी भी हैं. राजेश रविदास समाज से हैं. ओवरऑल देखें तो महागठबंधन के पास दलित चेहरे के नाम पर केवल राजेश राम हैं तो दूसरी तरफ एनडीए में जीतन राम मांझी, चिराग पासवान और श्याम रजक जैसे चर्चित चेहरे हैं. बिहार चुनाव में दलित चेहरे की कमी को मुद्दों के जरिए भरपाई करने की कोशिश में है. आरजेडी के सीएम प्रत्याशी तेजस्वी यादव लगातार अपनी जनसभाओं में अपने पिता लालू प्रसाद यादव को दलितों के उत्थान का सबसे बड़ा नेता के रूप में पेश करते हैं. जहां तक मुद्दों का सवाल है तो महागठबंधन के नेता दलित CJI बीआर गवई पर जूता फेंकने, बीजेपी शासित हरियाणा में एक दलित IPS अधिकारी की खुदकुशी और उत्तर प्रदेश के रायबरेली में एक दलित युवक की लिंचिंग – का उदाहरण देकर बीजेपी और एनडीए को ‘दलित विरोधी’ बताने में जुटे हैं. इससे पहले 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब बीजेपी ने 400 पार का नारा दिया था तब महागठबंधन के नेताओं ने इसे ही मुद्दा बनाया था. दलितों के बीच प्रचार किया था कि 400 सीटें आने के बाद बीजेपी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान को बदल दिया जाएगा. इस प्रचार का खास प्रभाव दिखा और बीजेपी अकेले दम पर बहुमत से पिछड़ते हुए 240 सीटों पर सिमट गई. दलितों पर जनसुराज की भी नजर बिहार चुनाव में खुद को तीसरी ताकत के रूप में पेश कर रही जनसुराज की नजर भी दलित वोट बैंक पर है. जनसुराज संस्थापक प्रशांत किशोर ने दलित समाज से आने वाले मनोज भारती को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. इसके अलावा टिकट बंटवारे में भी दलितों पर खास ध्यान दिया है. फ्लोटिंग रहे हैं बिहार के दलित वोटर बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से 38 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. यहां यह भी याद दिला दें 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने पूरे चुनाव प्रचार में RSS प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान को जोर शोर से उठाया, जिसका उनके गठबंधन को जोरदार फायदा मिला था. लालू यादव ने पूरे चुनाव के दौरान यही कहा कि मोहन भागवत के बयान से साबित हो गया है कि बीजेपी आरक्षण खत्म करना चाहती है. 2015 के चुनाव में जीतन मांझी और चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान भी एनडीए में थे, लेकिन वे अपेक्षा के अनुरूप दलितों का वोट गठबंधन के प्रत्याशियों को ट्रांसफर नहीं करा पाए थे. 2015 के चुनाव में आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ रही थी. वहीं 2020 के चुनाव में दलितों का ज्यादा सपोर्ट एनडीए को मिलता दिखा था. हालांकि चिराग पासवान की ओर जेडीयू प्रत्याशियों के खिलाफ कैंडिडेट उतारने के चलते दलित वोटों का बंटवारा भी देखने को मिला था. ऐसे में अनुमान लगाना मुश्किल है कि 2025 के चुनाव में बिहार का दलित किस गठबंधन को एकतरफा वोट करेगा.

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