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news18 hindi | July 17, 2019, 12:05 PM ISTनीति आयोग की हालिया रिपोर्ट कहती है कि भारत के लगभग 21 बड़े राज्य जलसंकट से जूझ रहे हैं. यानी लगभग 100 मिलियन लोग पानी की तंगी से प्रभावित हैं. इसके बावजूद पानी बचाने को लेकर ज्यादातर लोग काफी लापरवाह हैं.
आगाह किया जा रहा है कि यही हालात रहे तो पानी के लिए तीसरा विश्वयुद्ध हो सकता है. ऐसे में पानी के संचय की पुरानी तकनीकों पर काम करने की जरूरत है. जानिए, वे 7 परंपरागत तकनीकें जिनके जरिए हमारे पुरखे पानी बचाते रहे हैं.झालरा- ये आयताकार होते हैं जिनमें भीतर उतरने के लिए तीन या चार तरफ सीढ़ियां होती हैं. इसमें झील या पास के जलाशय से पानी भरा जाता है. इन्हें बनाने का मकसद धार्मिक संस्कारों, शाही समारोहों और कम्युनिटी की जरूरतें पूरा करना था. बाद में ये इतने लोकप्रिय हो गए कि पानी की आसान आपूर्ति का जरिया बन गए. राजस्थान में पानी का ये स्त्रोत लोकप्रिय था. आज भी जोधपुर शहर में 8 झालरा हैं. इनमें से एक 1600 ईसवीं पूर्व का माना जाता है.बावड़ी- ये पानी का अनोखा सोता है जो कभी राजस्थान में पानी की आपूर्ति के लिए बड़े नेटवर्क का काम करते हैं. इसमें रेनवॉटर का इस्तेमाल किया जाता था. बारिश के पानी को नहरों के जरिए इनकी तरफ मोड़ दिया जाता था. इससे बावड़ी के नीचे जलस्तर अच्छा होने लगेगा और कुछ ही बारिशों में ये पानी से लबालब हो जाएगी. गर्मी में पानी भाप बनकर न उड़े या कम नुकसान हो, इसके लिए बावड़ी काफी गहरी बनाई जाती रही.टांका- ये ट्रेडिशनल रेनवॉटर संचयन की तकनीक है जो राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में अपनाई जाती है. जैसे कि थार रेगिस्तान में. टांका बेलनाकार और पक्का भूमिगत गड्ढा होता है. इसमें बारिश के पानी को नालियों या गोलाकार बनावट के जरिए पानी भरा जाता है. एक बार पूरी तरह से भर जाने पर टांका पूरे साल रह सकता है. एक औसत आकार का टांका पांच सदस्यीय परिवार के लिए काफी होता है.जोहड़- भूमिगत पानी बचाने के लिए ये सबसे पुरानी तकनीकों में से एक है. ये मूलतः मिट्टी के छोटे-छोटे चेक डैम हैं जो बारिश के पानी को जमा करके ही बनाए जाते हैं. जोहड़ों की बनावट चांद के आकार की होती है. जिस हिस्से पर जल का दबाव ज्यादा हो सकता है, उसे दो या तीन गुना ज्यादा गहरा बनाते हैं. जोहड़ बनाते हुए ध्यान रखा जाता है कि पानी का वाष्पीकरण न हो या कम से कम हो. यानी इसकी गहराई ज्यादा होती है, जबकि लंबाई-चौड़ाई कम होती है. जिस जगह पर मुरूम यानी एक खास तरह की गिट्टी वाली जमीन होती है, जोहड़ वहीं बनाए जाते हैं ताकि पानी लंबे वक्त तक जमा रह सके.पानम केनी - केरल में ये पारंपरिक तकनीक काफी प्रचलित है. खासकर आदिवासी इलाकों में इसका ज्यादा इस्तेमाल होता है. इसमें एक विशेष तरह के कुएं में पानी भरा रखने के लिए लकड़ी के सिलेंडरों का उपयोग होता है. ये लकड़ी के सिलेंडर चार फीट चौड़े और इतने ही लंबे होते हैं. बाद में इन सिलेंडरों को छोटे-छोटे कुओं में फिट कर दिया जाता है. देखा गया है कि इनमें पानी कभी खत्म नहीं होता है. यहां तक कि तेज गर्मी में भी इन इलाकों में इसी तकनीक से भरपूर पानी रहता है.कुंड- यह तश्तरी के आकार की संरचना होती है जो धीरे-धीरे नीचे की ओर जाती है और बीच में काफी गहरी होती है. इसे तैयार करने का मकसद पीने का पानी जमा करना था. पश्चिमी राजस्थान और गुजरात के रेतीलों इलाकों में जल संचय की यह तकनीक काफी अपनाई गई. कुंड में भीतर और बाहर की ओर चूने और राख की मोटी परत लगाई जाती थी, जिससे पानी ठंडा और शुद्ध भी रहता था. माना जाता है कि 1607 ई. में राजा सूर सिंह ने सबसे पहले कुंडों के निर्माण की तकनीक बताई और मेलन गांव में सबसे पहले कुंड बनाया गया था.तालाब- ये एक तरह के जलाशय हैं जहां घरेलू जरूरतों और पीने के पानी के लिए जलसंचय किया जाता है. ये प्राकृतिक भी हो सकते हैं और मानव निर्मित भी हो सकते हैं. बुंदेलखंड क्षेत्र के टीकमगढ़ में पोखरणी तालाब प्राकृतिक तालाब का उदाहरण है. आकार के आधार पर तालाब का नाम बदल जाता है. जैसे 5 बीघा से कम क्षेत्रफल वाले जलाशय को तलाई कहते हैं. मध्यम आकार की झील को बांधी कहते हैं.
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