Explainer: ममता मिली न वाम टिके, अब अकेले मैदान में उतरेगी कांग्रेस; बड़ा सवाल- बंगाल में फायदा होगा या फजीहत?

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Explainer: ममता मिली न वाम टिके, अब अकेले मैदान में उतरेगी कांग्रेस; बड़ा सवाल- बंगाल में फायदा होगा या फजीहत?
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West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने वामदलों से गठबंधन तोड़कर अकेले ही 294 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. लेकिन सवाल है कि क्या इस फैसले से कांग्रेस को फायदा होगा या फजीहत?

West Bengal Assembly Election 2026 Congress Strategy: पश्चिम बंगाल में असेंबली चुनाव के लिए सभी पार्टियों में जबरदस्त शह-मात का खेल चल रहा है. ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस जहां एक बार फिर अपनी सरकार बनाने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रही है.

वहीं प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी पहली बार बंगाल की सत्ता में कमल खिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है. कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कितना सही? इन सबके बीच कांग्रेस भी अपनी खोई जमीन पाने की जुगत में लगी है. 2021 के असेंबली चुनावों से सबक लेते हुए उसने इस बार वामदलों के साथ जारी अपना गठबंधन तोड़ दिया है. उसने सभी 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. इस फैसले को राजनीतिक थोड़ी हैरत के साथ देख रहे हैं. कुछ इसे कांग्रेस के लिए साहसिक फैसला बता रहे हैं तो कुछ इसे आत्मघाती मान रहे हैं. असल में टीएमसी और बीजेपी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस ने 10 साल पहले वामदलों के साथ गठबंधन किया था. इसके तहत पार्टी ने 2016 और 2021 के असेंबली और लोकसभा चुनाव एक साथ मिलकर लड़े. लेकिन गठबंधन में रहकर चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस का जनाधार सिमटता चला गया. 10 साल में गड्ढे में गिरती चली गई कांग्रेस कांग्रेस ने 2016 के असेंबली चुनाव में 12.25% वोट शेयर हासिल कर 44 सीटें जीती थीं. लेकिन 2021 के चुनाव में उसका वोट शेयर घटकर 9 प्रतिशत हो गया और असेंबली में उसे एक भी सीट नहीं मिली. वर्ष 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस राज्य में महज एक सीट जीत सकी. पार्टी का यह हाल तब हुआ, जब वह पिछले 10 सालों से वामदलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ती आ रही है. दिलचस्प बात ये है कि जब वामदलों के साथ रहकर भी कांग्रेस आगे नहीं बढ़ सकी तो उसने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के साथ पींगे बढ़ाने की कोशिश की. जिससे वह उसके साथ गठबंधन करके अपनी हालत सुधार सके. इसके लिए उसने अपने फायरब्रांड नेता और ममता बनर्जी के कटु आलोचक अधीर रंजन चौधरी को पद से हटाकर शुभंकर सरकार को प्रदेशाध्यक्ष बना दिया. रंजन की कुर्बानी के बाद भी नहीं जागी ममता अधीर रंजन की इस कुर्बानी के बाद भी ममता का ममत्व नहीं जागा और उन्होंने कांग्रेस के साथ दोस्ती से इनकार कर दिया. इसके बाद कोई चारा न देखकर अब कांग्रेस ने अकेले ही राज्य की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. लेकिन सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस का यह कदम कहीं पहले से ही आईसीयू में पड़ी कांग्रेस को कब्र में ही न भेज दे. इसकी वजह राज्य में तेजी से पैर पसार रही बीजेपी और पहले से ही मजबूत टीएमसी है. पिछले 10 सालों में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में अपनी जबरदस्त पकड़ बनाई है. पार्टी ने 2016 में 10.16% शेयर पाकर असेंबली में 3 सीटें जीती थीं. जबकि 2021 में उसका वोट शेयर बढ़कर 37.97% हो गया और सीटें भी 3 से बढ़कर 77 तक पहुंच गईं. वहीं ममता बनर्जी की टीएमसी लगातार 3 टर्म से राज्य की गद्दी पर कब्जा जमाए हुए हैं. कांग्रेस की सफलता पर उठ रहे संदेह माना जा रहा है कि इस बार भी मेन टक्कर टीएमसी और बीजेपी में ही होगी. ऐसे में पहले से ही मुकाबले से बाहर नजर आ रही कांग्रेस को कितने लोग वोट देना चाहेंगे, यह देखने लायक बात होगी. यही वजह है कि कई लोग इसे कांग्रेस का आत्मघाती फैसला बता रहे हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस को अकेले लड़ने के बजाय किसी प्रमुख पार्टी के साथ मिलकर राज्य में चुनाव लड़ना चाहिए था. एपस्टीन और ट्रेड डील को लेकर राहुल गांधी पर बरसे हरदीप पुरी, कहा- फ्रेमवर्क पढ़ा होता तो गधा बनने से बच जाते वहीं दूसरे खेमे का कहना है कि कांग्रेस ने वामदलों के साथ गठबंधन करके भी देख लिया. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. ममता बनर्जी गठबंधन करना नहीं चाहती. ऐसे में अकेले लड़ने के सिवाय और विकल्प ही क्या बचता है. वैसे भी कांग्रेस के पास अब खोने के लिए बचा ही क्या है. लिहाजा जोखिम उठाने में गलत ही क्या है. संभव है कि ऐसे ही प्रयास से पार्टी फिर से राज्य में अपना जनाधार पा जाए. राज्य में बीजेपी ने लगा रखा है पूरा जोर कांग्रेस जहां जनाधार पाने की कोशिश में है. वहीं बीजेपी इस बार सत्ता पाने के लिए पूरा दम लगाए हुए है. नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी सभी 294 सीटों पर विधानसभा इंचार्ज नियुक्त कर चुकी है. राज्य के लिए 11 सदस्यीय राज्य संकल्प पत्र समिति गठित की जा चुकी है. पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रैलियों के लिए प्रोग्राम सेट किए जा रहे हैं. बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर ममता बनर्जी को लगातार घेरा जा रहा है. टीएमसी इन हमलों का जवाब तो दे रही है लेकिन अंदर ही अंदर उसे भी इस बार अपनी सत्ता खिसकने का डर सता रहा है. देखने लायक बात होगी कि इस बार बंगाल में सत्ता का ऊंट किस करवट बैठने वाला है.

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