Explainer: तलाक ए हसन क्या होता है, क्यों इसके मामले सुप्रीम कोर्ट में, तुरंत तीन तलाक से कैसे अलग

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Explainer: तलाक ए हसन क्या होता है, क्यों इसके मामले सुप्रीम कोर्ट में, तुरंत तीन तलाक से कैसे अलग
तलाक-ए-हसनSupreme Court On Talaq-E-HasanMuslim Divorce Law India
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तलाक-ए-हसन सुन्नी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मान्यता प्राप्त इस्लामी तलाक की एक पारंपरिक विधि है. ये इंस्टेंट ट्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) से अलग है, जिसे 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किया गया था. जानते हैं क्या है ये और सुप्रीम कोर्ट ने इससे संबंधित मामलों में क्या व्यवस्था दी है.

तलाक ए हसन को चुनौती देने वाले कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट में चल रहे हैं. संवैधानिक तौर पर तलाक के इस तरीके पर अभी स्थिति स्पष्ट साफ नहीं. सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक या गलत नहीं करार दिया है. अलबत्ता वो इन मामलों पर सुनवाई कर रहा है.

हालांकि नवंबर 2025 में इस मामले की सुनवाई के दौरान मौजूदा चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने टिप्पणी की कि “क्या एक सभ्य समाज को इस तरह की प्रथा की अनुमति देनी चाहिए?” इसे महिलाओं के खिलाफ एकतरफा तलाक प्रक्रिया बताया जाता रहा है. अदालत ने मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को रेफर करने की संभावना तो जताई है. लेकिन इन मामलों की सुनवाई जारी है. कुछ मामलों में अदालत ने मध्यस्थता कराने की व्यवस्था दी है. जानते हैं कि तलाक के इस तरीके के बारे में. सुप्रीम कोर्ट इन मामलों पर क्या कर रहा है. आगे क्या होगा तलाक ए हसन क्या है, क्या इंस्टैंट तीन तलाक से अलग है - तलाक-ए-हसन मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक पारंपरिक इस्लामी तलाक की विधि है, जो मुख्य रूप से सुन्नी मुसलमानों में प्रचलित है. यह एकतरफा तलाक का एक रूप है, जहां पति अपनी पत्नी को तीन महीनों की अवधि में तीन बार “तलाक” शब्द का उच्चारण करके शादी को खत्म कर सकता है. बस ये तुरंत तीन तलाक जैसा नहीं होता. हर उच्चारण के बीच कम से कम एक महीने का अंतराल होता है, जो सुलह का अवसर देता है. यह प्रथा कुरान की सूरा बकरा और सूरा तलाक की शुरुआती आयतों पर आधारित है, जहां तलाक की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से बताया गया है. तलाक-ए-हसन को “अहसन तलाक” के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए; अहसन तलाक में पति एक ही बार में तलाक देता है, लेकिन इद्दत के दौरान सुलह संभव होती है. तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया अधिक समय लेने वाली है, जो इसे इंस्टेंट ट्रिपल तलाक से अलग करती है. सुप्रीम कोर्ट तलाक ए हसन से् संबंधित मामलों की सुनवाई कर रहा है सुप्रीम कोर्ट तलाक के इस तरीके को किस तरह देखता है या व्याख्या करता है - सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन को तत्काल तीन तलाक से अलग माना है, लेकिन इसकी एकतरफा प्रकृति पर सवाल उठाए हैं. यह अभी पूरी तरह संवैधानिक रूप से मान्य है, पर चुनौतियां लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में कहा कि तलाक-ए-हसन तीन तलाक जैसा नहीं है, क्योंकि इसमें तीन मासिक अंतराल पर तलाक की घोषणा होती है, जो सुलह का अवसर देती है. हालिया मामलों में कोर्ट ने इसे सभ्य समाज के लिए अनुपयुक्त बताया और कुछ केसों में अंतरिम रोक लगाई, जैसे पति की गैर-हाजिरी या धोखाधड़ी के आरोपों पर. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पांच जजों की संविधान पीठ में विचार कर सकता है. इसकी फिलहाल संवैधानिक स्थिति क्या है - तलाक-ए-हसन मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मान्य है, जो अनुच्छेद 25 के अधीन आता है. याचिकाकर्ता इसे अनुच्छेद 14 , 15, 21 और 25 का उल्लंघन मानते हैं, क्योंकि यह पुरुष-प्रधान है. कोर्ट ने अभी इसे असंवैधानिक घोषित नहीं किया. अलबत्ता सीजेआई सूर्यकांत की बेंच में सुनवाई जारी है. तलाक ए हसन और तलाक ए बिद्दत यानि इंस्टेंट तलाक में क्या अंतर है - तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-बिद्दत इस्लामी तलाक प्रक्रियाओं के दो अलग-अलग रूप हैं, जहां मुख्य अंतर समयावधि, सुलह के अवसर और कानूनी मान्यता में है. तलाक-ए-हसन तीन मासिक चक्रों में करीब 90 दिनों में चलती है. इसमें हर महीने में एक बार ‘तलाक’ उच्चारण किया जाता है. हर चरण में पति-पत्नी एक साथ रहते हैं. अक्सर ऐसे तलाक में सुलह हो जाती है और ये प्रक्रिया रद्द हो जाती है. लेकिन अगर हर महीने तलाक बोला जाता है और ये तीन बार हो जाता है तो तीसरे उच्चारण के बाद तलाक स्थायी हो जाता है, इसमें हलाला की जरूरत नहीं पड़ती. तलाक-ए-बिद्दत एक ही बैठक में तुरंत ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कहकर तलाक देने का विवादास्पद तरीका था, जिसमें कोई सुलह का अवसर नहीं मिलता. मुस्लिम महिलाओं ने तलाक ए हसन के खिलाफ क्यों याचिका दी - मुस्लिम महिलाओं ने तलाक-ए-हसन के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं क्योंकि यह प्रथा एकतरफा, भेदभावपूर्ण और महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि केवल पति को तीन मासिक चक्रों में तलाक देने का अधिकार है, जबकि महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिलता. यह संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 , 21 का उल्लंघन माना जाता है. कई मामलों में पतियों ने दहेज उत्पीड़न या शारीरिक हिंसा के बाद इस प्रक्रिया का दुरुपयोग किया, जैसे नोटिस भेजकर महिला को घर से निकाल दिया. ये सती प्रथा जैसी कुप्रथा बताई गई, जो महिलाओं को कमजोर बनाती है और न्यायिक प्रक्रिया से वंचित रखती है. तीन तलाक के बाद अब इसे समाप्त करने की मांग तेज है. तलाक ए हसन की शर्तें क्या होती हैं, ये कब नहीं कहा जा सकता है, इसके हाल के मामलों में क्यों कोर्ट ने आपत्ति की - तलाक ए हसन की प्रक्रिया महिलाओं की मासिक अवधि के दौरान नहीं की जा सकती. यदि पत्नी गर्भवती है, तो घोषणा गर्भावस्था के अंत तक स्थगित रहती है. कुरान तलाक को नियंत्रित करता है, लेकिन तलाक-ए-हसन का स्पष्ट उल्लेख नहीं है. यह हदीस और फिक्ह से पैदा माना गया है. सुन्नी संप्रदायों में ये मान्य है, जबकि शिया में खुला तलाक अलग है. तलाक ए हसन के दौरान कैसे सुलह होती है तलाक-ए-हसन के दौरान सुलह प्रक्रिया इस्लामी परंपरा के अनुसार चरणबद्ध तरीके से होती है, जिसमें प्रत्येक तलाक उच्चारण के बाद पुनर्मिलन का अवसर दिया जाता है. हर महीने के तलाक उच्चारण यानि तुहर अवधि के बाद पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हैं. इस दौरान परिवार के बुजुर्ग, रिश्तेदार या मध्यस्थ सुलह के प्रयास करते हैं, जैसे बातचीत या समझौता यदि सहवास हो जाए या पति स्पष्ट रूप से दो गवाहों के सामने तलाक वापस ले ले तो प्रक्रिया रद्द हो जाती है. पहला तलाक – अगले मासिक चक्र तक इद्दत में सुलह संभव. दूसरा तलाक – फिर इद्दत में पुनर्मिलन का मौका तीसरा तलाक – स्थायी होने से पहले अंतिम सुलह प्रयास. यह सुलह अनिवार्य मानी जाती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अक्सर नोटिस भेजकर या अलग रहकर प्रक्रिया पूरी की जाती है। क्या सुप्रीम कोर्ट में तलाक ए हसन को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गई हैं. - सुप्रीम कोर्ट में तलाक-ए-हसन की वैधता को कई याचिकाओं से चुनौती दी गई है. मुख्य याचिका बेनजीर हीना बनाम भारत संघ है, जहां गाजियाबाद की पत्रकार बेनजीर हीना ने शरिया एक्ट, 1937 और मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 को चुनौती दी. उन्होंने दावा किया कि उनके पति ने व्हाट्सएप के माध्यम से तलाक दिया, जो असंवैधानिक है. अन्य याचिकाओं में एक अशिक्षित गृहिणी का मामला है, जहां पति ने ब्लैंक पेपर पर साइन करवाकर तलाक दिया. नवंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा पर टिप्पणी की: “क्या सभ्य समाज में ऐसी प्रथा होनी चाहिए?”. इन मामलों को 5-जज संविधान पीठ को रेफर करने की संभावना जताई. कोर्ट ने वकीलों द्वारा नोटिस भेजने की प्रथा को असुरक्षित बताया. 11 फरवरी 2026 को चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जोयमल्या बागची की बेंच ने याचिकाओं पर सुनवाई की. मुख्य फोकस बेनजीर हीना के मामले पर था, जहां कोर्ट ने दंपति को मध्यस्थता के लिए भेजा. पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ नियुक्त किया. पति द्वारा दिए गए सभी पूर्व तलाकों को मध्यस्थता तक स्थगित रखा गया. एक अन्य मामले में अशिक्षित पत्नी की याचिका पर कोर्ट ने पति द्वारा दिए गए तलाक-ए-हसन को स्थगित किया, क्योंकि पति ने आरोपों का बचाव नहीं किया और अदालत में हाजिर नहीं हुए. कोर्ट ने कहा कि दंपति तब तक शादीशुदा रहेंगे जब तक तलाक वैध साबित न हो.

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