Iran War: डोनाल्ड ट्रंप ईरान से युद्धविराम की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इजरायल के साथ साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उनका विरोध कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन देशों ने ट्रंप प्रशासन में युद्ध रोकने की किसी भी कोशिश के खिलाफ जबरदस्त लॉबी की है।
वॉशिंगटन/तेल अवीव/रियाद: संयुक्त अरब अमीरात के अमेरिका में राजदूत यूसुफ अल ओतैबा ने बुधवार को ईरान के साथ जल्दबाजी में जंग रोकने की कोशिशों को लेकर डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी दी है। उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपे एक लेख में कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने तर्क दिया है कि 'ईरान के साथ युद्ध इस तरह खत्म होना चाहिए जिससे इस क्षेत्र के लिए तेहरान का लंबे समय से चला आ रहा खतरा खत्म हो जाए।' यूएई के राजदूत का यह संदेश ऐसे समय आया है जब खाड़ी देशों ने नागरिकों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे पर ईरानी हमलों को लेकर अपनी सार्वजनिक चेतावनियां तेज कर दी हैं। सऊदी अरब ने भी ईरान के साथ होने वाली युद्धविराम की किसी भी कोशिश को लेकर गहरी नाराजगी जताई है।वॉल स्ट्रीट जर्नल के ओपिनियन लेख में संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत का यूसुफ अल ओतैबा का एक लेख प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक है 'UAE Stands Up to Iran' यानि 'संयुक्त अरब अमीरात ईरान के सामने खड़ा है' में राजदूत अल ओतैबा ने लिखा कि 'मौजूदा युद्ध के लिए एक निर्णायक नतीजे की जरूरत है, जो इस्लामिक गणराज्य से जुड़े खतरे के पूरे दायरे को संबोधित करे।' यह लेख बुधवार दोपहर को WSJ के 'ओपिनियन' वाले पन्नों पर प्रकाशित हुआ है।ईरान से युद्धविराम के खिलाफ अमेरिका के अरब सहयोगीडोनाल्ड ट्रंप ईरान से युद्धविराम की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इजरायल के साथ साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उनका विरोध कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन देशों ने ट्रंप प्रशासन में युद्ध रोकने की किसी भी कोशिश के खिलाफ जबरदस्त लॉबी की है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान खुद डोनाल्ड ट्रंप से बार बार उनके निजी मोबाइल पर फोन कर रहे हैं। प्रिंस सलमान का कहना है कि 'ईरान को इस बार नहीं रोका गया तो वो और ज्यादा शक्तिशाली बनकर आएगा।' वहीं यूएई के राजदूत के लेख से साफ पता चलता है कि इस मामले पर वो सऊदी अरब के साथ खड़ा है।वहीं सीएनएन के मुताबिक अमेरिका के सहयोगी देशों को डर सता रहा है कि अगर डोनाल्ड ट्रंप युद्धविराम कर लेते हैं तो हालात युद्ध शुरू होने से पहले के मुकाबले काफी बदतर हो जाएंगे। सऊदी अरब चाहता है कि युद्ध खत्म होने से पहले तेहरान की क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को 'जितना हो सके' कमजोर किया जाए। सऊदी अरब के रुख से परिचित एक क्षेत्रीय अधिकारी ने CNN को यह बात बताई है। वहीं उसी अधिकारी ने ये भी कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात का मानना है कि इस क्षेत्र के लिए ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम के साथ जीना जारी रखना 'मुश्किल' होगा।ईरान युद्ध को लेकर सऊदी और UAE की चिंता क्या है?UAE के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गर्गश ने पिछले हफ्ते कहा था कि 'ईरान युद्ध से मिलने वाला संदेश अब बिल्कुल साफ़ हो गया है।' उन्होंने कहा कि 'हमारी सोच सिर्फ सीजफायर तक ही सीमित नहीं है बल्कि हम ऐसे समाधानों की ओर देख रहे हैं जो खाड़ी क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित करें।' इनमें ईरान के 'परमाणु खतरे, मिसाइलों, ड्रोन और जलडमरूमध्य में उसकी दादागिरी' से निपटना भी शामिल है। रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने आगे कहा 'यह सोचना भी नामुमकिन लग रहा है कि यह आक्रामकता एक स्थायी खतरे का रूप ले ले।' दूसरी तरफ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे भी इन्हीं लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस महीने कहा था कि उनका लक्ष्य 'ईरान की हमलावर मिसाइलों को नष्ट करना, ईरान के मिसाइल उत्पादन को तबाह करना और उसकी नौसेना व अन्य सुरक्षा ढांचे को नष्ट करना है।'ईरान ने सबसे ज्यादा मिसाइलें अरब देशों पर दागीईरानी अधिकारियों ने कहा है कि उनकी ज्यादातर मारक क्षमता का इस्तेमाल पड़ोसी अरब देशों के खिलाफ किया गया है जिससे क्षेत्रीय नेता हैरान हैं। इन नेताओं का जोर देकर कहना है कि युद्ध में उनकी कोई भूमिका नहीं थी और उन्होंने तो सक्रिय रूप से इसके खिलाफ लॉबिंग की थी। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा तेहरान ने कई खाड़ी अरब देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिका को अपनी जमीन का इस्तेमाल करके इस्लामिक गणराज्य पर हमले करने की अनुमति दी।रॉयटर्स ने बुधवार को बताया है कि खाड़ी अरब देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से कहा कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले एक 'अस्तित्वगत खतरा' पैदा करते हैं और कुवैत और UAE के प्रतिनिधियों ने ईरान पर आतंकवाद और विस्तारवाद के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। यह तीखी बयानबाज़ी WSJ की लाइव कवरेज की रिपोर्टिंग के दौरान भी देखने को मिली है। जिसमें कहा गया है कि सऊदी अरब और UAE इस बात से बहुत चिंतित थे कि ईरान के काफी हद तक कमजोर होने से पहले ही संघर्ष को खत्म करने की कोशिशें की जा रही हैं।.
वॉशिंगटन/तेल अवीव/रियाद: संयुक्त अरब अमीरात के अमेरिका में राजदूत यूसुफ अल ओतैबा ने बुधवार को ईरान के साथ जल्दबाजी में जंग रोकने की कोशिशों को लेकर डोनाल्ड ट्रंप को चेतावनी दी है। उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपे एक लेख में कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने तर्क दिया है कि 'ईरान के साथ युद्ध इस तरह खत्म होना चाहिए जिससे इस क्षेत्र के लिए तेहरान का लंबे समय से चला आ रहा खतरा खत्म हो जाए।' यूएई के राजदूत का यह संदेश ऐसे समय आया है जब खाड़ी देशों ने नागरिकों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे पर ईरानी हमलों को लेकर अपनी सार्वजनिक चेतावनियां तेज कर दी हैं। सऊदी अरब ने भी ईरान के साथ होने वाली युद्धविराम की किसी भी कोशिश को लेकर गहरी नाराजगी जताई है।वॉल स्ट्रीट जर्नल के ओपिनियन लेख में संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत का यूसुफ अल ओतैबा का एक लेख प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक है 'UAE Stands Up to Iran' यानि 'संयुक्त अरब अमीरात ईरान के सामने खड़ा है' में राजदूत अल ओतैबा ने लिखा कि 'मौजूदा युद्ध के लिए एक निर्णायक नतीजे की जरूरत है, जो इस्लामिक गणराज्य से जुड़े खतरे के पूरे दायरे को संबोधित करे।' यह लेख बुधवार दोपहर को WSJ के 'ओपिनियन' वाले पन्नों पर प्रकाशित हुआ है।ईरान से युद्धविराम के खिलाफ अमेरिका के अरब सहयोगीडोनाल्ड ट्रंप ईरान से युद्धविराम की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इजरायल के साथ साथ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उनका विरोध कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन देशों ने ट्रंप प्रशासन में युद्ध रोकने की किसी भी कोशिश के खिलाफ जबरदस्त लॉबी की है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान खुद डोनाल्ड ट्रंप से बार बार उनके निजी मोबाइल पर फोन कर रहे हैं। प्रिंस सलमान का कहना है कि 'ईरान को इस बार नहीं रोका गया तो वो और ज्यादा शक्तिशाली बनकर आएगा।' वहीं यूएई के राजदूत के लेख से साफ पता चलता है कि इस मामले पर वो सऊदी अरब के साथ खड़ा है।वहीं सीएनएन के मुताबिक अमेरिका के सहयोगी देशों को डर सता रहा है कि अगर डोनाल्ड ट्रंप युद्धविराम कर लेते हैं तो हालात युद्ध शुरू होने से पहले के मुकाबले काफी बदतर हो जाएंगे। सऊदी अरब चाहता है कि युद्ध खत्म होने से पहले तेहरान की क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को 'जितना हो सके' कमजोर किया जाए। सऊदी अरब के रुख से परिचित एक क्षेत्रीय अधिकारी ने CNN को यह बात बताई है। वहीं उसी अधिकारी ने ये भी कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात का मानना है कि इस क्षेत्र के लिए ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम के साथ जीना जारी रखना 'मुश्किल' होगा।ईरान युद्ध को लेकर सऊदी और UAE की चिंता क्या है?UAE के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गर्गश ने पिछले हफ्ते कहा था कि 'ईरान युद्ध से मिलने वाला संदेश अब बिल्कुल साफ़ हो गया है।' उन्होंने कहा कि 'हमारी सोच सिर्फ सीजफायर तक ही सीमित नहीं है बल्कि हम ऐसे समाधानों की ओर देख रहे हैं जो खाड़ी क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित करें।' इनमें ईरान के 'परमाणु खतरे, मिसाइलों, ड्रोन और जलडमरूमध्य में उसकी दादागिरी' से निपटना भी शामिल है। रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने आगे कहा 'यह सोचना भी नामुमकिन लग रहा है कि यह आक्रामकता एक स्थायी खतरे का रूप ले ले।' दूसरी तरफ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे भी इन्हीं लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस महीने कहा था कि उनका लक्ष्य 'ईरान की हमलावर मिसाइलों को नष्ट करना, ईरान के मिसाइल उत्पादन को तबाह करना और उसकी नौसेना व अन्य सुरक्षा ढांचे को नष्ट करना है।'ईरान ने सबसे ज्यादा मिसाइलें अरब देशों पर दागीईरानी अधिकारियों ने कहा है कि उनकी ज्यादातर मारक क्षमता का इस्तेमाल पड़ोसी अरब देशों के खिलाफ किया गया है जिससे क्षेत्रीय नेता हैरान हैं। इन नेताओं का जोर देकर कहना है कि युद्ध में उनकी कोई भूमिका नहीं थी और उन्होंने तो सक्रिय रूप से इसके खिलाफ लॉबिंग की थी। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा तेहरान ने कई खाड़ी अरब देशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिका को अपनी जमीन का इस्तेमाल करके इस्लामिक गणराज्य पर हमले करने की अनुमति दी।रॉयटर्स ने बुधवार को बताया है कि खाड़ी अरब देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से कहा कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले एक 'अस्तित्वगत खतरा' पैदा करते हैं और कुवैत और UAE के प्रतिनिधियों ने ईरान पर आतंकवाद और विस्तारवाद के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। यह तीखी बयानबाज़ी WSJ की लाइव कवरेज की रिपोर्टिंग के दौरान भी देखने को मिली है। जिसमें कहा गया है कि सऊदी अरब और UAE इस बात से बहुत चिंतित थे कि ईरान के काफी हद तक कमजोर होने से पहले ही संघर्ष को खत्म करने की कोशिशें की जा रही हैं।
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