'इस चुनाव के बाद कन्हैया का कोई ठिकाना नहीं होगा'

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लोकसभा चुनाव 2019: 'इस चुनाव के बाद कन्हैया का कोई ठिकाना नहीं होगा': तनवीर हसन

मैंने सही तब भी नहीं माना था. तब भी इसकी निंदा की थी. लेकिन सवाल ये नहीं है. सवाल ये है कि कुछ न कुछ विवाद हुआ तब न मीडिया ने उसको हाईलाइट किया. मीडिया ने उनके पक्ष और विपक्ष दोनों में उनको हाईलाइट किया.

ऐसे में हाईलाइट का केंद्र तो वही बने. मतलब यही वजह बनी. अब तो अरुण जेटली भी टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते हैं. क्या आप भी टुकड़े-टुकड़े गैंग का जो दाग या आरोप है, उसे आप सही मानते हैं? टुकड़े-टुकड़े गैंग है या क्या है, जेटली के आरोप को सही मानना या न मानना अलग चीज़ है. हमारी मान्यता ये है कि अगर किसी भी तरह के ऐसे मामले में बीजेपी सरकार पक्षपात करती है और राष्ट्रद्रोह और राष्ट्रप्रेम का सर्टिफ़िकेट बांटती है तो इसका हक़ उन्हें नहीं है.उनका भी काम है अपील करना. अभी तक उनकी अपील पर जब फॉलोइंग हो जाएगी तब न उसको देखा जाएगा. अभी तक उसकी फॉलोइंग नज़र नहीं आती है.कई लोग ये कहते हैं कि आपने और कन्हैया दोनों ने मिलकर गिरिराज की राह आसान कर दी है? अब इसके लिए दोषी कौन हो सकता है. मैं तो नहीं हूं. पार्टी के पिछले प्रदर्शन के आधार पर मुझे उम्मीदवार बनाया गया. इस पर कोशिश की जा सकती है. लेकिन उन्होंने सशर्त कोशिश की कि ये चाहिए और वो चाहिए. ऐसी हालत में गठबंधन के दूसरे अन्य घटकों का रुख अलग था जिनसे वो लोग सहमत नहीं हुए.चुनाव हम भी लड़ रहे हैं और वह भी लड़ रहे हैं. ऐसे में किसके यहां खुशी है और किसके यहां ग़म है, वो अलग बात है. ये तो एक धारणा की बात है कि कहां खुशी है. और, कौन जीतेगा तो पाकिस्तान में फुलझड़ी छूटेगी. ये तो धारणा की बात है. और इसी के आधार पर ये सब कहा जा रहा है. आपका दुश्मन गिरिराज और कन्हैया में से कौन है तनवीर जी? क्योंकि गिरिराज, कन्हैया और आपकी अपनी विचारधारा है, ऐसे में कौन सी विचारधारा आपके ख़िलाफ़ है? आप यही तो पूछेंगे न कि जब आप दोनों एक विचारधारा के आस-पास हैं तो साथ क्यों नहीं हुए. क्योंकि आप बार बार एक ही जैसा सवाल पूछ रहे हैं.ये तो हमें भी लगता है कि देशभर में बड़े पैमाने पर जो मोर्चेबाजी होनी चाहिए थी, उसमें कहीं न कहीं चूक हुई है. लेकिन बिहार की मोर्चेबाजी में हमारे मोर्चे के साथ जो घटक हैं, उनके साथ एक बड़ा आकार है. और यही बात साबित करती है कि बिहार में ये चूक नहीं हुई है. और व्यापकता लाने के लिए कहीं न कहीं समझौता करने की भी ज़रूरत होती है. ऐसे में जब वामपंथ ने सब मिलाकर 16-17 सीट पर दावेदारी की तो वो कहीं से मुनासिब नहीं था. और वो उस दावेदारी पर अड़े रहे. ऐसी हालत में आप बताइए कि कौन से गठबंधन में ऐसी शर्त पर दावेदारी मान ली जाए जिससे कि किसी एक व्यक्ति के लिए पूरी पार्टी कहे कि वो सीट तो वह ही लेगी. और अगर मान भी लिया जाए कि हो जाती तो उस समय तो कोशिश की नहीं गई. उनकी तरफ़ से कोशिश नहीं की गई. हमारी तरफ़ से कोशिश की गई. हमने ऑफ़र भी की. हमने माले के लिए एक सीट छोड़ी भी. क्योंकि जनसमर्थन के लिहाज़ से जो उपयुक्त पार्टी है वो माले है और उसका कहीं कहीं जनसमर्थन है. हमने अपने आप से उनके लिए सीट छोड़ दिया.आपके और उनके साथ चलने वालों में एक आम भावना है कि काश ये जोड़ी साथ होती. आप भी इस भावना के साथ हैं क्या?क्या तेजस्वी के नेतृत्व में काम करना कुछ अजीब नहीं लगता है? हमें कोई अजीब नहीं लगता है. आप तेजस्वी को टारगेट करना चाहते हैं तो भूल जाइए. यहां तेजस्वी का सवाल कहां उठता है. और ये प्रश्न भी नहीं उठता है. राहुल गांधी के नेतृत्व में सारे वरिष्ठ नेता काम कर रहे हैं कि नहीं. कन्हैया के नेतृत्व में सारे वरिष्ठ नेता काम कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं? ये तो भेद पैदा करने का प्रश्न है. हम उस पार्टी के वर्कर और काडर हैं. नेतृत्व बदलता रहता है. युवा युवा कह रहे हैं तो ऐसे में तेजस्वी से युवा कौन है?लेकिन केवल परिवार में ही तो युवा नहीं होता है? परिवार हो या परिवार से बाहर हो. वो कोई ऐसा तो नहीं है कि नया नया इंट्रोड्यूस किया गया हो. राम चरित का परिवार था राजनीति का. इसके बाद चंद्रशेखर कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हुए. वो भी तो परिवार में ही हुए.हमें नहीं लगता है कि वो जुड़ाव रह गया है.वो लीडरशिप विदआउट फॉलोइंग है. आप जिस वर्ग की बात कर रहे हैं, मैं उसके लिए कुछ नहीं कहना चाहता हूं.ये उनसे ही पूछिए न. सारे ज़मींदार अपनी ज़मीन बचाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी में गए थे. वीरपुर में एक बड़े ज़मीदार थे शिवदानी सिंह. वो कम्युनिस्ट पार्टी में गए. इसके बाद विधायक भी बने. रामचरित बाबू कोई छोटे किसान नहीं थे. बड़े किसान थे. कम्युनिस्ट पार्टी उनके घर में हुई. चंद्रशेखर बाबू हुए. तो बांट थोड़े ही दी उन्होंने अपनी संपत्ति.क्या आप मानते हैं कि ये सिर्फ एक रणनीतिक जुड़ाव था?बेगूसरायदेखिए, चुनाव में तो किसी की जीत होती ही है. और जनता अपने मन से चुनती है और उसके लिए जनता ही ज़िम्मेदार होती है. इससे पहले बीजेपी जीती थी. उससे पहले एक बार राजद और जदयू के उम्मीदवार इस सीट पर जीते थे. इसमें हम और कन्हैया एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर सकते हैं लेकिन ज़िम्मेदारी किसी की नहीं बनती है.ये जो व्यवस्था की गई है वो संविधान में निहित सिद्धांतों के अंतर्गत नहीं की गई है. वो केवल वोट हासिल करने के लिए उठाया गया कदम है. तेजस्वी यादव ने हाल ही में अपने इंटरव्यू में कहा है कि बिहार में सीपीआई एक ज़िले और एक जाति की पार्टी है. उनका कहने का क्या मतलब है? देखिए, समाज में जाति का भी कोई स्थान है. इससे लोग फैशन में तो इनकार कर सकते हैं लेकिन आचरण में कोई इनकार नहीं कर सकता. ये हक़ीकत है. जब ये सच है तो इसे बोलने में किसी को भी इनकार नहीं होना चाहिए. तेजस्वी ने बोला है तो आप सीपीआई की सीट पूरे बिहार में गिन लीजिए. बेगूसराय में हैं, वो भी लीडरशिप में बचा हुआ वर्ग है. फॉलोइंग में वो वर्ग नहीं है.

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