शख्सियत: सरोजिनी नायडू

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भारत की कोकिला (दि नाइटिंगेल ऑफ इंडिया) कही जाने वाली सरोजिनी नायडू का जन्म आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में हुआ था, जो वर्तमान में तेलंगाना की राजधानी है। विवाह से पहले इन्हें सरोजिनी चट्टोपाध्याय के नाम से जाना जाता था। हिंदू बंगाली परिवार में जन्मीं सरोजिनी के पिता अघोर नाथ चट्टोपाध्याय एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री थे। उनकी माता वरदा सुंदरी कवयित्री थीं और बांग्ला में लिखती थीं। इनके दो भाई बिरेंद्रनाथ और हरिंद्रनाथ भी थे।

जनसत्ता March 24, 2019 2:01 AM 2 मार्च 1949 को लखनऊ में राज्यपाल के पद पर रहते हुए सरोजिनी नायडू बीमार पड़ गर्इं और उनके चिकित्सक ने उन्हें अच्छी नींद आने के लिए नींद की गोली दी। नायडू ने मुस्कुराते हुए कुछ शब्द कहे कि ‘मैं आशा करती हूं कि यह मेरी आखिरी नींद नहीं है’। लेकिन उसी रात उनका नींद के दौरान दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। सरोजिनी नायडू एक प्रतिभावान छात्रा थीं। उन्होंने घर पर ही अंग्रेजी का अध्ययन किया और 12 वर्ष की आयु में मैट्रिक पास की। वे अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर सकीं, परंतु अंग्रेजी भाषा में काव्य सृजन में वे प्रतिभावान रहीं। मात्र 14 वर्ष की उम्र में सरोजिनी ने सभी अंग्रेजी कवियों की रचनाओं का अध्ययन कर लिया था। 1895 में हैदराबाद के निजाम ने उन्हें वजीफे पर इंग्लैंड भेजा। गीतिकाव्य की शैली में नायडू ने काव्य सृजन किया और 1905, 1912 और 1917 में उनकी कविताएं प्रकाशित हुर्इं। सरोजिनी ने अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड जाने से पहले मद्रास विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। उन्हें अंग्रेजी, बांग्ला, उर्दू, तेलुगु और फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान था।सरोजिनी नायडू अपनी शिक्षा के दौरान इंग्लैंड में दो साल तक ही रहीं। वहां उनके मित्र और प्रशंसकों में एडमंड गॉस और ‘आर्थर सिमन्स’ भी थे। वह लगभग बीस वर्ष तक कविताएं और लेखन कार्य करती रहीं और इस समय में, उनके तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। ‘गोल्डन थ्रैशोल्ड’ उनका पहला कविता संग्रह था। दूसरे व तीसरे कविता संग्रह ‘बर्ड आॅफ टाइम’ और ‘ब्रोकन विंग’ ने उन्हें एक प्रसिद्ध कवयित्री बना दिया। सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1300 पंक्तियों की कविता ‘द लेडी आॅफ लेक’ लिखी थी। फारसी भाषा में एक नाटक ‘मेहर मुनीर’ लिखा। सरोजिनी नायडू को भारतीय और अंग्रेजी साहित्य जगत की स्थापित कवयित्री माना जाने लगा था। लेकिन वे स्वयं को कवि नहीं मानती थीं। 1916 में सरोजिनी नायडू ने मोहम्मद अली जिन्ना की एक जीवनी प्रकाशित की जिसका शीर्षक ‘हिंदू-मुसिलम एकता के राजदूत’ रखा था।सरोजिनी नायडू को भारतीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनने का श्रेय प्राप्त है। 1905 में हुए बंगाल विभाजन से वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए उत्सुक हुई। उसके बाद सरोजिनी जल्द ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थकों के संपर्क में आर्इं। नायडू के राजनीति में सक्रिय होने में गोखले के 1906 के कोलकाता अधिवेशन के भाषण ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय समाज में फैली कुरीतियों के लिए भारतीय महिलाओं को जागृत किया। काफी समय तक वे कांग्रेस की प्रवक्ता रहीं। 1919 में सरोजिनी नायडू इंग्लैंड के होम रूल लीग की राजदूत बनीं। एनी बेसेंट और अय्यर के साथ युवाओं में राष्ट्रीय भावनाओं का जागरण करने हेतु उन्होंने 1915 से 1918 तक भारत भ्रमण किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड से आहत होकर उन्होंने 1908 में मिला ‘कैसर-ए-हिंद’ सम्मान लौटा दिया था। 1922 में उन्होंने खादी पहनने का व्रत लिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में 1925 में उन्हें प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनाया गया। अक्तूूबर, 1928 में उन्होंने न्यूयॉर्क की यात्रा की। 1942 में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था और महात्मा गांधी के साथ 21 महीने तक जेल में रहना पड़ा। सरोजिनी नायडू ने मार्च, 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन में संचालन समिति की अध्यक्षता की। 1947 से 1949 तक संयुक्त प्रांत की राज्यपाल बनीं।देश की राजनीति में आने से पहले सरोजिनी नायडू दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के साथ काम कर चुकी थीं। गांधीजी वहां की जातीय सरकार के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे और सरोजिनी नायडू ने स्वयंसेवक के रूप में उन्हें सहयोग दिया था।2 मार्च 1949 को लखनऊ में राज्यपाल के पद पर रहते हुए सरोजिनी नायडू बीमार पड़ गर्इं और उनके चिकित्सक ने उन्हें अच्छी नींद आने के लिए नींद की गोली दी। नायडू ने मुस्कुराते हुए कुछ शब्द कहे कि ‘मैं आशा करती हूं कि यह मेरी आखिरी नींद नहीं है’। लेकिन उसी रात उनका नींद के दौरान दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App.

जनसत्ता March 24, 2019 2:01 AM 2 मार्च 1949 को लखनऊ में राज्यपाल के पद पर रहते हुए सरोजिनी नायडू बीमार पड़ गर्इं और उनके चिकित्सक ने उन्हें अच्छी नींद आने के लिए नींद की गोली दी। नायडू ने मुस्कुराते हुए कुछ शब्द कहे कि ‘मैं आशा करती हूं कि यह मेरी आखिरी नींद नहीं है’। लेकिन उसी रात उनका नींद के दौरान दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। सरोजिनी नायडू एक प्रतिभावान छात्रा थीं। उन्होंने घर पर ही अंग्रेजी का अध्ययन किया और 12 वर्ष की आयु में मैट्रिक पास की। वे अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर सकीं, परंतु अंग्रेजी भाषा में काव्य सृजन में वे प्रतिभावान रहीं। मात्र 14 वर्ष की उम्र में सरोजिनी ने सभी अंग्रेजी कवियों की रचनाओं का अध्ययन कर लिया था। 1895 में हैदराबाद के निजाम ने उन्हें वजीफे पर इंग्लैंड भेजा। गीतिकाव्य की शैली में नायडू ने काव्य सृजन किया और 1905, 1912 और 1917 में उनकी कविताएं प्रकाशित हुर्इं। सरोजिनी ने अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड जाने से पहले मद्रास विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। उन्हें अंग्रेजी, बांग्ला, उर्दू, तेलुगु और फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान था।सरोजिनी नायडू अपनी शिक्षा के दौरान इंग्लैंड में दो साल तक ही रहीं। वहां उनके मित्र और प्रशंसकों में एडमंड गॉस और ‘आर्थर सिमन्स’ भी थे। वह लगभग बीस वर्ष तक कविताएं और लेखन कार्य करती रहीं और इस समय में, उनके तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। ‘गोल्डन थ्रैशोल्ड’ उनका पहला कविता संग्रह था। दूसरे व तीसरे कविता संग्रह ‘बर्ड आॅफ टाइम’ और ‘ब्रोकन विंग’ ने उन्हें एक प्रसिद्ध कवयित्री बना दिया। सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1300 पंक्तियों की कविता ‘द लेडी आॅफ लेक’ लिखी थी। फारसी भाषा में एक नाटक ‘मेहर मुनीर’ लिखा। सरोजिनी नायडू को भारतीय और अंग्रेजी साहित्य जगत की स्थापित कवयित्री माना जाने लगा था। लेकिन वे स्वयं को कवि नहीं मानती थीं। 1916 में सरोजिनी नायडू ने मोहम्मद अली जिन्ना की एक जीवनी प्रकाशित की जिसका शीर्षक ‘हिंदू-मुसिलम एकता के राजदूत’ रखा था।सरोजिनी नायडू को भारतीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनने का श्रेय प्राप्त है। 1905 में हुए बंगाल विभाजन से वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए उत्सुक हुई। उसके बाद सरोजिनी जल्द ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थकों के संपर्क में आर्इं। नायडू के राजनीति में सक्रिय होने में गोखले के 1906 के कोलकाता अधिवेशन के भाषण ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय समाज में फैली कुरीतियों के लिए भारतीय महिलाओं को जागृत किया। काफी समय तक वे कांग्रेस की प्रवक्ता रहीं। 1919 में सरोजिनी नायडू इंग्लैंड के होम रूल लीग की राजदूत बनीं। एनी बेसेंट और अय्यर के साथ युवाओं में राष्ट्रीय भावनाओं का जागरण करने हेतु उन्होंने 1915 से 1918 तक भारत भ्रमण किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड से आहत होकर उन्होंने 1908 में मिला ‘कैसर-ए-हिंद’ सम्मान लौटा दिया था। 1922 में उन्होंने खादी पहनने का व्रत लिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में 1925 में उन्हें प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनाया गया। अक्तूूबर, 1928 में उन्होंने न्यूयॉर्क की यात्रा की। 1942 में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था और महात्मा गांधी के साथ 21 महीने तक जेल में रहना पड़ा। सरोजिनी नायडू ने मार्च, 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन में संचालन समिति की अध्यक्षता की। 1947 से 1949 तक संयुक्त प्रांत की राज्यपाल बनीं।देश की राजनीति में आने से पहले सरोजिनी नायडू दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के साथ काम कर चुकी थीं। गांधीजी वहां की जातीय सरकार के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे और सरोजिनी नायडू ने स्वयंसेवक के रूप में उन्हें सहयोग दिया था।2 मार्च 1949 को लखनऊ में राज्यपाल के पद पर रहते हुए सरोजिनी नायडू बीमार पड़ गर्इं और उनके चिकित्सक ने उन्हें अच्छी नींद आने के लिए नींद की गोली दी। नायडू ने मुस्कुराते हुए कुछ शब्द कहे कि ‘मैं आशा करती हूं कि यह मेरी आखिरी नींद नहीं है’। लेकिन उसी रात उनका नींद के दौरान दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

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