अपने गुरु रूहोल्ला खोमैनी की तरह अली खामेनई ने 'पश्चिमी साम्राज्यवाद' के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने क्षेत्रीय रणनीति के तहत हिजबुल्ला, हमास और हूती जैसे समूहों को समर्थन देकर ईरान के प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश की. साल 2025 में ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद ईरान और भी कमजोर हो गया.
तेहरान. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई अब इतिहास बन चुके हैं. अमेरिका और इजराइल के हवाई हमले में उनकी मौत हो गई है. इस बड़ी खबर ने मिडिल ईस्ट की पॉलिटिक्स में भारी भूचाल ला दिया है. खामेनेई ने करीब 36 साल तक ईरान पर बहुत कठोर कंट्रोल रखा था.
उनकी मौत के बाद अब उनके विवादित शासन पर नई बहस शुरू हो गई है. वह आधुनिक ईरान के सबसे पावरफुल लीडर माने जाते थे. उन्होंने हमेशा अपने राज को बचाने की सबसे ज्यादा कोशिश की. साल 2025 से 2026 के बीच ईरान में बड़े जनआंदोलन हुए थे. उनकी सरकार ने इसे बहुत बेरहमी से कुचल दिया था. इसमें हजारों बेगुनाह लोग मारे गए थे. खामेनेई को शायद ही कोई मजबूत या सम्मानित लीडर के तौर पर याद रखेगा. उनकी लीगेसी सिर्फ कमजोरी और भारी असंतोष वाली ही मानी जाएगी. खोमैनी से मुलाकात और सुप्रीम लीडर बनने का सफर खामेनेई का जन्म 1939 में मशहद में हुआ था. बचपन में उन्होंने इस्लामिक मदरसों में पढ़ाई की थी. 13 साल की उम्र में वह रिवोल्यूशनरी इस्लाम से जुड़ गए थे. साल 1958 में उनकी मुलाकात अयातुल्ला रूहोल्ला खोमैनी से हुई. उन्होंने तुरंत ‘खोमैनीवाद’ की विचारधारा को अपना लिया था. खोमैनी के इशारे पर उन्होंने शाह रजा पहलवी के खिलाफ बगावत की. साल 1971 में शाह की सीक्रेट पुलिस ने उन्हें अरेस्ट कर लिया था. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद खोमैनी सुप्रीम लीडर बने. खामेनेई ने रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर बनाने में अहम रोल निभाया. राष्ट्रपति पद से लेकर ईरान के सबसे पावरफुल नेता तक साल 1981 में खामेनेई पर जानलेवा हमला हुआ था. इसके बाद 1982 में वह ईरान के प्रेसिडेंट चुने गए. 1985 में वह दोबारा इस पद के लिए चुने गए थे. उनका ज्यादातर समय ईरान-इराक युद्ध के बीच गुजरा. जून 1989 में खोमैनी की मौत हो गई. इसके बाद एक्सपर्ट्स की असेंबली ने उन्हें सुप्रीम लीडर चुन लिया. यह एक बहुत ही चौंकाने वाला फैसला था. कुछ धर्मगुरुओं ने इसका कड़ा विरोध भी किया था. जुलाई 1989 में संविधान में बड़ा संशोधन किया गया. खामेनेई को ‘अयातुल्ला’ का दर्जा दिया गया और वह सुप्रीम लीडर बन गए. दशकों तक किया सत्ता का कड़ा सेंट्रलाइजेशन खामेनेई ने अलग-अलग प्रेसिडेंट्स के साथ काम किया. जब भी वह असहमत होते तो फैसलों को रोक देते थे. उन्होंने खातमी और रूहानी जैसे रिफॉर्मिस्ट लीडर्स का हमेशा विरोध किया. इन नेताओं ने वेस्टर्न देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश की थी. साल 2009 के विवादित इलेक्शन के बाद बड़े प्रोटेस्ट हुए थे. खामेनेई ने इन प्रदर्शनकारियों पर बहुत कड़ा एक्शन लिया था. साल 2024 में रईसी की मौत के बाद भी वह कंट्रोल करते रहे. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के रिफॉर्म्स को भी उन्होंने रोक दिया था. विवादों से घिरी लीगेसी और इजराइल से मिली बड़ी हार खामेनेई ने हिजबुल्लाह और हमास जैसे ग्रुप्स का खुलकर सपोर्ट किया. डोनाल्ड ट्रंप के पहले टर्म में न्यूक्लियर डील टूट गई थी. कासिम सुलेमानी की मौत के बाद वह वेस्ट के सख्त खिलाफ हो गए. साल 2025 में ट्रंप की वापसी से ईरान और कमजोर हो गया. इसके बाद इजराइल के साथ 12 दिन का भयानक युद्ध हुआ. इस युद्ध में हार के बाद खामेनेई का राज बहुत कमजोर हो गया था. साल 2025-26 के प्रोटेस्ट में लोगों ने उनकी मौत के नारे लगाए थे. अब ईरान के लोग शायद उन्हें वो सम्मान नहीं देंगे जो खोमैनी को मिला था.
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