Operation Sindoor पर PM Modi की Pakistan को दो टूक, आगे क्या एक्शन लेगा भारत? | NDTV Xplainer | War
भारत ने एक बार फिर ये साफ कर दिया है कि आतंकियों और उन्हें सीमा पार से समर्थन देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर खत्म नहीं हुआ है. पाकिस्तान के आग्रह पर फिलहाल सैन्य कार्रवाई ही रोकी गई है. लेकिन आतंकवाद की किसी भी घटना को युद्ध ही माना जाएगा.
इस बीच भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस यानी DGMO के बीच आज शाम पांच बजे बातचीत हुई, जिसमें ये तय किया गया कि कोई भी देश एक भी गोली नहीं चलाएगा. कोई भी देश सीमा पर एक दूसरे के खिलाफ आक्रामक रूख नहीं अपनाएगा. दोनों ही पक्ष सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों की तैनाती को तुरंत खत्म करने पर विचार करेंगे.भारत द्वारा सैन्य कार्रवाई को अस्थायी तौर पर रोकने के बीच तनाव कम करने के लिए ये शुरुआती उपाय किए गए हैं. लेकिन भारत ने ये साफ कर दिया कि आतंकवाद और उसके सरपरस्तों से कोई समझौता नहीं होगा. इस सिलसिले में प्रधानमंत्री मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकियों और पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर भारत के कठोर हमलों के बाद अपने पहले भाषण में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर न्याय की अखंड प्रतिज्ञा है और पूरी दुनिया ने इस प्रतिज्ञा को परिणाम में बदलते देखा है.{ai=d.createElement;ai.defer=true;ai.async=true;ai.src=v.location.protocol+o;d.head.appendChild;});प्रधानमंत्री ने आज जो भाषण दिया, जो कई मायनों में ऐतिहासिक हो गया हैप्रधानमंत्री ने साफ कर दिया कि आतंकवाद और बातचीत साथ नहीं चल सकतेआतंकवाद और व्यापार एक साथ नहीं चल सकतेपानी और खून भी एक साथ नहीं बह सकताप्रधानमंत्री ने ये भी साफ कर दिया कि पाकिस्तान को ये सब समझना ही होगा और अगर वो ये नहीं समझता तो पाकिस्तान ही खत्म हो जाएगा.'ये युग आतंकवाद का भी नहीं...'प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि निश्चित तौर पर ये युग युद्ध का नहीं है. लेकिन ये युग आतंकवाद का भी नहीं है. आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस ये एक बेहतर दुनिया के लिए जरूरी है. साथियों पाकिस्तानी फौज, पाकि्सतान की सरकार जिस तरह आतंकवाद को खाद पानी दे रहे हैं. वो एक दिन पाकिस्तान को ही समाप्त कर देगा. पाकिस्तान को अगर बचना है तो उसे अपने टैरर इंफ्रास्ट्रक्चर का सफाया करना ही होगा. उसके अलावा शांति का कोई रास्ता नहीं है.प्रधानमंत्री ने 22 मिनट के अपने संबोधन में ये साफ कर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर से आतंकवाद के खिलाफ भारत ने एक न्यू नॉर्मल तय कर दिया है. अब भारत आतंक के आकाओं और आतंकी सरपरस्त सरकार को अलग अलग नहीं देखेगा.'न्यूक्लियर ब्लैकमेल भारत नहीं सहेगा..'प्रधानमंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने आतंक के खिलाफ लड़ाई में एक नई लकीर खींचती है एक नया पैमाना न्यू नॉर्मल तय कर दिया है. पहला भारत पर आतंकी हमला हुआ तो मुंह तोड़ जवाब दिया जाएगा. हम अपने तरीके से अपनी शर्तों पर जवाब देकर रहेंगे. हर उस जगह जाकर कठोर कार्रवाई करेंगे जहां से आतंकी जड़ें निकलती है. दूसरा कोई भी न्यूक्लियर ब्लैकमेल भारत नहीं सहेगा. न्यूक्लियर ब्लैकमेल की आड़ में पनप रहे आतंकी ठिकानों पर भारत सटीक प्रहार करेंगा. तीसरा हम आतंकी सरपरस्त सरकार और आतंक के आकाओं को अलग अलग नहीं देखेंगे.प्रधानमंत्री ने आज बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने संबोधन में कहा कि ये समय युद्ध का नहीं है. भगवान बुद्ध ने हमें शांति का रास्ता दिखाया है. लेकिन शांति का रास्ता भी शक्ति से होकर ही जाता है.प्रधानमंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी ने कहा कि भगवान बुद्ध ने हमें शांति का रास्ता दिखाया है. शांति का मार्ग भी शक्ति से होकर जाता है. मानवता शांति और समृद्धि की तरफ, हर भारतीय शांति से जी सके, विकसित भारत के सपने को पूरा कर सके इसके लिए भारत का शक्तिशाली होना बहुत जरूरी है. आवश्यकता पड़ने पर इस शक्ति का इस्तेमाल भी बहुत जरूरी था. निश्चित तौर पर ये युग युद्ध का नहीं है. लेकिन ये युग आतंकवाद का भी नहीं है. आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस ये एक बेहतर दुनिया के लिए जरूरी है. साथियों पाकिस्तानी फौज, पाकि्सतान की सरकार जिस तरह आतंकवाद को खाद पानी दे रहे हैं. वो एक दिन पाकिस्तान को ही समाप्त कर देगा. पाकिस्तान को अगर बचना है तो उसे अपने टैरर इंफ्रास्ट्रक्चर का सफाया करना ही होगा. इसके अलावा शांति का कोई रास्ता नहीं है.प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ये भी साफ कहा कि अब पाकिस्तान से बात आतंकवाद और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर ही होगी जो भारत की घोषित नीति रही है. प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं आज विश्व समुदाय को भी कहूंगा कि हमारी घोषित नीति रही कि अगर पाकिस्तान से बात होगी तो टेररिज़्म पर ही होगी. अगर पाकिस्तान से बात होगी तो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर होगी.पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्साप्रधानमंत्री मोदी के आज के भाषण की एक खास बात ये भी रही कि उन्होंने दुनिया के सामने ये साफ कर दिया कि बातचीत अब पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर पर ही होगी. आपको बता दें कि भारतीय संसद 22 फरवरी, 1994 में प्रस्ताव पास कर ये कह चुकी है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत इसे वापस लेकर रहेगा. तो बात करते हैं कि पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर पर ही. ये पूर्व जम्मू-कश्मीर रियासत का वो हिस्सा है जिस पर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा किया जबकि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह भारत में विलय के समझौते पर दस्तखत कर चुके थे.महाराजा हरि सिंह और भारत में कश्मीर का विलय की कहानीदरअसल, 1947 में भारत-पाकिस्तान की आजादी से ठीक पहले जब भारत में सरदार पटेल और तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड माउंट बेटन तमाम रियासतों को भारत में शामिल करने में जुटे थे तो माउंटबेटन चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ये फैसला लें कि वो भारत के साथ रहना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ. हरि सिंह को इसके लिए दिल्ली बुलाया गया लेकिन हरिसिंह ने संदेशा भेज दिया कि वो दिल्ली नहीं आ सकते क्योंकि उनके पेट में दर्द है. हरिसिंह को बुलाने की अगस्त 1947 के शुरुआती दिनों में कई कोशिशें हुईं लेकिन वो टालते रहे. बल्कि इस दौरान हरिसिंह अपने करीबियों के साथ मिलकर ये तय कर चुके थे कि वो न भारत के साथ रहेंगे, न पाकिस्तान के साथ. लेकिन उन्होंने ये बात ठीक से न नेहरू को बताई, न जिन्ना को. 12 अगस्त की तारीख़ आ चुकी थी. भारत को सत्ता मिलने में बस तीन दिन बाकी थे. ऐसे में कश्मीर के महाराजा ने भारत और पाकिस्तान की नई बनने वाली सरकारों को टेलीग्राम भेजा. इसमें स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट था. इसके तहत पोस्ट ऑफिस, संचार और बाकी आवश्यक सेवाओं को भी कश्मीर के लिए बनाए रखने की बात थी. कराची से तुरंत जवाब आया और पाकिस्तान मान गया कि वो कश्मीर के राजा को समय देने के लिए तैयार है. भारत इसके लिए तैयार नहीं हुआ. भारत ने कहा कि कश्मीर के महाराजा के कोई मंत्री आ जाएं या वो किसी और को भेजें तो ही इस पर विस्तार से बात हो पाएगी. लेकिन कश्मीर के राजा हरिसिंह ने दिल्ली के संदेशे का जवाब नहीं दिया और ये उनकी एक और बड़ी ग़लती रही.उधर, पाकिस्तान बेचैन हो रहा था. पाकिस्तान भारत के साथ रियासतों का मोल भाव करने की फिराक था. 14 अगस्त आने को थी. अगस्त के दूसरे हफ़्ते में ये खबर आने लगीं कि पाकिस्तान के इलाके से कश्मीर में बंदूकें आ रही हैं. कश्मीर में हालात खराब होते चले गए. इस बीच राजा हरिसिंह के खिलाफ विद्रोह की आवाजे भी तेज होने लगी थी. पुंछ इलाके में किसानों पर लगाए बड़े टैक्स के ख़िलाफ़ जनता विद्रोह पर उतर आई थी. जनता के नेता शेख अब्दुल्ला जिन्हें राजा हरिसिंह ने जेल में डाला हुआ था, उनकी रिहाई की मांग तेज़ हो रही थी. लोगों का कहना था कि शेख अब्दुल्ला को जेल से बाहर निकाला जाए और कश्मीर के प्रधानमंत्री काक की छुट्टी कर दी जाए. कश्मीर की बड़ी जनता नेहरू के दोस्त रहे शेख अब्दुल्ला के समर्थन में थी. शेख अब्दुल्ला लगातार राजा हरिसिंह से कह रहे थे कि वो सत्ता जनता को सौंप दें. लेकिन हरिसिंह को हालात समझ में नहीं आ रहे थे. वो कश्मीर को एक अलग देश बनाने की सोच चुके थे. अक्टूबर आते-आते हालात काफी ख़राब हो गए. पाकिस्तानी सेना की मदद से हज़ारों कबायली जो पश्तून कबीलों के थे वो जम्मू-कश्मीर में घुस आए, उसे महाराजा के शासन से आज़ाद कराने के मक़सद से. महाराजा हरिसिंह की सेना ने हालात पर काबू करने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. इस बीच कबायलियों ने पुंछ ज़िले के एक बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर लिया. मुज़फ़्फ़राबाद, बारामूला पर कब्ज़ा कर लिया. इसके बाद महाराजा हरिसिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी. भारत सरकार मदद के लिए तैयार हुई लेकिन एक शर्त पर. वो ये कि महाराजा को विलय के समझौते पर दस्तख़त करना होगा. महाराजा हरिसिंह ने भारत में शामिल होने का फ़ैसला किया. विलय के समझौते के साथ उन्होंने एक पत्र 26 अक्टूबर, 1947 को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंबेटन को भेजा.सादे कपड़ों में सैनिक और आधुनिक हथियारों से लैस हमलावर मेरे जम्मू-कश्मीर में घुस आए हैं. पहले पुंछ और फिर सियालकोट और अंत में हज़ारा ज़िले में रामकोट की तरफ़. मेरे राज्य के पास जो सीमित सैनिक थे, उन्हें कई मोर्चों पर एक साथ दुश्मन का सामना करने के लिए भेज दिया गया है. जानमाल के अंधाधुंध बर्बादी और संपत्ति की लूट को रोकना मुश्किल हो गया है. पूरे श्रीनगर को बिजली सप्लाई करने वाले माहोरा पावरहाउस को जला दिया गया है. कई महिलाओं का अपहरण और उनके साथ बलात्कार की घटनाओं ने मेरे दिल को चीर दिया है. राज्य के ख़िलाफ़ छोड़ दी गई बर्बर ताक़तें मेरी सरकार की गर्मियों की राजधानी श्रीनगर पर कब्ज़े के लिए आगे बढ़ रही हैं. इससे वो पूरे राज्य पर कब्ज़ा करना चाहते हैं.उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत से कबायलियों की बड़े पैमाने पर घुसपैठ हुई है. वो मानसेरा-मुज़फ़्फ़राबाद रोड से ट्रकों में भरकर आ रहे हैं और आधुनिक हथियारों से लैस हैं. उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत की अस्थायी सरकार और पाकिस्तान सरकार की जानकारी के बिना ऐसा नहीं हो सकता. मेरी सरकार के कई आग्रहों के बावजूद इन हमलावरों को मेरे राज्य में आने से रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई है. पाकिस्तान रेडियो ने तो ये ख़बर भी चला दी है कि कश्मीर में अस्थायी सरकार बन गई है. मेरे राज्य के लोग मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिमों ने इस सबमें कोई हिस्सा नहीं लिया है.राजा हरि सिंह ने अपने पत्र में लिखा, 'मेरे राज्य के मौजूदा हालात में मेरे पास कोई विकल्प नहीं है कि मैं भारत सरकार से मदद मांगूं. वो तब तक मेरी मांगी गई मदद नहीं दे पाएंगे जब तक मेरा राज्य भारत देश में शामिल न हो जाए. मैंने इसी लिहाज से फ़ैसला किया है और मैं विलय का पत्र आपकी सरकार द्वारा स्वीकृति के लिए संलग्न कर रहा हूं. दूसरा विकल्प ये है कि मैं अपने राज्य और अपने लोगों को लुटेरों के आगे छोड़ दूं. इस आधार पर तो कभी कोई नागरिक सरकार अस्तित्व में आ ही नहीं पाएगी. जब तक मैं राज्य का शासक हूं और देश की रक्षा के लिए मेरी जान बाकी है, मैं इस विकल्प की कभी इजाज़त नहीं दूंगा.'राजा हरिसिंह के इस पत्र के तुरंत बाद भारत ने अपनी सेनाओं को श्रीनगर भेजा. भारत की सेना और कबायलियों और पाक सेना के बीच लड़ाई शुरू हुई. भारतीय सेना कबायलियों को पीछे खदेड़ने लगी. लेकिन सर्दियां बढ़ने के कारण भारतीय सेना की कबायलियों को खदेड़ने की रफ़्तार कुछ कम हो गई. इस बीच 20 दिसंबर 1947 को भारत सरकार ने कश्मीर में पाकिस्तान की घुसपैठ का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का फैसला कर लिया. ये विचार माउंटबेटन का था और वो संयुक्त राष्ट्र के चार्टर आर्टिकल 35 के तहत ये मुद्दा उठाना चाहते थे. इस बीच गर्मियां शुरू हुईं तो भारतीय सेना की कबायलियों और पाकिस्तान के सैनिकों के साथ लड़ाई तेज हो गई. भारतीय सेना कश्मीर, जम्मू और लद्दाख में दुश्मनों को लगातार खदेड़ रही थी. इस बीच 13 अगस्त, 1948 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मामला गया और युद्धविराम का एलान हुआ. कहा गया कि हमलावर पाकिस्तान अपनी सभी फौजों को चाहे वो रेगुलर हों या इरेग्युलर उन्हें वापस बुलाएगा. भारत कश्मीर में अपनी फौज बनाए रख सकेगा. ये भी कहा गया कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य को तय करने के लिए एक जनमत संग्रह होगा. लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का तीसरा जनमत संग्रह वाला प्रस्ताव तब तक बाध्यकारी नहीं था, जब तक कि प्रस्ताव के पहले दो हिस्सों पर अमल न हो जाए. यानी युद्धविराम पर अमल और पाकिस्तान की सेनाओं की कश्मीर से पूरी तरह वापसी.पाकिस्तान की सेना को जब ये लगा कि वो फौजी जीत हासिल नहीं कर पाएगी तो उसने युद्धविराम को स्वीकार कर लिया. लेकिन उसने कब्जे वाला कश्मीर नहीं छोड़ा. यानी दूसरे प्रस्ताव का उल्लंघन किया जो आज तक चल रहा है. हालांकि, नवंबर 1948 तक भारतीय सेना ने द्रास, बटालिक, करगिल पर कब्ज़ा कर लद्दाख तक जाने का रास्ता भी सुरक्षित कर लिया था. मेंढर और पुंछ पर भी पूरा कब्ज़ा हासिल कर लिया था. लेकिन कश्मीर का एक बड़ा इलाका पाकिस्तान के कब्ज़े में ही रह गया था जिसे हम पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर यानी POK के तौर पर जानते हैं. इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार का युद्धविराम का फैसला आज भी सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता है. तब से पाकिस्तान के कब्ज़े वाला कश्मीर दोनों देशों के बीच विवाद का मुद्दा बना हुआ है.प्रधानमंत्री मोदी ने आज फिर ये साफ कर दिया कि भारत अब पाकिस्तान से बात करेगा तो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और आतंकवाद पर ही बात करेगा और किसी मुद्दे पर बात नहीं होगी. इस बीच पाकिस्तान के साथ सिंधु समझौते से लेकर व्यापार और एक दूसरे के बीच आने जाने तक हर चीज पर रोक लगी रहेगी.
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