कवि अभय सिंह 'निर्भीक' वीर रस के जाने माने कवि हैं। उनके जीवन का एक रोचक किस्सा है, जब उन्होंने अपना उच्चारण ठीक करने के लिए दो-दो बार सर्जरी कराई।
नई दिल्ली: उत्तर भारत में रहने वाले किसी भी शख्स के लिए हिंदी बोलना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन अपना उच्चारण सुधारने के लिए कोई सर्जरी करवा ले, यह वाकई अनूठी बात है। यूपी के आंबेडकर नगर के रहने वाले कवि अभय सिंह 'निर्भीक' का नाम वीर रस के कवियों में शुमार है। सैकड़ों मंचों के अलावा वह तीन बार लाल किले के कवि सम्मेलन से भी कविता पाठ कर चुके हैं। उन्होंने कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बावजूद यह तय किया कि इंजिनियरिंग में नहीं, हिंदी कविता की दुनिया में करियर बनाना है। लेकिन, वह 'स' और 'श' का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे इसलिए उन्होंने अपने मुंह के अंदर के हिस्से की दो बार सर्जरी करवाई। कवि अभय सिंह 'निर्भीक इन दिनों लखनऊ में रहते हैं।अभय कहते हैं कि स्कूल वाले दिनों से ही उन्हें कविता पढ़ना, सुनना और लिखना काफी पसंद था। वह वीर रस के कवि विनीत चौहान से काफी प्रभावित थे। उनके पिता स्व.
विजय बहादुर सिंह सेना में अधिकारी थे इसलिए भी वीर रस की कविताएं उन्हें बहुत रोमांचित करती थीं। पिता जी ने भी इस फील्ड में आने के लिए काफी प्रेरित किया। वह कहते हैं, 'जब मैं कवि सम्मेलन में जाता था 'तो कविता पढ़ते वक्त 'स' और 'श' के बीच उच्चारण स्पष्ट नहीं कर पाता था । उच्चारण की गलतियों के लिए वरिष्ठ कवि अक्सर टोकते थे और मुझे बहुत शर्मिंदा होना पड़ता था।'दांतों-जबड़े की बनावट में थी दिक्कतउन्होंने बताया, 'साल 2011 में एक दिन मैं लखनऊ में हास्य कवि सर्वेश अस्थाना के घर आयोजित कवि गोष्ठी में था। वहां भी वरिष्ठ कवियों ने मुझे टोका। उसी गोष्ठी में KGMU के एक डेंटल सर्जन डॉ. आनंद भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि आप लोग इन्हें बेवजह टोक रहे हैं। इसमें इनकी कोई गलती नहीं है। इनके दांत और जबड़े की बनावट में दिक्कत है। अगर ऑपरेशन हुआ तो यह ठीक हो सकता है।''दांतों की बनावट में थी समस्या'अभय बताते हैं, मेरे दांतों की बनावट में जो समस्या थी, उसकी वजह से हवा दांतों के बीच से होकर पास हो जाती थी और दोनों जबड़े भी हल्के से आपस में चिपके हुए थे। इससे मैं 'स' और 'श' का साफ उच्चारण नहीं कर पाता था। डॉ. आनंद की बातों का मुझ पर गहरा असर हुआ। मुझे लगा कि मैं किसे किसे यह बताऊंगा कि सही उच्चारण क्यों नहीं कर पाता, इसलिए मैंने ऑपरेशन कराने का फैसला लिया। इस प्रक्रिया में डेढ़ महीने लगे। इसके बाद मैं बिना रुकावट धाराप्रवाह हिंदी के शब्दों का सही उच्चारण कर लेता हूं।
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