Sarson ki Kheti Kaise Karen: सरसों की खेती किसानों के लिए सोने की खान साबित हो सकती है. सिर्फ 15-20 हज़ार की लागत में एक एकड़ से 50 हज़ार से 1 लाख तक कमाई.. सही बुवाई, उन्नत बीज और थोड़ी देखभाल बस, ये आपकी जेब में हरे-हरे नोट की बारिश करेगी.
देहरादून: सिंतबर का महीना चल रहा है, ऐसे में किसान खेती की ओर रुख करने लगे हैं. युवा किसान अब उन फसलों पर फोकस कर रहे हैं जो कम समय में ज्यादा कमाई करवा सके, बशर्ते बाज़ार में उन फसलों की मांग हो. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भी सरसों की खेती किसानों के लिए सुनहरा अवसर बन सकती है.
रबी सीजन में बोई जाने वाली यह फसल कम लागत में अधिक मुनाफा देती है. सही समय पर बुवाई और हाईटेक एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी अपनाने से किसान एक एकड़ से हजारों रुपये का लाभ कमा सकते हैं. बस…ध्यान रखनी होती है कुछ ख़ास बातें.. लागत और मुनाफे का गणित कई अन्य फसलों के मुकाबले सरसों की खेती में खर्चा कम आता है. एक एकड़ खेती में मात्र 1-2 किलो बीज की ज़रूरत पड़ती है. बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी सब मिलाकर ज्यादा से ज्यादा प्रति एकड़ खर्चा 15-20 हज़ार रु. तक आता है. अगर आपने उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग किया तो प्रति एकड़ लागत 10 से 15 क्विंटल उपज़ होगी. आमतौर पर बाज़ार में सरसों का प्रति क्विंटल दाम 4,500 से लेकर 7 हज़ार रु. होता है. तो इस हिसाब से में मुनाफा 50 हज़ार से एक लाख तक पहुंच सकता है. फसल कब होती है तैयार? किसान हैप्पी सिंह बताते हैं कि सरसों की फसल बोने के बाद लगभग 90 से 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. यानी अगर किसान सितंबर-अक्टूबर में बुवाई करते हैं तो फरवरी-मार्च तक सरसों की फसल हाथ आती है. उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सरसों की बुवाई का सही समय सितंबर से अक्टूबर के अंत तक माना जाता है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 10 से 20 अक्टूबर के बीच बुवाई करने पर बेहतर उपज मिलती है और रोगों का खतरा भी कम रहता है. ऊंचाई वाले इलाकों में नवंबर से दिसंबर के पहले सप्ताह तक भी बुवाई की जा सकती है. पहाड़ों में खेती के लिए जरूरी सावधानियां पर्वतीय क्षेत्रों में सरसों की खेती करते समय किसानों को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए. जैसे-खेत की अच्छी जुताई, साथ ही नमी और जल निकासी का संतुलन बना रहे. 1. पहली सिंचाई बुवाई के 30-35 दिन बाद और दूसरी सिंचाई फलियां बनने पर करनी चाहिए. 2. बीज की बेहतरीन किस्मों का चयन करें जैसे पंत पीली सरसों, पूसा-27 या पूसा मस्टर्ड 26 , पंत तोरया-2 ये किस्में कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार देती हैं. 3. फसल को पक्षियों और कीटों से बचाने के लिए नियमित निगरानी जरूरी है. 4. खाद का इस्तेमाल तेल की मात्रा बढ़ाने में सहायक होता है. 5. कॉलर रॉट जैसे रोगों से बचाव के लिए बीज उपचार और समय-समय पर निरीक्षण जरूरी है. यह भी पढ़ें: होटल-रेस्टोरेंट में खूब है डिमांड…गोभी की ये किस्म किसानों को बना देगी मालामाल, इस तरीके से करें बुवाई यूं कहें कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सरसों की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी ऑप्शन है. सही समय पर बुवाई, बेहतरीन किस्मों का इस्तेमाल और सतर्क देखभाल से किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं.
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