सेना में नौकरी से लेकर ब्लेड रनर और अब स्काई डाइवर। पढ़ें डीपी सिंह के अदम्य साहस की कहानी।
कभी हार न मानने वाले कारगिल युद्ध के हीरो मेजर डीपी सिंह का पूरा जीवन देश के नाम रहा है। सेना में रहते हुए उन्होंने कारगिल में अपनी अहम भूमिका निभाई। इस युद्ध में उनके शरीर के कई भागों में न सिर्फ चोटें आईं थी बल्कि वह अपना एक पैर भी खो चुके थे। बाद में जब मेजर को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था तो डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था लेकिन बाद में फिर जी उठे। यह साल 1999 की 15 जुलाई का दिन था, जिसे मेजर अपना पुर्नजन्म मानते हैं। आत्मविश्वास से लबरेज मेजर ने कभी हार नहीं मानी। उनके हौंसले को देखते हुए आर्मी ने उन्हें कृतिम पैर दिलवाए, जिनकी कीमत करीब साढ़े चार लाख रुपए है। मेजर के बाद वह ब्लेड रनर बन गए। अब उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल कर अपनी पहचान स्काई डाइवर के रूप में बनाई है। इन्हें फर्स्ट इंडियन ब्लेड मैराथन रनर के नाम से भी पहचाना जाता है। हाल ही में मेजर ने नासिक में आयोजित “Spirit of Adventure” में स्काई डाइविंग की है। एक पैर के सहारे स्काई डाइविंग के जरिए मेजर ने आकाश की सैर की है और अब वह एक स्काई डाइवर भी बन गए हैं। जानिए कैसा रहा डीपी सिंह का मेजर, ब्लेड रनर से लेकर स्काई डाइवर तक का सफर। डीपी सिंह को इंडियन आर्मी द्वारा स्काई डाइविंग की ट्रेनिंग दी गई थी। “Spirit of Adventure” कार्यक्रम के दौरान तमाम डिसेबल जवानों को स्काई डाइविंग की ट्रेनिंग दी गई। ब्लेड रनर डीपी सिंह ने सफलता पूर्वक आकाश में उड़ान भरी और अपने अदम्य साहस का एक बार फिर से परिचय कराया।मेजर डीपी सिंह ने साबित कर दिया कि 'मंजिलें उनकी ही सच होती है जिनमें जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है।'' ये पंक्तियां मेजर डीपी सिंह जैसे सैनिकों पर एक दम सटीक बैठती हैं।आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत की अनुमति मिलने के बाद 18 मार्च से मेजर डीपी सिंह को स्काई डाइविंग प्रशिक्षण कराया गया था। उन्होंने अपना हौंसला एक बार बुलंद किया और डिसेबल लोगों के लिए एक बार फिर प्रेरणा का सबब बने।मरने के बाद फिर जी उठे योद्धा मेजर डीपी सिंह अब एक मिसाल बन चुके हैं। मेजर का कहना है कि बचपन से अब तक उन्हें जब-जब तिरस्कार का सामना करना पड़ा, तब-तब उनके हौंसले और मुश्किलों से हार न मानने का जज्बा और मजबूत होता चला गया। ब्लेड रनर के अनुभव को बयां करते हुए मेजर का कहना है कि रनिंग के दौरान कई ऐसे मौके आए जब उन्हें बेहद पीड़ा हुई। शरीर में इतने जख्म थे कि दौड़ लगाते हुए उनके पैरों से खून रिसने लगता था लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और पहले केवल चला, फिर तेज चले और फिर दौड़ने लगे।लगातार तीन बार मैराथन दौड़ चुके मेजर सिंह ने कहा कि उन्हें सेना ने कृत्रिम पैर दिलाए, जिन्हें हम ‘ब्लेड प्रोस्थेसिस’ कहते हैं। मेजर के पैर में लगा कृत्रिम पैर का निर्माण भारत में नहीं बल्कि पश्चिमी देशों में होता है। इन पैरों की इतनी अधिक कीमत देखते हुए मेजर का कहना है कि सरकार को इस तरह की प्रौद्योगिकी और डिजाइन वाले पैर भारत में बनाने पर गौर करना चाहिए। मेजर ने 2009 में कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखा था।दो बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज करा चुके मेजर सिंह को विकलांग, शारीरिक रूप से अक्षम या अशक्त कहे जाने पर सख्त आपत्ति है।वह खुद को और अपने जैसे अन्य लोगों को ‘चैलेन्जर’ यानी चुनौती देने वाला कहलाना पसंद करते हैं। लिहाजा वह अपने जीवन में एक के बाद एक चैलेजिंग कार्य करते हैं।मेजर डीपी सिंह ऐसे लोगों के लिए एक संस्था चला रहे हैं- ‘दि चैलेंजिंग वंस’ और किसी वजह से पैर गंवा देने वाले लोगों को कृत्रिम अंगों के जरिए धावक बनने की प्रेरणा दे रहे हैं। वे जीवन की कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझने को तैयार हैं और उसे चुनौती के रूप में लेते हैं।.
कभी हार न मानने वाले कारगिल युद्ध के हीरो मेजर डीपी सिंह का पूरा जीवन देश के नाम रहा है। सेना में रहते हुए उन्होंने कारगिल में अपनी अहम भूमिका निभाई। इस युद्ध में उनके शरीर के कई भागों में न सिर्फ चोटें आईं थी बल्कि वह अपना एक पैर भी खो चुके थे। बाद में जब मेजर को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था तो डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था लेकिन बाद में फिर जी उठे। यह साल 1999 की 15 जुलाई का दिन था, जिसे मेजर अपना पुर्नजन्म मानते हैं। आत्मविश्वास से लबरेज मेजर ने कभी हार नहीं मानी। उनके हौंसले को देखते हुए आर्मी ने उन्हें कृतिम पैर दिलवाए, जिनकी कीमत करीब साढ़े चार लाख रुपए है। मेजर के बाद वह ब्लेड रनर बन गए। अब उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल कर अपनी पहचान स्काई डाइवर के रूप में बनाई है। इन्हें फर्स्ट इंडियन ब्लेड मैराथन रनर के नाम से भी पहचाना जाता है। हाल ही में मेजर ने नासिक में आयोजित “Spirit of Adventure” में स्काई डाइविंग की है। एक पैर के सहारे स्काई डाइविंग के जरिए मेजर ने आकाश की सैर की है और अब वह एक स्काई डाइवर भी बन गए हैं। जानिए कैसा रहा डीपी सिंह का मेजर, ब्लेड रनर से लेकर स्काई डाइवर तक का सफर। डीपी सिंह को इंडियन आर्मी द्वारा स्काई डाइविंग की ट्रेनिंग दी गई थी। “Spirit of Adventure” कार्यक्रम के दौरान तमाम डिसेबल जवानों को स्काई डाइविंग की ट्रेनिंग दी गई। ब्लेड रनर डीपी सिंह ने सफलता पूर्वक आकाश में उड़ान भरी और अपने अदम्य साहस का एक बार फिर से परिचय कराया।मेजर डीपी सिंह ने साबित कर दिया कि 'मंजिलें उनकी ही सच होती है जिनमें जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है।'' ये पंक्तियां मेजर डीपी सिंह जैसे सैनिकों पर एक दम सटीक बैठती हैं।आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत की अनुमति मिलने के बाद 18 मार्च से मेजर डीपी सिंह को स्काई डाइविंग प्रशिक्षण कराया गया था। उन्होंने अपना हौंसला एक बार बुलंद किया और डिसेबल लोगों के लिए एक बार फिर प्रेरणा का सबब बने।मरने के बाद फिर जी उठे योद्धा मेजर डीपी सिंह अब एक मिसाल बन चुके हैं। मेजर का कहना है कि बचपन से अब तक उन्हें जब-जब तिरस्कार का सामना करना पड़ा, तब-तब उनके हौंसले और मुश्किलों से हार न मानने का जज्बा और मजबूत होता चला गया। ब्लेड रनर के अनुभव को बयां करते हुए मेजर का कहना है कि रनिंग के दौरान कई ऐसे मौके आए जब उन्हें बेहद पीड़ा हुई। शरीर में इतने जख्म थे कि दौड़ लगाते हुए उनके पैरों से खून रिसने लगता था लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और पहले केवल चला, फिर तेज चले और फिर दौड़ने लगे।लगातार तीन बार मैराथन दौड़ चुके मेजर सिंह ने कहा कि उन्हें सेना ने कृत्रिम पैर दिलाए, जिन्हें हम ‘ब्लेड प्रोस्थेसिस’ कहते हैं। मेजर के पैर में लगा कृत्रिम पैर का निर्माण भारत में नहीं बल्कि पश्चिमी देशों में होता है। इन पैरों की इतनी अधिक कीमत देखते हुए मेजर का कहना है कि सरकार को इस तरह की प्रौद्योगिकी और डिजाइन वाले पैर भारत में बनाने पर गौर करना चाहिए। मेजर ने 2009 में कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखा था।दो बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज करा चुके मेजर सिंह को विकलांग, शारीरिक रूप से अक्षम या अशक्त कहे जाने पर सख्त आपत्ति है।वह खुद को और अपने जैसे अन्य लोगों को ‘चैलेन्जर’ यानी चुनौती देने वाला कहलाना पसंद करते हैं। लिहाजा वह अपने जीवन में एक के बाद एक चैलेजिंग कार्य करते हैं।मेजर डीपी सिंह ऐसे लोगों के लिए एक संस्था चला रहे हैं- ‘दि चैलेंजिंग वंस’ और किसी वजह से पैर गंवा देने वाले लोगों को कृत्रिम अंगों के जरिए धावक बनने की प्रेरणा दे रहे हैं। वे जीवन की कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझने को तैयार हैं और उसे चुनौती के रूप में लेते हैं।
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