अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि अदालतों को 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' तय करने से बचना चाहिए। बोर्ड ने तर्क दिया है कि यह कदम धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप होगा। सबरीमला मामले में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर 7 अप्रैल से अंतिम सुनवाई शुरू होगी।
नई दिल्ली: अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि 'आवश्यक धार्मिक प्रथा ' क्या है। बोर्ड ने दलील दी है कि इस तरह की न्यायिक जांच संविधान के अनुच्छेद-25 और 26 के तहत प्रदत्त ' धर्म की स्वतंत्रता ' में हस्तक्षेप करने के समान हो सकती है। बोर्ड ने अपनी लिखित दलील में स्पष्ट किया है कि किसी धर्म के 'मूल' की पहचान स्वभाव से ही व्यक्तिपरक होती है और यह उस धर्म के अनुयायियों की आस्था पर निर्भर करती है। उनका कहना है कि यह
धार्मिक विश्वास का मामला है और अदालतें इसमें दखलंदाजी न करें। बोर्ड ने इस बात पर जोर दिया है कि धर्म की आवश्यकताओं का निर्धारण आस्था, सिद्धांतों और व्याख्या से जुड़े जटिल सवालों से संबंधित है, जिन्हें अदालतों के बजाय धार्मिक विद्वानों और संप्रदायों पर छोड़ना अधिक उचित होगा। यह उनका मानना है कि धार्मिक मामलों का फैसला धार्मिक विशेषज्ञ ही बेहतर ढंग से कर सकते हैं।\सबरीमला मामले को लेकर बोर्ड ने अपनी बात रखी है, जिसमें धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव से संबंधित याचिकाओं के एक समूह पर 9 जजों की बेंच 7 अप्रैल से अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। यह सुनवाई केरल के सबरीमला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश सहित अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़े मामलों पर केंद्रित होगी। इस मामले में चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में एक विशेष पीठ का गठन किया जाएगा। सुनवाई 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है। बोर्ड ने इस मामले में सभी संबंधित पक्षों से लिखित दलीलें मांगी थीं। बता दें कि 2019 में, पांच जजों की बेंच ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव से जुड़े इस मामले को बड़ी पीठ को रेफर किया था। इस अंतिम सुनवाई में सबरीमला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश, मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के अधिकार, और पारसी महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल होंगे। बोर्ड का मानना है कि इन सभी मुद्दों पर विचार करते समय धार्मिक भावनाओं और आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए। यह एक संवेदनशील मुद्दा है और बोर्ड चाहता है कि इस मामले में सभी पक्षों की भावनाओं को ध्यान में रखा जाए।\बोर्ड ने अपनी दलीलों में स्पष्ट रूप से कहा है कि धार्मिक मामलों में अदालतों का दखल धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। उनका मानना है कि अदालतों को 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' को परिभाषित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह एक जटिल और व्यक्तिपरक मामला है। बोर्ड का यह भी मानना है कि धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं को धार्मिक विद्वानों और समुदाय के सदस्यों द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए, न कि अदालतों द्वारा। बोर्ड ने यह भी तर्क दिया है कि धार्मिक प्रथाओं को अदालत में चुनौती देना अक्सर गलत व्याख्याओं और गलतफहमी का कारण बनता है, जिससे धार्मिक समुदायों के बीच संघर्ष और तनाव पैदा हो सकता है। इस प्रकार, बोर्ड अदालतों से आग्रह करता है कि वे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बचें और धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखें। बोर्ड का मानना है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप से बचने से सभी धार्मिक समुदायों के बीच सद्भाव और सम्मान की भावना को बढ़ावा मिलेगा। बोर्ड का मानना है कि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सभी धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं का पालन करने की स्वतंत्रता मिले, और अदालतों को इस स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। बोर्ड ने जोर देकर कहा है कि यह मामला सिर्फ एक विशेष धार्मिक समुदाय का नहीं है, बल्कि यह सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता और अधिकारों से जुड़ा है
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