ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि 1990 में बाल ठाकरे की शिवसेना के साथ महाराष्ट्र में छोटे भाई की हैसियत से 42 सीटें जीतने वाली बीजेपी आज महाराष्ट्र में अकेले 34 साल में सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी बन गई है, लेकिन क्या अब 'एक हैं तो सेफ हैं' के चुनावी नारे वाले राज्य में ठाकरे परिवार और पार्टी की राजनीति सियासी तौर पर सेफ नहीं...
महाराष्ट्र में महायुति सरकार ने शानदार वापसी की है. महायुति गठबंधन ने 233 सीटों पर जीत हासिल की है. इसमें बीजेपी के खाते में 132 सीटें आई हैं, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना 57 तो अजित गुट की एनसीपी 41 सीटों जीती हैं.
वहीं, उद्धव गुट की शिवसेना महज 20 सीटों पर सिमट गई है. तो शरद गुट की एनसीपी ने 10 सीटें जीती हैं. इसके साथ ही अब ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या ये नतीजे असली शिवसेना, नकली शिवसेना, असली एनसीपी और नकली एनसीपी के सियासी विवाद को भी खत्म कर देंगे? ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि 1990 में बाल ठाकरे की शिवसेना के साथ महाराष्ट्र में छोटे भाई की हैसियत से 42 सीटें जीतने वाली बीजेपी आज महाराष्ट्र में अकेले 34 साल में सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी बन गई है, लेकिन क्या अब 'एक हैं तो सेफ हैं' के चुनावी नारे वाले राज्य में ठाकरे परिवार और पार्टी की राजनीति सियासी तौर पर सेफ नहीं रही? पूछा जाने लगा कि क्या भले कोर्ट में अब भी असली-नकली शिवसेना का विवाद चल रहा हो, लेकिन जनता की अदालत में असली-नकली का फैसला हो गया है? सवाल इसलिए, क्योंकि पांच साल पहले बीजेपी के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद नतीजों के बाद अलग होकर शरद पवार-कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बन जाने वाले उद्धव ठाकरे के पास अब इतने विधायक भी नहीं हैं कि अपनी पार्टी से नेता विपक्ष बनवा लें. उद्धव के साथ उनके साथी शरद पवार और कांग्रेस की सीट जोड़ दें, तो भी शिंदे की शिवसेना अकेले अपने दम पर आगे है. 6 महीने पहले लोकसभा चुनाव के दौरान 57 विधानसभा सीटों पर आगे रही उद्धव ठाकरे की पार्टी अब केवल 21 सीट जीत पा रही है. 36 का नुकसान दिखता है.Advertisementठाकरे परिवार के राजनीतिक भविष्य पर सवालजिस महाराष्ट्र में शिवसेना मतलब ठाकरे परिवार रहा. वहां आज हालत ये हो गई कि शिवसेना से ही अलग होकर पार्टी चलाने वाले राज ठाकरे एक सीट नहीं जीत पाए. यहां तक कि राज ठाकरे के बेटे माहिम में तीसरे नंबर पर रहे. वहीं, वर्ली सीट पर उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे जो 2019 में 55 हजार से ज्यादा वोट के अंतर से जीते थे, वह इस बार 9 हजार से कम वोट के अंतर से ही जीत पाए. इसीलिए जब सवाल हुआ कि जहां ठाकरे परिवार को ही शिवसेना माना गया, क्या वहां परिवार और पार्टी दोनों के राजनीतिक भविष्य पर सवाल है? उद्धव के सेनापति संजय राउत तो नतीजों पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं. ऐसी स्थिति में क्यों आई उद्धव की पार्टी?जनता और चुनावी प्रक्रिया पर आशंका जताती उद्धव की पार्टी आखिर क्यों ऐसी स्थिति में आ गई? जबकि चुनाव के दौरान उद्धव ठाकरे 15 नवंबर तक भावुक अपील करते हुए वोट मांगते रहे. उद्धव ठाकरे ने भावुक अपील करते हुए कहा था कि "जिस दिन तुम कहोगे कि उद्धव ठाकरे, बस हो गया, अब घर पर बैठो, उस दिन मैं उसी वक्त बैठ जाऊंगा, मगर जब तक तुम मुझे कहोगे कि तुम लड़ो... फिर कोई भी आ जाए, अगर प्राण भी जाते हैं तो लड़ूंगा और जीतकर दिखाऊंगा. Advertisementडिफेंसिव प्रचार से हुआ उद्धव को नुकसान?भावनाओं की सियासी हांडी चुनाव के दौरान क्या अब उद्धव ठाकरे की नहीं चढ़ सकती है? यही वजह है कि सीएम बनने का ख्वाब अब ख्वाब ही रहा जा रहा है. क्या इसकी वजह उद्धव ठाकरे का डिफेंसिव होकर प्रचार करना रहा, जबकि बाल ठाकरे के रहते शिवसेना मतलब हिंदू... हिंदुत्व पर आक्रामक स्टाइल. बाला साहेब ठाकरे को उनके समर्थक हिंदू हृदय सम्राट कहते थे, तब हिंदुओं की बात सीधे तरीके से कहने वाली शिवसेना का सियासी स्टाइल बदल देना ही उद्धव के लिए चुनौती बन गया है. शिंदे गुट की टक्कर में कहां खड़ा है उद्धव गुट?39 सीटों पर दोनों शिवसेना आमने-सामने रहीं, तो शिंदे ने 26 सीट जीतीं. उद्धव की पार्टी 13 सीट जीत पाई. जिस मुंबई को ठाकरे परिवार का गढ़ माना गया, वहां की 36 सीटों में से 21 पर NDA आगे रहा और 15 सीटों पर महा विकास अघाड़ी. यही वजह है कि जब उद्धव ठाकरे की पार्टी नतीजों पर भरोसा नहीं कर पा रही, तब बीजेपी बताने में जुटी है कि अब बीजेपी के साथ जो शिंदे हैं, वही असली शिवसेना हैं. ये भी देखें
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