बीएमसी चुनाव रिजल्ट: ठाकरे ब्रदर्स का 'मराठी मानुस' कार्ड क्यों नहीं चला, महायुति कैसे आगे निकल गई? 10 अपडे...

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बीएमसी चुनाव रिजल्ट: ठाकरे ब्रदर्स का 'मराठी मानुस' कार्ड क्यों नहीं चला, महायुति कैसे आगे निकल गई? 10 अपडे...
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Mumbai BMC Chunav Results: बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजों ने मुंबई की सियासत में 'महायुति' का परचम लहरा दिया है. बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. उद्धव ठाकरे के 30 साल पुराने साम्राज्य का अंत हो गया है, जबकि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी है. राज-उद्धव की 'मराठी अस्मिता' की रणनीति भी फेल रही.

मुंबई महानगरपालिका के चुनावी नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा पूरी तरह बदल दी है. ताजा रुझानों में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की महायुति ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है. पिछले तीन दशकों से बीएमसी की सत्ता पर काबिज ठाकरे परिवार का वर्चस्व अब खत्म हो गया है.

महायुति गठबंधन 119 से ज्यादा सीटों पर निर्णायक बढ़त बनाए हुए है. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी भी इस भगवा लहर को रोकने में नाकाम रही. मुंबई के मतदाताओं ने विकास और बुनियादी ढांचे के नाम पर अपना फैसला सुना दिया है. बीजेपी मुंबई में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. फड़णवीस की रणनीति ने विपक्षी गठबंधन के हर दांव को पूरी तरह फेल कर दिया है. यह जीत न केवल मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी के बढ़ते दबदबे का स्पष्ट संकेत है. अब मुंबई को नया ‘राजा’ मिलना तय है. मुंबई महानगरपालिका चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि शहर का मिजाज अब बदल चुका है. शुक्रवार को हुई मतगणना में महायुति गठबंधन ने शुरुआत से ही बढ़त बना ली थी. बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर 114 के बहुमत के आंकड़े को आसानी से छू लिया है. रुझानों के मुताबिक महायुति 120 सीटों के करीब पहुंचती दिख रही है. वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की एमएनएस का गठबंधन 60 सीटों के आसपास सिमट गया है. कांग्रेस को भी इस चुनाव में केवल 12 से 14 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है. इन आंकड़ों ने मुंबई की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर दी है. अब बीएमसी के गलियारों में ठाकरे परिवार की नहीं बल्कि महायुति की आवाज गूंजेगी. पिछले 30 सालों से बीएमसी पर शिवसेना का एकछत्र राज था. लेकिन इस बार मुंबईकरों ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है. उद्धव और राज ठाकरे के एक साथ आने के बावजूद वे अपना गढ़ नहीं बचा पाए. जानकारों का मानना है कि ‘मराठी अस्मिता’ का मुद्दा इस बार काम नहीं कर पाया. लोगों ने भ्रष्टाचार और सड़कों की बदहाली जैसे स्थानीय मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया है. ठाकरे गुट का अपने पुराने वफादार वोटरों पर से नियंत्रण भी काफी कम हुआ है. एकनाथ शिंदे की बगावत ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे को जड़ से हिला दिया था. इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला जिसने शहरी इलाकों में अपनी जड़ें काफी गहरी कर ली हैं. मुंबई की जनता ने अब नए नेतृत्व पर अपना भरोसा जताया है. इस चुनाव में बीजेपी की जीत के सबसे बड़े हीरो देवेंद्र फड़णवीस बनकर उभरे हैं. उन्होंने पूरी आक्रामकता के साथ चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी. फड़णवीस ने न केवल अपनी पार्टी को एकजुट रखा बल्कि सहयोगियों के साथ भी तालमेल बिठाया. उन्होंने ठाकरे भाइयों के ‘मराठी बनाम गैर-मराठी’ विवाद का भी डटकर मुकाबला किया. उन्होंने विकास के मुद्दों को केंद्र में रखकर मध्यम वर्ग को अपनी तरफ खींचा है. बीजेपी ने मुंबई के उत्तर भारतीय और गुजराती वोट बैंक को भी पूरी तरह सुरक्षित रखा. फड़णवीस की बैकडोर स्ट्रैटेजी ने विपक्षी गठबंधन को कई वार्डों में संभलने का मौका नहीं दिया. उनकी इस मेहनत ने बीजेपी को मुंबई की सत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया है. आज के नतीजे उन्हें महाराष्ट्र का सबसे प्रभावशाली नेता साबित करते हैं. बीएमसी के नतीजों ने असली शिवसेना की जंग को एक नया मोड़ दे दिया है. सीटों के लिहाज से देखें तो उद्धव ठाकरे का गुट अभी भी शिंदे गुट से आगे दिख रहा है. शिवसेना ने करीब 60 सीटों पर बढ़त बनाई है जबकि शिंदे की सेना 30 पर है. हालांकि सत्ता के गणित में शिंदे गुट बाजी मारता हुआ नजर आ रहा है. शिंदे ने उद्धव के कई पारंपरिक वार्डों में सेंध लगाने में सफलता हासिल की है. यह रुझान बताते हैं कि शिवसैनिकों का वोट बैंक अब दो हिस्सों में बुरी तरह बंट गया है. उद्धव ठाकरे के लिए यह आंकड़ा उनकी साख बचाने के लिए काफी नहीं है. वहीं शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर सत्ता की चाबी अपने पास रख ली है. आने वाले दिनों में यह लड़ाई कानूनी और राजनीतिक रूप से और तेज होगी. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने इस चुनाव में मराठी मानुस के अस्तित्व का मुद्दा उठाया था. उन्होंने बाहरी लोगों द्वारा मुंबई को लूटने का नैरेटिव सेट करने की कोशिश की थी. लेकिन नतीजों ने यह साबित किया कि मुंबई अब केवल भाषा की राजनीति तक सीमित नहीं है. युवा वोटर अब रोजगार, मेट्रो और बेहतर परिवहन की सुविधाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं. राज ठाकरे की एमएनएस को इस बार भी बड़ी कामयाबी हाथ नहीं लगी है. एमएनएस केवल 9 सीटों तक सिमटती हुई दिखाई दे रही है. लोगों ने हिंसक विरोध प्रदर्शनों और संकुचित राजनीति को पूरी तरह नकार दिया है. बीजेपी की ‘सबका साथ सबका विकास’ वाली नीति ने भाषा के अवरोधों को तोड़ दिया है. अब मुंबई एक वैश्विक शहर की तरह अपनी नई पहचान बनाना चाहती है. केवल मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र में महायुति का परचम लहरा रहा है. राज्य के कुल 29 नगर निगमों में से 23 पर बीजेपी गठबंधन आगे चल रहा है. नागपुर में बीजेपी ने अपनी पकड़ और भी ज्यादा मजबूत कर ली है. पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में पवार परिवार के गढ़ को बीजेपी ने ध्वस्त कर दिया है. नासिक में भी महायुति की सरकार बनना लगभग तय माना जा रहा है. हालांकि लातूर में कांग्रेस ने अपना दबदबा बनाए रखा और वहां जीत दर्ज की. कोल्हापुर में महाविकास अघाड़ी ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी है. फिर भी ओवरऑल परफॉर्मेंस में महायुति ने विपक्षी दलों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. यह जीत महाराष्ट्र की भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है. इस चुनाव में कांग्रेस और अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को बड़ा झटका लगा है. कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था जो उसके लिए आत्मघाती रहा. पार्टी का वोट शेयर 2017 के मुकाबले और भी ज्यादा गिर गया है. अजीत पवार की एनसीपी भी मुंबई में अपना खाता खोलने के लिए संघर्ष करती दिखी. उनके गुट को केवल एक सीट पर ही बढ़त मिलती हुई नजर आ रही है. विपक्षी दलों के बीच आपसी तालमेल की कमी का पूरा फायदा महायुति को मिला है. दलित और मुस्लिम वोट बैंक भी कई हिस्सों में बंट गया जिससे विपक्ष कमजोर हुआ. अजीत पवार का प्रभाव उनके गृह क्षेत्र के बाहर काफी कम होता दिखाई दे रहा है. कांग्रेस को अब अपनी शहरी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा. बहुमत मिलने के बाद अब सबकी नजरें मुंबई के अगले मेयर पर टिकी हुई हैं. महायुति में शामिल बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है इसलिए मेयर उसकी पार्टी का हो सकता है. बीजेपी की तरफ से कई वरिष्ठ नामों पर चर्चा अभी से शुरू हो गई है. हालांकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना भी इस महत्वपूर्ण पद के लिए दावा ठोक सकती है. बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि किसी मराठी चेहरे को ही मेयर बनाया जाना चाहिए. इससे ‘मराठी विरोधी’ होने के आरोपों को कम करने में मदद मिलेगी. आशीष शेलार या मंगल प्रभात लोढ़ा जैसे नामों पर भी कयास लगाए जा रहे हैं. अंतिम फैसला फड़णवीस और शिंदे के बीच आपसी सहमति से लिया जाएगा. मुंबई के विकास की कमान अब एक नई टीम के हाथों में होगी. बीएमसी चुनाव के नतीजों ने लगभग सभी एग्जिट पोल की भविष्यवाणियों पर मुहर लगाई है. एक्सिस माई इंडिया ने महायुति को 131 से 151 सीटें मिलने का अनुमान जताया था. जेवीसी एग्जिट पोल ने भी महायुति को 138 सीटें दी थीं. रुझान अभी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं जिससे पोलस्टर्स की साख बढ़ी है. उद्धव ठाकरे गुट को मिलने वाली सीटों का अनुमान भी काफी हद तक सही रहा. हालांकि कांग्रेस और एमएनएस के प्रदर्शन ने कई जानकारों को थोड़ा हैरान किया है. लोगों को उम्मीद थी कि ठाकरे भाइयों के मिलन से कड़ा मुकाबला होगा. लेकिन महायुति की लहर ने इन सभी अनुमानों को एकतरफा बना दिया. जनता की नब्ज पहचानने में चुनावी विश्लेषक इस बार काफी हद तक सफल रहे हैं. मुंबई की जनता ने विकास के नाम पर महायुति को प्रचंड जनादेश दिया है. अब नई सत्ता से लोगों को जलभराव और गड्ढों वाली सड़कों से मुक्ति की उम्मीद है. मुंबई के कोस्टल रोड और मेट्रो प्रोजेक्ट्स को अब और गति मिलने की संभावना है. भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना नई टीम के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. बीएमसी का बजट दुनिया के कई छोटे देशों से भी ज्यादा बड़ा होता है. इसका सही इस्तेमाल शहर की तस्वीर बदलने के लिए किया जाना चाहिए. आम नागरिक अब केवल वादे नहीं बल्कि जमीन पर ठोस बदलाव देखना चाहते हैं. महायुति की इस जीत ने जिम्मेदारी का बोझ भी उनके कंधों पर बढ़ा दिया है. आने वाले पांच साल मुंबई के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होने वाले हैं.

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