Santosh Gangwar: कुर्मी बिरादरी से आने वाले संतोष गंगवार का टिकट कटने का असर बरेली के साथ ही 3 सीटों पर भी देखने को मिला। अब उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया है, जहां इस साल चुनाव होना है। ओबीसी वोटबैंक पर फोकस के साथ ही इस कदम को एक तीर से कई निशाना लगाने से देखा जा रहा...
बरेली: भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता, 8 बार के सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रहे संतोष गंगवार का टिकट इस बार के लोकसभा चुनाव में काट दिया गया। बरेली सीट से संतोष का टिकट काटकर छत्रपाल गंगवार को प्रत्याशी बनाया जाना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा। कुर्मी बिरादरी से आने वाले गंगवार का टिकट कटने का असर 3 सीटों पर भी देखने को मिला। अब उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। इस कदम को एक तीर से कई निशाना लगाने से देखा जा रहा है। झारखंड के राज्यपाल के रूप में भाजपा के पूर्व सांसद संतोष कुमार गंगवार की नियुक्ति के साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग और मुख्य तौर पर कुर्मी समुदाय को एक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इस साल के अंत में झारखंड में विधानसभा चुनाव होना है। कुर्मी और पिछड़े वर्ग की प्रभावी संख्या को देखते हुए इसे एक दांव के रूप में देखा जा रहा है। हाल के लोकसभा चुनाव में यह समुदाय इंडी गठबंधन की तरफ झुक गया था। झारखंड के गवर्नर बने गंगवारदो दिन पहले शनिवार को नियुक्त किए गए देश के 9 नए राज्यपालों में से गंगवार भी शामिल हैं। वह कुर्मी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ओबीसी नेता हैं। वैसे तो यह समुदाय पारंपरिक तौर पर भाजपा का ही वोटबैंक है। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में कुर्मी वोटबैंक यूपी और बिहार में विपक्षी गठबंधन के पक्ष में शिफ्ट होता दिखा। अब 81 सीटों वाले झारखंड में बीजेपी सियासी संदेश देने की कोशिश में है। समाज के हर तबके में है पैठ गंगवार को बरेली सीट से चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं दिए जाने के फैसले से उनके समर्थक और बरेली और आसपास के क्षेत्रों जैसे कि बदायूँ और आंवला में कुर्मी मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग नाराज हो गया था। हालांकि भाजपा ने बरेली सीट तो जीत लिया, लेकिन बदायूँ और आँवला दोनों जगह हार गई। जमीनी नेता की पहचान वाले गंगवार की पैठ मुस्लिम समुदाय में भी थी। उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड क्षेत्र में गंगवार को सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली ओबीसी समूह माना जाता है। बरेली लोकसभा में इसके 3 लाख से अधिक मतदाता हैं। भाजपा के सूत्रों ने कहा कि गंगवार को भाजपा के भीतर, खासकर उनके समुदाय के भीतर आंतरिक मतभेदों के कारण टिकट नहीं दिया गया। PM मोदी को खुद करना पड़ा रोडशो कुर्मियों के बीच बढ़ती नाराजगी के मद्देनजर पीएम मोदी को रोडशो और जनसभा भी करनी पड़ी, जिसमें योगी के साथ संतोष गंगवार भी शामिल रहे। पिछले चुनाव में भी मोदी को इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। नाराजगी के बीच भाजपा कैंडिडेट छत्रपाल को 34 हजार से जीत हासिल हो गई। बरेली में विकास पुरुष कहे जाते हैं गंगवारनवनियुक्त राज्यपाल अपने संसदीय क्षेत्र बरेली में विकास पुरुष के नाम से प्रसिद्ध हैं। बरेली में वह शहरी कोऑपरेटिव बैंक की स्थापना को लेकर पूरी तरह सक्रिय थे और 1996 की शुरुआत में वे इस बैंक के चेयरपर्सन के रूप में कार्यरत थे। चौपला रेलवे स्टेशन का निर्माण, स्टेट आर्ट लाइब्रेरी, मिनी बाई पास सहित तमाम प्रोजेक्ट्स के निर्माण का श्रेय संतोष गंगवार को जाता है।.
बरेली: भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता, 8 बार के सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रहे संतोष गंगवार का टिकट इस बार के लोकसभा चुनाव में काट दिया गया। बरेली सीट से संतोष का टिकट काटकर छत्रपाल गंगवार को प्रत्याशी बनाया जाना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा। कुर्मी बिरादरी से आने वाले गंगवार का टिकट कटने का असर 3 सीटों पर भी देखने को मिला। अब उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। इस कदम को एक तीर से कई निशाना लगाने से देखा जा रहा है। झारखंड के राज्यपाल के रूप में भाजपा के पूर्व सांसद संतोष कुमार गंगवार की नियुक्ति के साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग और मुख्य तौर पर कुर्मी समुदाय को एक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। इस साल के अंत में झारखंड में विधानसभा चुनाव होना है। कुर्मी और पिछड़े वर्ग की प्रभावी संख्या को देखते हुए इसे एक दांव के रूप में देखा जा रहा है। हाल के लोकसभा चुनाव में यह समुदाय इंडी गठबंधन की तरफ झुक गया था। झारखंड के गवर्नर बने गंगवारदो दिन पहले शनिवार को नियुक्त किए गए देश के 9 नए राज्यपालों में से गंगवार भी शामिल हैं। वह कुर्मी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ओबीसी नेता हैं। वैसे तो यह समुदाय पारंपरिक तौर पर भाजपा का ही वोटबैंक है। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में कुर्मी वोटबैंक यूपी और बिहार में विपक्षी गठबंधन के पक्ष में शिफ्ट होता दिखा। अब 81 सीटों वाले झारखंड में बीजेपी सियासी संदेश देने की कोशिश में है। समाज के हर तबके में है पैठ गंगवार को बरेली सीट से चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं दिए जाने के फैसले से उनके समर्थक और बरेली और आसपास के क्षेत्रों जैसे कि बदायूँ और आंवला में कुर्मी मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग नाराज हो गया था। हालांकि भाजपा ने बरेली सीट तो जीत लिया, लेकिन बदायूँ और आँवला दोनों जगह हार गई। जमीनी नेता की पहचान वाले गंगवार की पैठ मुस्लिम समुदाय में भी थी। उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड क्षेत्र में गंगवार को सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली ओबीसी समूह माना जाता है। बरेली लोकसभा में इसके 3 लाख से अधिक मतदाता हैं। भाजपा के सूत्रों ने कहा कि गंगवार को भाजपा के भीतर, खासकर उनके समुदाय के भीतर आंतरिक मतभेदों के कारण टिकट नहीं दिया गया। PM मोदी को खुद करना पड़ा रोडशो कुर्मियों के बीच बढ़ती नाराजगी के मद्देनजर पीएम मोदी को रोडशो और जनसभा भी करनी पड़ी, जिसमें योगी के साथ संतोष गंगवार भी शामिल रहे। पिछले चुनाव में भी मोदी को इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। नाराजगी के बीच भाजपा कैंडिडेट छत्रपाल को 34 हजार से जीत हासिल हो गई। बरेली में विकास पुरुष कहे जाते हैं गंगवारनवनियुक्त राज्यपाल अपने संसदीय क्षेत्र बरेली में विकास पुरुष के नाम से प्रसिद्ध हैं। बरेली में वह शहरी कोऑपरेटिव बैंक की स्थापना को लेकर पूरी तरह सक्रिय थे और 1996 की शुरुआत में वे इस बैंक के चेयरपर्सन के रूप में कार्यरत थे। चौपला रेलवे स्टेशन का निर्माण, स्टेट आर्ट लाइब्रेरी, मिनी बाई पास सहित तमाम प्रोजेक्ट्स के निर्माण का श्रेय संतोष गंगवार को जाता है।
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