नीतीश कुमार: 30 साल पुराने वीडियो में दिखा नेता का प्रभावशाली अंदाज, सुषमा स्वराज को संभाला

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नीतीश कुमार: 30 साल पुराने वीडियो में दिखा नेता का प्रभावशाली अंदाज, सुषमा स्वराज को संभाला
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लोकसभा में 30 साल पहले नीतीश कुमार का अंदाज आज भी वैसा ही है। 1996 में सुषमा स्वराज के भाषण के दौरान हंगामे को उन्होंने जिस तरह शांत कराया, वह आज भी चर्चा का विषय है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में नीतीश कुमार की विद्वता और क्षमता की प्रशंसा हो रही है।

पटना: ' नीतीश कुमार बहुत ही प्रभावशाली, बहुत ही बुद्धिमान, बहुत ही आत्मविश्वासी दिख रहे हैं। कैसे, नीतीश कुमार अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाए। कितने सशक्त नेता हैं। उनकी आवाज से पता चलता है कि वे कितने ज्ञानी हैं। गर्व महसूस होता है लेकिन यह देखकर बहुत दुख होता है कि नीतीश कुमार अपनी क्षमता के शिखर पर नहीं पहुंच पाए। समाज को देने के लिए उनके पास अभी बहुत कुछ है।' नीतीश कुमार के बारे में ये प्रतिक्रिया एक दर्शक की है, जो सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स से ली गई है। इस दर्शक ने आखिर क्यों इस तरह

की राय जाहिर की? इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए तीन दशक पीछे लौटना होगा। घटनाक्रम 30 साल पुराना है लेकिन प्रतिक्रिया पिछले साल की है।\जब लोकसभा स्पीकर की भूमिका में थे नीतीश कुमार 11 जून 1996 की बात है। नीतीश कुमार समता पार्टी के सांसद थे। वे लोकसभा में कार्यवाही संचालन के दौरान पीठासीन अधिकारी के रूप में अध्यक्ष के आसन पर बैठे थे। सदन में भाजपा की ओजस्वी वक्ता सुषमा स्वराज भाषण कर रही थीं। सत्ता पक्ष की लगातार टोका-टोकी से सुषमा स्वराज परेशान हो गईं तो अध्यक्ष के आसन पर बैठे नीतीश कुमार ने जिस बुद्धिमानी और क्षमता से सदन का संचालन किया वो एक यादगार घटना है। लोकसभा की कार्यवाही के इस अंश का एक वीडियो क्लिप जब सोशल मीडिया पर डाला गया तो देखने-सुनने वालों की प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई। नीतीश कुमार की तारीफ में तरह-तरह कमेंट किए गए।\1996 के लोकसभा चुनाव के बाद किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। 161 सीटें जीत कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। कांग्रेस को 140 सीटें मिली थीं। जनता दल को 46 सीटें मिलीं थीं। परम्परा के मुताबिक सबसे बड़े दल भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन वे बहुमत का प्रबंध नहीं कर सके और 13 दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद जनता दल के एचडी देवेगौड़ा ने 13 दलों के गठबंधन के साथ सरकार बनाई। कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया। प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने लोकसभा में बहुमत साबित करने के लिए विश्वास मत का प्रस्ताव रखा था। इसी विश्वास मत पर चर्चा के दौरान विपक्ष की तरफ से सुषमा स्वराज अपनी बात रख रहीं थीं। जब सुषमा स्वराज सदन में बोल रही थीं उस समय नीतीश कुमार अध्यक्ष के आसन पर बैठे थे। सुषमा स्वराज का भाषण शुरू हुआ। उन्होंने 13 दलों के बेमेल गठबंधन से बनी देवेगौड़ा सरकार के विरोधाभासों पर हमला शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता पर तर्कपूर्ण और प्रभावशाली भाषण दिया। उन्होंने कहा, 'सिख विरोधी दंगे की आरोपी कांग्रेस आज सेक्युलर है।' उन्होंने नीतीश कुमार की तरफ देख कर कहा, 'आप तो बिहार के साक्षी हैं, वहां मुस्लिम और यादव का जोड़ बैठा कर माई की राजनीति करने वाली जनत दल सेक्युलर है। हम हिंदू होने पर शर्म नहीं करते, इसलिए कम्युनल हैं।' वे नीतीश कुमार की तरफ देखकर कहती हैं, 'अध्यक्ष महोदय ये धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता के नाम पर इकट्ठे नहीं हुए बल्कि अपने गुनाहों के कारण हुए हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन बताए कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में करप्शन को लेकर क्यों नहीं कोई चर्चा की गई?'\सुषमा स्वराज ने जब ये मुद्दा उठाया तो सत्ता पक्ष के सदस्य हंगामा करने लगे। तब उन्होंने कहा, 'क्या आप मुझे बोलने नहीं देंगे? अच्छा है, बैठ जाती हूं।' इस पर अध्यक्ष के आसन पर बैठे नीतीश कुमार ने कहा, 'नहीं! नहीं! सुषमा जी बोलिए।' वे बोलने लगीं। जब वे हिंदुत्व पर बोल रही थीं तब राजद की सदस्य भगवती देवी ने कहा, 'क्या मैं हिंदू नहीं हूं, फिर मुझे मंदिर में प्रवेश करने क्यों नहीं दिया गया?' इस पर सुषमा स्वराज ने कहा, 'हिंदुत्व में जाति का कोई भेद नहीं। श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए पहली शिला एक 'हरिजन' के शख्स ने रखी थी।' इस सदन में फिर हंगामा शुरू हो गया। सुषमा स्वराज समझ नहीं पाईं कि अब हंगामा क्यों होने लगा? तब नीतीश कुमार ने बताया कि सदस्यों को 'हरिजन' शब्द पर एतराज है। सुषमा स्वराज ने तत्काल अपनी बात सुधार ली और कहा कि इसकी जगह दलित शब्द को ही रिकॉर्ड में रखा जाए। इसके बाद भी सदन शोरगुल होता रहा। सुषमा स्वराज कुछ बोल नहीं पा रही थीं। तब लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका निभा रहे नीतीश कुमार ने अभूतपूर्व कौशल और ज्ञान का परिचय दिया। उन्होंने हंगामा कर रहे सदस्यों से कहा कि जब सुषमा जी ने शब्द बदल दिए तो फिर सदन को बाधित क्यों कर रहे हैं? हंगामा देख कर नीतीश कुमार अपने आसन से खड़े हो गए और बेहद गंभीर शब्दों में कहा, 'कृपा कर के आप लोग हाउस को कंडक्ट मत कीजिए।' फिर अपने आसन की तरफ इशारा कर के कहा, 'हाउस को कंडक्ट करने के लिए चेयर है। व्यवधान मत कीजिए। सुषमा जी को सुनिए।' इस पर द्रमुक के सदस्यों ने अंग्रेजी में कुछ कहा, तब नीतीश कुमार ने संसदीय प्रक्रिया की नियमावली के हवाले से उनसे शांत रहने के लिए कहा। नीतीश कुमार ने धाराप्रवाह अंग्रेजी में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, 'बिना आसन की इजाजत के कोई नहीं बोल सकता है। सबके बोलने का समय निर्धारित है। जब आपकी बारी आएगी तब आप बोलिएगा। सदन का समय बर्बाद मत कीजिए। ये बिल्कुल नहीं चलेगा।' इसके बाद सदन में शांति छा गई, तब जा कर सुषमा स्वराज अपना भाषण पूरा कर सकीं। नीतीश कुमार का अंदाज बिल्कुल नहीं बदला है। आज भी जब उनकी सभाओं से महिलाएं जाने लगती हैं, तब वे बड़े अधिकार से कहते हैं, 'अरे कहां जा रही हो, बैठो! सुनोगी तब न जाकर दूसरे को बताओगी कि क्या काम हो रहा है।' आज से 30 साल पहले भी नीतीश कुमार इसी स्टाइल में बात करते थे। सुषमा स्वराज के भाषण के दौरान जब सदन में हंगामा हो रहा था, तब अध्यक्

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