दिल्ली: वोट नहीं डाल पाएगा इस गांव का अकेला मतदाता via NavbharatTimes LokSabhaElections2019 ElectionsWithTimes
हाइलाइट्स:शेरपुर डेरी एक ऐसा गांव है जहां हरिनाथ अकेले वोटर थे, वोट भी डालते थेवोटर लिस्ट से कट चुका है नाम, शख्स का अलवर में चल रहा है इलाजयह गांव नजफगढ़ से करीब 10 किलोमीटर दूर है, यह गांव औरंगजेब के समय में बसा थावीरेंद्र वर्मा, नई दिल्ली राजधानी के एक गांव में रहने वाले अकेले शख्स इस बार लोकसभा चुनाव में अपना वोट नहीं डाल पाएंगे। करीब 77 साल के हरिनाथ नजफगढ़ इलाके शेरपुर डेयरी गांव में रहते हैं। वे अकेले इंसान हैं जो इस गांव में रहते हैं। इस गांव में उनके नाम पर वोट भी बना हुआ था। लेकिन अब उनका वोट इस गांव से कट चुका है और उनका वोटर आई कार्ड भी चोरी हो चुका है। पहले कई चुनाव में उन्होंने अपना वोट डाला है। शेरपुर डेरी गांव को उज्जड़खेड़ा गांव के नाम से भी जाना जाता है। गांव का नाम दिल्ली के रेवेन्यू रेकॉर्ड में दर्ज है। हरिनाथ पिछले 20 साल से भी ज्यादा से यहां रह रहे थे। पिछले दो महीने से उनकी गंभीर बीमारी का इलाज अलवर के एक अस्पताल में चल रहा है। हरिनाथ के वोटर आई कार्ड पर शेरपुर डेयरी का नाम लिखा था और उनका पोलिंग स्टेशन उजवा गांव में पड़ता है। क्या है गांव की कहानी शेरपुर डेयरी गांव रेवेन्यू रेकॉर्ड में अभी भी है। हालांकि यह गांव उजड़ चुका है। गांव के लोग बताते हैं कि यह गांव औरंगजेब के समय में बसा था। उस समय औरंगजेब की सेना में शेर खां और जैन खां नाम के दो सैनिक थे। युद्ध में वीरता से लड़ने के कारण उन्हें दो गांव दिए गए थे। शेरपुर डेयरी गांव का नाम शेरखां के नाम पर पड़ा था, वहीं जैनपुर गांव का नाम जैन खां के नाम पर पड़ा था। शेरपुर डेयरी ऊपरी हिस्से में बसा हुआ था। ऊपरी इलाके में होने के कारण यहां पानी की बड़ी समस्या हुई और गांव उजड़ गया। दूसरी ओर जैनपुर गांव निचले हिस्से में बसा था। यहां हर साल यहां बाढ़ आ जाती थी। इसके कारण यह गांव भी उजड़ गया। हर साल यहां बाढ़ आ जाती थी। इसके कारण यह गांव भी उजड़ गया। गांव का 300 साल से भी ज्यादा पुराना इतिहास है। भले ही अब यह उजड़ गया हो लेकिन दिल्ली सरकार के रेवेन्यू रिकॉर्ड में आज भी इस गांव का नाम दर्ज है। गांव के लोग कहां गए, कोई नहीं जानता। लेकिन हर गुरुवार का इस गांव में आसपास के लोग एक मजार पर दीया जलाने आते हैं। इसे सैय्यद के नाम से पुकारते हैं। कहा जाता है कि यहां दुआ मांगने पर सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। कैसे पहुंचे इस गांव तक यह गांव नजफगढ़ से करीब 10 किलोमीटर दूर है। नजफगढ़ से खैरा मोड़ जाकर इस गांव तक जाया जा सकता है। खैरा मोड़ से बाएं मुड़ने के बाद खेड़ा डाबर गांव आता है। गांव में दिल्ली सरकार का आयुर्वेदिक अस्पताल है। अस्पताल की दीवार के साथ-साथ खेतों में एक रास्ता जाता है। कुछ दूर चलने पर नाले पर एक पुल बना है। पुल से सीधे जाने पर इस गांव तक पहुंचा जा सकता है।.
हाइलाइट्स:शेरपुर डेरी एक ऐसा गांव है जहां हरिनाथ अकेले वोटर थे, वोट भी डालते थेवोटर लिस्ट से कट चुका है नाम, शख्स का अलवर में चल रहा है इलाजयह गांव नजफगढ़ से करीब 10 किलोमीटर दूर है, यह गांव औरंगजेब के समय में बसा थावीरेंद्र वर्मा, नई दिल्ली राजधानी के एक गांव में रहने वाले अकेले शख्स इस बार लोकसभा चुनाव में अपना वोट नहीं डाल पाएंगे। करीब 77 साल के हरिनाथ नजफगढ़ इलाके शेरपुर डेयरी गांव में रहते हैं। वे अकेले इंसान हैं जो इस गांव में रहते हैं। इस गांव में उनके नाम पर वोट भी बना हुआ था। लेकिन अब उनका वोट इस गांव से कट चुका है और उनका वोटर आई कार्ड भी चोरी हो चुका है। पहले कई चुनाव में उन्होंने अपना वोट डाला है। शेरपुर डेरी गांव को उज्जड़खेड़ा गांव के नाम से भी जाना जाता है। गांव का नाम दिल्ली के रेवेन्यू रेकॉर्ड में दर्ज है। हरिनाथ पिछले 20 साल से भी ज्यादा से यहां रह रहे थे। पिछले दो महीने से उनकी गंभीर बीमारी का इलाज अलवर के एक अस्पताल में चल रहा है। हरिनाथ के वोटर आई कार्ड पर शेरपुर डेयरी का नाम लिखा था और उनका पोलिंग स्टेशन उजवा गांव में पड़ता है। क्या है गांव की कहानी शेरपुर डेयरी गांव रेवेन्यू रेकॉर्ड में अभी भी है। हालांकि यह गांव उजड़ चुका है। गांव के लोग बताते हैं कि यह गांव औरंगजेब के समय में बसा था। उस समय औरंगजेब की सेना में शेर खां और जैन खां नाम के दो सैनिक थे। युद्ध में वीरता से लड़ने के कारण उन्हें दो गांव दिए गए थे। शेरपुर डेयरी गांव का नाम शेरखां के नाम पर पड़ा था, वहीं जैनपुर गांव का नाम जैन खां के नाम पर पड़ा था। शेरपुर डेयरी ऊपरी हिस्से में बसा हुआ था। ऊपरी इलाके में होने के कारण यहां पानी की बड़ी समस्या हुई और गांव उजड़ गया। दूसरी ओर जैनपुर गांव निचले हिस्से में बसा था। यहां हर साल यहां बाढ़ आ जाती थी। इसके कारण यह गांव भी उजड़ गया। हर साल यहां बाढ़ आ जाती थी। इसके कारण यह गांव भी उजड़ गया। गांव का 300 साल से भी ज्यादा पुराना इतिहास है। भले ही अब यह उजड़ गया हो लेकिन दिल्ली सरकार के रेवेन्यू रिकॉर्ड में आज भी इस गांव का नाम दर्ज है। गांव के लोग कहां गए, कोई नहीं जानता। लेकिन हर गुरुवार का इस गांव में आसपास के लोग एक मजार पर दीया जलाने आते हैं। इसे सैय्यद के नाम से पुकारते हैं। कहा जाता है कि यहां दुआ मांगने पर सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। कैसे पहुंचे इस गांव तक यह गांव नजफगढ़ से करीब 10 किलोमीटर दूर है। नजफगढ़ से खैरा मोड़ जाकर इस गांव तक जाया जा सकता है। खैरा मोड़ से बाएं मुड़ने के बाद खेड़ा डाबर गांव आता है। गांव में दिल्ली सरकार का आयुर्वेदिक अस्पताल है। अस्पताल की दीवार के साथ-साथ खेतों में एक रास्ता जाता है। कुछ दूर चलने पर नाले पर एक पुल बना है। पुल से सीधे जाने पर इस गांव तक पहुंचा जा सकता है।
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