दिल्ली में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ दिल्ली (आईएफएफडी) 2026 का समापन भव्यता के साथ हुआ, जिसमें 100 से अधिक देशों की 2,187 फिल्मों की प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। इस महोत्सव ने दिल्ली को सिनेमा और संस्कृति के एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की नींव रखी और फिल्म सिटी के विकास के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
राजधानी ने बीते एक सप्ताह में सिर्फ फिल्में नहीं देखीं, बल्कि सिनेमा को जीया। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ दिल्ली 2026 का समापन भव्यता और ऊर्जा के साथ हुआ। इस उत्सव ने यह साफ कर दिया कि दिल्ली अब केवल सत्ता का नहीं, बल्कि सिनेमा और संस्कृति का भी एक उभरता वैश्विक केंद्र बन रही है। मंगलवार को राजधानी ने ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षण का साक्षी बनते हुए आईएफएफडी को अभूतपूर्व उत्साह और जनभागीदारी के साथ विदाई दी। सात दिनों तक चले इस महोत्सव में 100 से अधिक देशों से आई 2,187 फिल्मों की रिकॉर्ड प्रविष्टियां प्राप्त हुईं, जिनमें 1,372 अंतरराष्ट्रीय और 815 भारतीय फिल्में शामिल थीं। राजधानी के 15 से अधिक स्थलों पर प्रदर्शित 125 से ज्यादा फिल्मों ने दर्शकों को विविधता और विषयवस्तु की गहराई से रूबरू कराया। हाउसफुल रहा हर शो, दर्शकों की उमड़ी भीड़ : भारत मंडपम से लेकर शहर के मल्टीप्लेक्स और ओपन-एयर स्क्रीनिंग तक, हर जगह दर्शकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। रंग दे बसंती, शतक: संघ के सौ वर्ष और तन्वी द ग्रेट, जैसी फिल्मों के शो पूरी तरह हाउसफुल रहे। अंतिम दिन सिंगापुर की फिल्म अमीबा के साथ महोत्सव का समापन हुआ, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान पहले ही बना ली थी। 30 हजार से अधिक रजिस्ट्रेशन, सिनेमा बना जन-उत्सव आईएफएफडी -2026 में 30,000 से अधिक दर्शकों ने पंजीकरण कराया था। पहली ही बार आयोजित इस महोत्सव ने न केवल सिनेमा प्रेमियों का दिल जीता, बल्कि दिल्ली को वैश्विक फिल्म और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने की मजबूत नींव भी रख दी। महोत्सव के दौरान दिल्ली में फिल्म सिटी के विकास के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किए गए, जो राजधानी को फिल्म निर्माण के बड़े केंद्र के रूप में उभारने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। स्टार पावर और वैश्विक भागीदारी ने बढ़ाया कद महोत्सव में आमिर खान, विक्की कौशल, मनोज बाजपेयी, भूमि पेडनेकर, हेमा मालिनी और कंगना रनौत जैसे सितारों की मौजूदगी ने आकर्षण को और बढ़ाया। वहीं, स्पेन और सिंगापुर जैसे देशों की भागीदारी ने इसे अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया। नई पीढ़ी को राष्ट्र नायकों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनीं फिल्में राजधानी में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ दिल्ली के समापन दिवस पर इतिहास, राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी फिल्मों ने दर्शकों का खास ध्यान खींचा। भारत मंडपम में फिल्म, शतक संघ के सौ वर्ष और लोकमाता देवी अहिल्याबाई पर आधारित लघु फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग को दर्शकों ने सराहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में फिल्म प्रेमियों और दिल्लीवासियों की उपस्थिति रही। दर्शकों ने फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान और रानी अहिल्याबाई होल्कर के नेतृत्व व सांस्कृतिक संरक्षण के कार्यों को करीब से समझा। दिल्ली सरकार में कला, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने इस अवसर पर कहा, कि इस तरह की फिल्में नई पीढ़ी को देश के राष्ट्र नायकों और उनके योगदान से परिचित कराने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने शतक फिल्म की सराहना करते हुए कहा, कि इसमें संघ की स्थापना से लेकर उसके सामाजिक कार्यों और राष्ट्रीय भूमिका को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फिल्म में केशव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिवराव गोलवलकर और बालासाहेब देवरस के नेतृत्व और योगदान को प्रमुखता से दिखाया गया है। साथ ही विभिन्न आंदोलनों और चुनौतीपूर्ण समय में स्वयंसेवकों की भूमिका को भी रेखांकित किया है।.
राजधानी ने बीते एक सप्ताह में सिर्फ फिल्में नहीं देखीं, बल्कि सिनेमा को जीया। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ दिल्ली 2026 का समापन भव्यता और ऊर्जा के साथ हुआ। इस उत्सव ने यह साफ कर दिया कि दिल्ली अब केवल सत्ता का नहीं, बल्कि सिनेमा और संस्कृति का भी एक उभरता वैश्विक केंद्र बन रही है। मंगलवार को राजधानी ने ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षण का साक्षी बनते हुए आईएफएफडी को अभूतपूर्व उत्साह और जनभागीदारी के साथ विदाई दी। सात दिनों तक चले इस महोत्सव में 100 से अधिक देशों से आई 2,187 फिल्मों की रिकॉर्ड प्रविष्टियां प्राप्त हुईं, जिनमें 1,372 अंतरराष्ट्रीय और 815 भारतीय फिल्में शामिल थीं। राजधानी के 15 से अधिक स्थलों पर प्रदर्शित 125 से ज्यादा फिल्मों ने दर्शकों को विविधता और विषयवस्तु की गहराई से रूबरू कराया। हाउसफुल रहा हर शो, दर्शकों की उमड़ी भीड़ : भारत मंडपम से लेकर शहर के मल्टीप्लेक्स और ओपन-एयर स्क्रीनिंग तक, हर जगह दर्शकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। रंग दे बसंती, शतक: संघ के सौ वर्ष और तन्वी द ग्रेट, जैसी फिल्मों के शो पूरी तरह हाउसफुल रहे। अंतिम दिन सिंगापुर की फिल्म अमीबा के साथ महोत्सव का समापन हुआ, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान पहले ही बना ली थी। 30 हजार से अधिक रजिस्ट्रेशन, सिनेमा बना जन-उत्सव आईएफएफडी-2026 में 30,000 से अधिक दर्शकों ने पंजीकरण कराया था। पहली ही बार आयोजित इस महोत्सव ने न केवल सिनेमा प्रेमियों का दिल जीता, बल्कि दिल्ली को वैश्विक फिल्म और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने की मजबूत नींव भी रख दी। महोत्सव के दौरान दिल्ली में फिल्म सिटी के विकास के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किए गए, जो राजधानी को फिल्म निर्माण के बड़े केंद्र के रूप में उभारने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। स्टार पावर और वैश्विक भागीदारी ने बढ़ाया कद महोत्सव में आमिर खान, विक्की कौशल, मनोज बाजपेयी, भूमि पेडनेकर, हेमा मालिनी और कंगना रनौत जैसे सितारों की मौजूदगी ने आकर्षण को और बढ़ाया। वहीं, स्पेन और सिंगापुर जैसे देशों की भागीदारी ने इसे अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया। नई पीढ़ी को राष्ट्र नायकों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनीं फिल्में राजधानी में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ दिल्ली के समापन दिवस पर इतिहास, राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी फिल्मों ने दर्शकों का खास ध्यान खींचा। भारत मंडपम में फिल्म, शतक संघ के सौ वर्ष और लोकमाता देवी अहिल्याबाई पर आधारित लघु फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग को दर्शकों ने सराहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में फिल्म प्रेमियों और दिल्लीवासियों की उपस्थिति रही। दर्शकों ने फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान और रानी अहिल्याबाई होल्कर के नेतृत्व व सांस्कृतिक संरक्षण के कार्यों को करीब से समझा। दिल्ली सरकार में कला, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने इस अवसर पर कहा, कि इस तरह की फिल्में नई पीढ़ी को देश के राष्ट्र नायकों और उनके योगदान से परिचित कराने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने शतक फिल्म की सराहना करते हुए कहा, कि इसमें संघ की स्थापना से लेकर उसके सामाजिक कार्यों और राष्ट्रीय भूमिका को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। फिल्म में केशव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिवराव गोलवलकर और बालासाहेब देवरस के नेतृत्व और योगदान को प्रमुखता से दिखाया गया है। साथ ही विभिन्न आंदोलनों और चुनौतीपूर्ण समय में स्वयंसेवकों की भूमिका को भी रेखांकित किया है।
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