जागरण संपादकीय: जनगणना में देरी, 2027 से पहले नहीं दिख रही जनगणना की संभावना

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जनगणना में देरी से उसका चक्र प्रभावित होने की भी आशंका है क्योंकि अभी यह कहना कठिन है कि 2031 में जनगणना कराने की आवश्यकता समझी जाएगी या नहीं? निःसंदेह मौजूदा सरकार के समक्ष यह दुविधा भी होगी कि जनगणना के साथ जाति गणना कराई जाए या नहीं? जाति गणना की मांग बढ़ती चली जा रही है और पिछले दिनों तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उसकी आवश्यकता जता...

2021 में होने वाली जनगणना को लेकर ऐसे संकेत सामने आना ठीक नहीं कि उसमें न केवल देरी होगी, बल्कि वह 2027 से पहले संभव नहीं होगी। ऐसे संकेत इसलिए उभर रहे हैं, क्योंकि इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं कि वह वस्तुतः कब शुरू होगी। जनगणना में देर होने की आशंका उभरने का एक कारण यह भी है कि इस बार बजट में उसके लिए कोई प्रविधान नहीं किया गया। अब यदि अगले बजट में उसके लिए प्रविधान किया जाता है तो 2025-26 में ही जनगणना का काम शुरू हो सकता है। जनगणना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है और उसके पूरा होते-होते यदि 2027 बीत जाए तो हैरानी नहीं। 2021 की जनगणना कोविड महामारी के कारण स्थगित की गई थी। यह ठीक ही था। इस भयावह महामारी से जूझते हुए जनगणना संभव नहीं थी, लेकिन उसके समाप्त होने के बाद तो वह सरकार की प्राथमिकता में शामिल होनी ही चाहिए थी। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि महामारी के दौर में भी अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए जाते रहे और कई अन्य बड़े आयोजन भी किए जाते रहे। यह सही है कि लोकसभा चुनाव के आसपास जनगणना कराना संभव नहीं था, क्योंकि उसमें भी आम तौर पर उन्हीं कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है, जो जनगणना करते हैं। समझना कठिन है कि यह क्यों नहीं सुनिश्चित किया जा सका कि 2025 में जनगणना का काम हर हाल में शुरू हो सकता। जनगणना में देरी होने का मतलब है सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन और योजनाओं के निर्माण में 2011 के आंकड़ों से ही काम चलाने की मजबूरी। ध्यान रहे कि जनगणना के आंकड़ों का उपयोग सरकारों के साथ उद्योग जगत और शोध संस्थाएं भी करती हैं। इसके अतिरिक्त संसद, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधित्व का आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन में भी जनगणना के आंकड़ों का ही इस्तेमाल किया जाता है। यदि प्रस्तावित जनगणना के आंकड़े सामने आने में देरी होती है तो फिर महिला आरक्षण लागू करने में भी विलंब हो सकता है। संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करना तब संभव होगा, जब निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा और परिसीमन के लिए जनगणना के अद्यतन आंकड़े चाहिए होंगे। जनगणना में देरी से उसका चक्र प्रभावित होने की भी आशंका है, क्योंकि अभी यह कहना कठिन है कि 2031 में जनगणना कराने की आवश्यकता समझी जाएगी या नहीं? निःसंदेह मौजूदा सरकार के समक्ष यह दुविधा भी होगी कि जनगणना के साथ जाति गणना कराई जाए या नहीं? जाति गणना की मांग बढ़ती चली जा रही है और पिछले दिनों तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उसकी आवश्यकता जता दी। सरकार का जाति गणना पर जो भी फैसला हो, यह मानकर चला जाना चाहिए कि वह ऐसे जतन अवश्य कर रही होगी, जिससे जनगणना में अधिक विलंब न होने पाए।.

2021 में होने वाली जनगणना को लेकर ऐसे संकेत सामने आना ठीक नहीं कि उसमें न केवल देरी होगी, बल्कि वह 2027 से पहले संभव नहीं होगी। ऐसे संकेत इसलिए उभर रहे हैं, क्योंकि इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं कि वह वस्तुतः कब शुरू होगी। जनगणना में देर होने की आशंका उभरने का एक कारण यह भी है कि इस बार बजट में उसके लिए कोई प्रविधान नहीं किया गया। अब यदि अगले बजट में उसके लिए प्रविधान किया जाता है तो 2025-26 में ही जनगणना का काम शुरू हो सकता है। जनगणना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है और उसके पूरा होते-होते यदि 2027 बीत जाए तो हैरानी नहीं। 2021 की जनगणना कोविड महामारी के कारण स्थगित की गई थी। यह ठीक ही था। इस भयावह महामारी से जूझते हुए जनगणना संभव नहीं थी, लेकिन उसके समाप्त होने के बाद तो वह सरकार की प्राथमिकता में शामिल होनी ही चाहिए थी। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि महामारी के दौर में भी अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए जाते रहे और कई अन्य बड़े आयोजन भी किए जाते रहे। यह सही है कि लोकसभा चुनाव के आसपास जनगणना कराना संभव नहीं था, क्योंकि उसमें भी आम तौर पर उन्हीं कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है, जो जनगणना करते हैं। समझना कठिन है कि यह क्यों नहीं सुनिश्चित किया जा सका कि 2025 में जनगणना का काम हर हाल में शुरू हो सकता। जनगणना में देरी होने का मतलब है सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन और योजनाओं के निर्माण में 2011 के आंकड़ों से ही काम चलाने की मजबूरी। ध्यान रहे कि जनगणना के आंकड़ों का उपयोग सरकारों के साथ उद्योग जगत और शोध संस्थाएं भी करती हैं। इसके अतिरिक्त संसद, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधित्व का आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन में भी जनगणना के आंकड़ों का ही इस्तेमाल किया जाता है। यदि प्रस्तावित जनगणना के आंकड़े सामने आने में देरी होती है तो फिर महिला आरक्षण लागू करने में भी विलंब हो सकता है। संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करना तब संभव होगा, जब निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा और परिसीमन के लिए जनगणना के अद्यतन आंकड़े चाहिए होंगे। जनगणना में देरी से उसका चक्र प्रभावित होने की भी आशंका है, क्योंकि अभी यह कहना कठिन है कि 2031 में जनगणना कराने की आवश्यकता समझी जाएगी या नहीं? निःसंदेह मौजूदा सरकार के समक्ष यह दुविधा भी होगी कि जनगणना के साथ जाति गणना कराई जाए या नहीं? जाति गणना की मांग बढ़ती चली जा रही है और पिछले दिनों तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी उसकी आवश्यकता जता दी। सरकार का जाति गणना पर जो भी फैसला हो, यह मानकर चला जाना चाहिए कि वह ऐसे जतन अवश्य कर रही होगी, जिससे जनगणना में अधिक विलंब न होने पाए।

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