यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तानी फौज बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा में बलूच और पश्तून विद्रोहियों से बार-बार मात खा रही है। हाल में बलूच राष्ट्रवादियों ने कई दिनों तक पाकिस्तानी सैनिकों को ले जा रही ट्रेन को बंधक बनाकर रखा था। इस सबसे खीझे मुनीर को कहना पड़ा था कि 1500 बलूच विद्रोही पाकिस्तानी फौज का कुछ नहीं बिगाड़...
दिव्य कुमार सोती। कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों को उनके धर्म के आधार पर निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले में 28 लोगों की जान चली गई और कई घायल हो गए। आतंकियों ने हत्या करने से पहले पुरुष पर्यटकों से पता किया कि वे हिंदू हैं अथवा मुसलमान? पुरुष पर्यटकों के कपड़े उतार कर यह पुष्ट किया कि वे मुस्लिम तो नहीं हैं। कुछ पर्यटकों से कलमा सुनाने की भी मांग की गई और उसे सुनाने में असमर्थ लोगों की हत्या उनकी पत्नी और बच्चों के सामने ही कर दी गई। इस आतंकी हमले की कई हृदयविदारक तस्वीरें सामने आई हैं। कहीं तीन साल का बच्चा अपने पिता के लहूलुहान शव पर बैठा रो रहा है तो कहीं भारतीय नौसेना के एक अधिकारी की नवविवाहिता अपने मृत पति के शव के पास अकेली असहाय बैठी नजर आ रही है। मृतकों एवं घायलों में खुफिया विभाग के एक अधिकारी, भारतीय नौसेना, वायु सेना आदि सुरक्षा बलों से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं, जो अपने परिवारों के साथ छुट्टियां मनाने पहलगाम गए थे। इसका अंदेशा है कि आतंकियों को पर्यटन व्यवसाय से जुड़े स्थानीय लोगों ने उनके वहां होने की मुखबिरी की हो। इन आतंकियों को शरण भी स्थानीय लोगों ने दी होगी। यह पहली बार नहीं है कि स्थानीय लोगों द्वारा आतंकियों के लिए उनके लक्ष्य की निशानदेही की गई हो। इससे पहले प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के जरिये कश्मीर में सरकारी नौकरियों पर भेजे गए कश्मीर के विस्थापित हिंदुओं की भी उनके ही साथी कर्मियों की मुखबिरी के चलते हत्या के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसी ही भेदियों की वजह से सैन्य बलों पर भी कई हमले हो चुके हैं। कश्मीर में हिंदुओं को निशाना बनाने की यह पहली घटना नहीं। जून 2024 में रियासी में शिवखोड़ी मंदिर से लौट रहे तीर्थयात्रियों की बस पर आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया था। उसमें नौ तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी। कश्मीरी समाज में आतंकी संगठनों की पैठ कितनी गहरी है, इसे इससे समझा जा सकता है कि इस वर्ष ही जम्मू-कश्मीर सरकार के पांच कर्मचारियों को नौकरी से इसलिए निकालना पड़ा, क्योंकि सरकार में रहते हुए भी वे आतंकी संगठनों के लिए काम कर रहे थे। ऐसे और सरकारी कर्मचारी हैं, जिनकी आतंकी संगठनों से मिले होने के संदेह में जांच हो रही है। कश्मीर में फैले इस्लामी कट्टरपंथ का यह वह सच है, जो अक्सर बाकी देश की जनता तक नहीं पहुंच पाता। अनुच्छेद 370 यह सोचकर भी हटाया गया था कि देश का कोई भी नागरिक अन्य राज्यों की भांति चाहेगा तो कश्मीर में भी व्यवसाय स्थापित कर सकेगा या जब चाहे वहां आवाजाही कर सकेगा। कश्मीर में गहराई से व्याप्त इस्लामिक कट्टरपंथ के चलते ऐसा होना आज तक संभव नहीं हो सका और पीएम पैकेज के जरिये नौकरी करने भेजे गए कश्मीर के ही मूल निवासी हिंदुओं की भी निशाना बनाकर हत्याएं हुईं। यह यही सिद्ध करता है कि कश्मीर केवल राजनीतिक या संवैधानिक समस्या नहीं है और न ही उसे पारंपरिक सैन्य कार्रवाई से नियंत्रित किया जा सकता है। कश्मीर में तब तक पूर्ण रूप से शांति स्थापित नहीं हो सकती, जब तक जिहादी कट्टरपंथ से ग्रस्त कश्मीरियों का वैचारिक उपचार न हो। चीन अपने मुस्लिम बाहुल्य शिनजियांग प्रांत में यही कर रहा है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार अलगाववादी एवं आतंकी विचारधारा की गिरफ्त में आ चुके लोगों को पुनर्शिक्षण कैंपों में भेजती है। इन कैंपों में ऐसे लोगों के मन-मस्तिष्क में भर चुकी कट्टरपंथी जिहादी विचारधारा को निकाला जाता है और उन्हें गैर-मुसलमानों के प्रति मानवीय संवेदनाएं रखने की शिक्षा दी जाती है। चीन के इस अकेले मुस्लिम बहुल प्रांत में इस्लामी शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण है और वहां के मस्जिद-मदरसों में इस्लामी मान्यताओं या मजहबी शिक्षा के नाम पर कोई भी ऐसी चीज नहीं पढ़ाई जा सकती, जिससे कि गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा की भावना पनपे अथवा मजहब के नाम पर चीन से अलगाववाद की मानसिकता जन्म ले। यही कारण है कि जहां कई युद्ध लड़ने के बाद भी इजरायल जिहादी आतंक को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाया है, वहीं चीन ने शिनजियांग में इस्लामी आतंकवाद को पूरी तरह काबू कर लिया है। दुर्भाग्यवश जम्मू-कश्मीर में दशकों से आतंकवाद से जूझते भारत ने सैकड़ों नागरिक और सुरक्षा बलों के जवान गंवाने के बाद भी जिहादी आतंक की विचारधारा के स्रोतों पर कोई लगाम नहीं लगाई है। कम्युनिस्ट चीन को छोड़िए, अब तो उदारवादी फ्रांस और जर्मनी तक कट्टरपंथी मस्जिदों पर ताले जड़ रहे हैं, लेकिन भारत में इस पर कोई चर्चा तक संभव नहीं हो पाती। पहलगाम में भीषण आतंकी हमला पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के उस भाषण के एक हफ्ते के भीतर हुआ, जिसमें उन्होंने हिंदुओं और भारत के विरुद्ध जमकर जहर उगला था। उन्होंने जिन्ना के नफरती द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन भी किया था। पुलवामा हमले और बालाकोट में भारत की जवाबी कार्रवाई के बाद से पाकिस्तानी फौज जम्मू-कश्मीर में छोटे आतंकी हमले करा रही थी और किसी बड़े आतंकी हमले से बच रही थी। ऐसे में अचानक से पाकिस्तान को इस दुस्साहस की हिम्मत कहां से आई? संभवतः पाकिस्तान को लगता है कि बांग्लादेश में भारत के विपरीत हालात होने के चलते और एलएसी पर भारतीय सेना के चीनी सेना से तनाव की स्थिति का वह फायदा उठा सकता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तानी फौज बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा में बलूच और पश्तून विद्रोहियों से बार-बार मात खा रही है। हाल में बलूच राष्ट्रवादियों ने कई दिनों तक पाकिस्तानी सैनिकों को ले जा रही ट्रेन को बंधक बनाकर रखा था। इस सबसे खीझे मुनीर को कहना पड़ा था कि 1,500 बलूच विद्रोही पाकिस्तानी फौज का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। भारत को चाहिए कि पाकिस्तान के विरुद्ध ऐसी सैन्य कार्रवाई करे, जिससे पाकिस्तान को मजबूर होकर अपने सैनिक बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा से हटाकर भारतीय सीमा पर लाने पड़ें और इसका लाभ बलूच और पश्तून उठा पाएं। पाकिस्तान की चौतरफा घेराबंदी की जानी चाहिए।.
दिव्य कुमार सोती। कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों को उनके धर्म के आधार पर निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले में 28 लोगों की जान चली गई और कई घायल हो गए। आतंकियों ने हत्या करने से पहले पुरुष पर्यटकों से पता किया कि वे हिंदू हैं अथवा मुसलमान? पुरुष पर्यटकों के कपड़े उतार कर यह पुष्ट किया कि वे मुस्लिम तो नहीं हैं। कुछ पर्यटकों से कलमा सुनाने की भी मांग की गई और उसे सुनाने में असमर्थ लोगों की हत्या उनकी पत्नी और बच्चों के सामने ही कर दी गई। इस आतंकी हमले की कई हृदयविदारक तस्वीरें सामने आई हैं। कहीं तीन साल का बच्चा अपने पिता के लहूलुहान शव पर बैठा रो रहा है तो कहीं भारतीय नौसेना के एक अधिकारी की नवविवाहिता अपने मृत पति के शव के पास अकेली असहाय बैठी नजर आ रही है। मृतकों एवं घायलों में खुफिया विभाग के एक अधिकारी, भारतीय नौसेना, वायु सेना आदि सुरक्षा बलों से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं, जो अपने परिवारों के साथ छुट्टियां मनाने पहलगाम गए थे। इसका अंदेशा है कि आतंकियों को पर्यटन व्यवसाय से जुड़े स्थानीय लोगों ने उनके वहां होने की मुखबिरी की हो। इन आतंकियों को शरण भी स्थानीय लोगों ने दी होगी। यह पहली बार नहीं है कि स्थानीय लोगों द्वारा आतंकियों के लिए उनके लक्ष्य की निशानदेही की गई हो। इससे पहले प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के जरिये कश्मीर में सरकारी नौकरियों पर भेजे गए कश्मीर के विस्थापित हिंदुओं की भी उनके ही साथी कर्मियों की मुखबिरी के चलते हत्या के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसी ही भेदियों की वजह से सैन्य बलों पर भी कई हमले हो चुके हैं। कश्मीर में हिंदुओं को निशाना बनाने की यह पहली घटना नहीं। जून 2024 में रियासी में शिवखोड़ी मंदिर से लौट रहे तीर्थयात्रियों की बस पर आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया था। उसमें नौ तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी। कश्मीरी समाज में आतंकी संगठनों की पैठ कितनी गहरी है, इसे इससे समझा जा सकता है कि इस वर्ष ही जम्मू-कश्मीर सरकार के पांच कर्मचारियों को नौकरी से इसलिए निकालना पड़ा, क्योंकि सरकार में रहते हुए भी वे आतंकी संगठनों के लिए काम कर रहे थे। ऐसे और सरकारी कर्मचारी हैं, जिनकी आतंकी संगठनों से मिले होने के संदेह में जांच हो रही है। कश्मीर में फैले इस्लामी कट्टरपंथ का यह वह सच है, जो अक्सर बाकी देश की जनता तक नहीं पहुंच पाता। अनुच्छेद 370 यह सोचकर भी हटाया गया था कि देश का कोई भी नागरिक अन्य राज्यों की भांति चाहेगा तो कश्मीर में भी व्यवसाय स्थापित कर सकेगा या जब चाहे वहां आवाजाही कर सकेगा। कश्मीर में गहराई से व्याप्त इस्लामिक कट्टरपंथ के चलते ऐसा होना आज तक संभव नहीं हो सका और पीएम पैकेज के जरिये नौकरी करने भेजे गए कश्मीर के ही मूल निवासी हिंदुओं की भी निशाना बनाकर हत्याएं हुईं। यह यही सिद्ध करता है कि कश्मीर केवल राजनीतिक या संवैधानिक समस्या नहीं है और न ही उसे पारंपरिक सैन्य कार्रवाई से नियंत्रित किया जा सकता है। कश्मीर में तब तक पूर्ण रूप से शांति स्थापित नहीं हो सकती, जब तक जिहादी कट्टरपंथ से ग्रस्त कश्मीरियों का वैचारिक उपचार न हो। चीन अपने मुस्लिम बाहुल्य शिनजियांग प्रांत में यही कर रहा है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार अलगाववादी एवं आतंकी विचारधारा की गिरफ्त में आ चुके लोगों को पुनर्शिक्षण कैंपों में भेजती है। इन कैंपों में ऐसे लोगों के मन-मस्तिष्क में भर चुकी कट्टरपंथी जिहादी विचारधारा को निकाला जाता है और उन्हें गैर-मुसलमानों के प्रति मानवीय संवेदनाएं रखने की शिक्षा दी जाती है। चीन के इस अकेले मुस्लिम बहुल प्रांत में इस्लामी शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण है और वहां के मस्जिद-मदरसों में इस्लामी मान्यताओं या मजहबी शिक्षा के नाम पर कोई भी ऐसी चीज नहीं पढ़ाई जा सकती, जिससे कि गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा की भावना पनपे अथवा मजहब के नाम पर चीन से अलगाववाद की मानसिकता जन्म ले। यही कारण है कि जहां कई युद्ध लड़ने के बाद भी इजरायल जिहादी आतंक को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाया है, वहीं चीन ने शिनजियांग में इस्लामी आतंकवाद को पूरी तरह काबू कर लिया है। दुर्भाग्यवश जम्मू-कश्मीर में दशकों से आतंकवाद से जूझते भारत ने सैकड़ों नागरिक और सुरक्षा बलों के जवान गंवाने के बाद भी जिहादी आतंक की विचारधारा के स्रोतों पर कोई लगाम नहीं लगाई है। कम्युनिस्ट चीन को छोड़िए, अब तो उदारवादी फ्रांस और जर्मनी तक कट्टरपंथी मस्जिदों पर ताले जड़ रहे हैं, लेकिन भारत में इस पर कोई चर्चा तक संभव नहीं हो पाती। पहलगाम में भीषण आतंकी हमला पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के उस भाषण के एक हफ्ते के भीतर हुआ, जिसमें उन्होंने हिंदुओं और भारत के विरुद्ध जमकर जहर उगला था। उन्होंने जिन्ना के नफरती द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन भी किया था। पुलवामा हमले और बालाकोट में भारत की जवाबी कार्रवाई के बाद से पाकिस्तानी फौज जम्मू-कश्मीर में छोटे आतंकी हमले करा रही थी और किसी बड़े आतंकी हमले से बच रही थी। ऐसे में अचानक से पाकिस्तान को इस दुस्साहस की हिम्मत कहां से आई? संभवतः पाकिस्तान को लगता है कि बांग्लादेश में भारत के विपरीत हालात होने के चलते और एलएसी पर भारतीय सेना के चीनी सेना से तनाव की स्थिति का वह फायदा उठा सकता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तानी फौज बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा में बलूच और पश्तून विद्रोहियों से बार-बार मात खा रही है। हाल में बलूच राष्ट्रवादियों ने कई दिनों तक पाकिस्तानी सैनिकों को ले जा रही ट्रेन को बंधक बनाकर रखा था। इस सबसे खीझे मुनीर को कहना पड़ा था कि 1,500 बलूच विद्रोही पाकिस्तानी फौज का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। भारत को चाहिए कि पाकिस्तान के विरुद्ध ऐसी सैन्य कार्रवाई करे, जिससे पाकिस्तान को मजबूर होकर अपने सैनिक बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा से हटाकर भारतीय सीमा पर लाने पड़ें और इसका लाभ बलूच और पश्तून उठा पाएं। पाकिस्तान की चौतरफा घेराबंदी की जानी चाहिए।
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