पश्चिम ने पहले परिवार को तोड़ा। तमाम विमर्शों के जरिये स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे का दुश्मन और बच्चों को बोझ की तरह बताया। कोख को स्त्री की सबसे बड़ी मजबूरी और कमजोरी कहा। अकेलेपन की बहुत गुलाबी और सुविधाओं संसाधनों से भरी तस्वीर पेश की। अब बच्चे चाहिए परिवार चाहिए पारिवारिक मूल्य चाहिए। पहले नकारात्मक विचारों के डायनामाइट लगाकर अच्छे मूल्यों को...
क्षमा शर्मा। हाल में उच्चतम न्यायालय ने परिवारों के टूटने और उनके स्वरूप बदलने पर गहरी चिंता प्रकट की। अदालत ने कहा, ‘हम तो वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते हैं, लेकिन हमारे देश में पारिवारिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। हमारे यहां माता-पिता और बच्चों के बीच भी पारिवारिक मूल्य नहीं बचे हैं। वे जमीन-जायदाद के झगड़ों के लिए अदालतों तक पहुंच रहे हैं। हमारे यहां वन परसन-वन फैमिली का विचार जगह बना रहा है। यदि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी हो, तो बच्चों को जमीन-जायदाद से बेदखल किया जा सकता है, मगर जिस मामले की हम सुनवाई कर रहे हैं, वहां तो लड़का माता-पिता की देखभाल करता है।’ अदालत ने ट्रिब्यूनल के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें बेटे से घर खाली करने को कहा गया था। यह सच है कि कई बार माता-पिता सचमुच बच्चों द्वारा सताए जाते हैं, लेकिन कई बार वे सिर्फ अपनी ही चलाना चाहते हैं और जरा भी झुकने को तैयार नहीं होते। अपने देश में जो भी थोड़े-बहुत पारिवारिक मूल्य बचे हैं, उनका लगातार क्षरण हो रहा है। अपने यहां स्त्रियों को परिवार और आदर्शों के नाम पर तरह-तरह से परेशान किया गया है, सताया गया है। अब जब स्त्रियां लगातार शिक्षित हो रही हैं, आत्मनिर्भर बन रही हैं, तो उन्हें परिवार का वह स्वरूप नहीं चाहिए, जिसमें उन्हें हमेशा सेविका के रूप में ही देखा जाए। यह ठीक भी है। अपने देश में परिवार का स्वरूप स्त्रियों के लिए शोषण मूलक भी रहा है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि परिवार संस्था को एकदम ही खत्म कर दिया जाए। आज भी परिवार से बड़ी शक्ति दुनिया भर में दूसरी नहीं है। तभी तो पश्चिम परिवार और पारिवारिक मूल्यों की गुहार लगा रहा है। हालांकि वहां परिवार के लोगों द्वारा देखभाल को भी केयर इकोनमी का नाम दिया जाता है और इसके बदले पैसे देने की मांग की जाती है। भारत में भी ऐसी मांग उठती रहती है। अपने देश में ऐसे संयुक्त परिवार तो शायद बहुत ही कम बचे होंगे, जहां दादा-दादी, माता-पिता, चाचा, ताऊ, उनके बाल बच्चे सब इकट्ठे रहते हों। अब तो परिवार का मतलब पति-पत्नी और बच्चे ही रह गए हैं। दशकों से एकल परिवारों को आदर्श बताया जाता रहा है। आपको शायद याद हो कि हमारे यहां परिवार नियोजन के विज्ञापन कहते थे-हम दो, हमारे दो। यदि आज परिवारों के ढांचे पर नजर डालें, तो आम तौर पर मध्यवर्गीय परिवारों में एक बच्चे का चलन बढ़ा है। चाहे लड़का हो या लड़की, सिर्फ एक बच्चा। इसके कारण आर्थिक और सामाजिक भी हैं। मध्यवर्ग की अधिकांश महिलाएं नौकरी करती हैं। वे न अधिक बच्चों को जन्म दे सकती हैं, न ही उनके पालने-पोसने, शिक्षा के लगातार महंगे होने के खर्चे ही उठाए जा सकते हैं। हालांकि चीन की एक बच्चा नीति के दुष्परिणाम भी हमने देखे ही हैं। ऐसे में यदि एक बच्चा है, तो उनकी पीढ़ी ऐसी होगी, जिनके आसपास बहुत से रिश्ते नहीं होंगे। जैसे जिनका एक बेटा है, उसकी कोई बहन नहीं होगी। इस लड़के का मान लो कोई बच्चा हुआ तो वह बुआ और उसके बच्चों के रिश्तों को भी नहीं जानेगा। जिनकी एक बेटी है, उसका कोई भाई नहीं होगा। भाभी और उसके बाल-बच्चे नहीं होंगे। चचेरे, ममेरे, फुफेरे आदि भाई-बहनों की तो गिनती ही कहां। ये रिश्ते भी होते हैं, इन्हें यह पीढ़ी भूल चुकी होगी। अब तो तमाम बुजुर्ग यह कहते दिखते हैं कि हमने अपने बच्चे पाल दिए। अब बच्चे अपने बच्चे पालें। यों कहावतों में ये बातें अब भी जिंदा हैं कि मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है। दादा-दादी, नाना-नानी अपने बच्चों की जिस तरह देखभाल करते हैं, वह कोई और नहीं कर सकता। कई बार अदालतों के फैसले भी इन धारणाओं को तोड़ते हैं। हाल में एक अदालत ने कहा था कि बच्ची की देखभाल दादी उस तरह नहीं कर सकती, जैसे मां कर सकती है। मां और पिता के बीच बच्ची की कस्टडी का मामला चल रहा था। पिता का कहना था कि मां की अनुपस्थिति में उसकी मां बच्ची की अच्छी तरह से देखभाल कर सकती है, लेकिन अदालत ने इसे नहीं माना। जबकि पश्चिम में माना जा रहा है कि केवल माता-पिता ही नहीं, दादा-दादी भी बच्चों की अच्छी देखभाल कर सकते हैं। पिछले दिनों स्वीडन में एक नया कानून बनाया गया है, जिसमें दादा-दादी को भी अपने बच्चों के बच्चों की देखभाल के लिए तीन महीने की पेरेंटिंग लीव मिल सकेगी। यानी वहां बुजुर्ग अपने नाती-पोतों की देखभाल करना चाहते हैं और माता-पिता को भी इससे कोई आपत्ति नहीं है। पश्चिम परिवार की तरफ दौड़ रहा है। वहां के नेता अपने-अपने देश में बच्चों के विकास के लिए परिवार को वापस लाने की बातें कर रहे हैं। इसके लिए नारे दे रहे हैं और चुनाव जीत रहे हैं। पश्चिम ने पहले परिवार को तोड़ा। तमाम विमर्शों के जरिये स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे का दुश्मन और बच्चों को बोझ की तरह बताया। कोख को स्त्री की सबसे बड़ी मजबूरी और कमजोरी कहा। अकेलेपन की बहुत गुलाबी और सुविधाओं, संसाधनों से भरी तस्वीर पेश की। अब बच्चे चाहिए, परिवार चाहिए, पारिवारिक मूल्य चाहिए। पहले नकारात्मक विचारों के डायनामाइट लगाकर अच्छे मूल्यों को नष्ट किया। अब सब कुछ पुराना चाहिए, लेकिन पुराना उस तरह से कभी नहीं लौटता, जिसके हमने स्वप्न देखे होते हैं। वह ट्रेजेडी या कामेडी ही बन सकता है। इससे पहले कि अपने यहां परिवार पश्चिम की राह चलें, उन्हें बचाने की जरूरत है।.
क्षमा शर्मा। हाल में उच्चतम न्यायालय ने परिवारों के टूटने और उनके स्वरूप बदलने पर गहरी चिंता प्रकट की। अदालत ने कहा, ‘हम तो वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते हैं, लेकिन हमारे देश में पारिवारिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं। हमारे यहां माता-पिता और बच्चों के बीच भी पारिवारिक मूल्य नहीं बचे हैं। वे जमीन-जायदाद के झगड़ों के लिए अदालतों तक पहुंच रहे हैं। हमारे यहां वन परसन-वन फैमिली का विचार जगह बना रहा है। यदि बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी हो, तो बच्चों को जमीन-जायदाद से बेदखल किया जा सकता है, मगर जिस मामले की हम सुनवाई कर रहे हैं, वहां तो लड़का माता-पिता की देखभाल करता है।’ अदालत ने ट्रिब्यूनल के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें बेटे से घर खाली करने को कहा गया था। यह सच है कि कई बार माता-पिता सचमुच बच्चों द्वारा सताए जाते हैं, लेकिन कई बार वे सिर्फ अपनी ही चलाना चाहते हैं और जरा भी झुकने को तैयार नहीं होते। अपने देश में जो भी थोड़े-बहुत पारिवारिक मूल्य बचे हैं, उनका लगातार क्षरण हो रहा है। अपने यहां स्त्रियों को परिवार और आदर्शों के नाम पर तरह-तरह से परेशान किया गया है, सताया गया है। अब जब स्त्रियां लगातार शिक्षित हो रही हैं, आत्मनिर्भर बन रही हैं, तो उन्हें परिवार का वह स्वरूप नहीं चाहिए, जिसमें उन्हें हमेशा सेविका के रूप में ही देखा जाए। यह ठीक भी है। अपने देश में परिवार का स्वरूप स्त्रियों के लिए शोषण मूलक भी रहा है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि परिवार संस्था को एकदम ही खत्म कर दिया जाए। आज भी परिवार से बड़ी शक्ति दुनिया भर में दूसरी नहीं है। तभी तो पश्चिम परिवार और पारिवारिक मूल्यों की गुहार लगा रहा है। हालांकि वहां परिवार के लोगों द्वारा देखभाल को भी केयर इकोनमी का नाम दिया जाता है और इसके बदले पैसे देने की मांग की जाती है। भारत में भी ऐसी मांग उठती रहती है। अपने देश में ऐसे संयुक्त परिवार तो शायद बहुत ही कम बचे होंगे, जहां दादा-दादी, माता-पिता, चाचा, ताऊ, उनके बाल बच्चे सब इकट्ठे रहते हों। अब तो परिवार का मतलब पति-पत्नी और बच्चे ही रह गए हैं। दशकों से एकल परिवारों को आदर्श बताया जाता रहा है। आपको शायद याद हो कि हमारे यहां परिवार नियोजन के विज्ञापन कहते थे-हम दो, हमारे दो। यदि आज परिवारों के ढांचे पर नजर डालें, तो आम तौर पर मध्यवर्गीय परिवारों में एक बच्चे का चलन बढ़ा है। चाहे लड़का हो या लड़की, सिर्फ एक बच्चा। इसके कारण आर्थिक और सामाजिक भी हैं। मध्यवर्ग की अधिकांश महिलाएं नौकरी करती हैं। वे न अधिक बच्चों को जन्म दे सकती हैं, न ही उनके पालने-पोसने, शिक्षा के लगातार महंगे होने के खर्चे ही उठाए जा सकते हैं। हालांकि चीन की एक बच्चा नीति के दुष्परिणाम भी हमने देखे ही हैं। ऐसे में यदि एक बच्चा है, तो उनकी पीढ़ी ऐसी होगी, जिनके आसपास बहुत से रिश्ते नहीं होंगे। जैसे जिनका एक बेटा है, उसकी कोई बहन नहीं होगी। इस लड़के का मान लो कोई बच्चा हुआ तो वह बुआ और उसके बच्चों के रिश्तों को भी नहीं जानेगा। जिनकी एक बेटी है, उसका कोई भाई नहीं होगा। भाभी और उसके बाल-बच्चे नहीं होंगे। चचेरे, ममेरे, फुफेरे आदि भाई-बहनों की तो गिनती ही कहां। ये रिश्ते भी होते हैं, इन्हें यह पीढ़ी भूल चुकी होगी। अब तो तमाम बुजुर्ग यह कहते दिखते हैं कि हमने अपने बच्चे पाल दिए। अब बच्चे अपने बच्चे पालें। यों कहावतों में ये बातें अब भी जिंदा हैं कि मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है। दादा-दादी, नाना-नानी अपने बच्चों की जिस तरह देखभाल करते हैं, वह कोई और नहीं कर सकता। कई बार अदालतों के फैसले भी इन धारणाओं को तोड़ते हैं। हाल में एक अदालत ने कहा था कि बच्ची की देखभाल दादी उस तरह नहीं कर सकती, जैसे मां कर सकती है। मां और पिता के बीच बच्ची की कस्टडी का मामला चल रहा था। पिता का कहना था कि मां की अनुपस्थिति में उसकी मां बच्ची की अच्छी तरह से देखभाल कर सकती है, लेकिन अदालत ने इसे नहीं माना। जबकि पश्चिम में माना जा रहा है कि केवल माता-पिता ही नहीं, दादा-दादी भी बच्चों की अच्छी देखभाल कर सकते हैं। पिछले दिनों स्वीडन में एक नया कानून बनाया गया है, जिसमें दादा-दादी को भी अपने बच्चों के बच्चों की देखभाल के लिए तीन महीने की पेरेंटिंग लीव मिल सकेगी। यानी वहां बुजुर्ग अपने नाती-पोतों की देखभाल करना चाहते हैं और माता-पिता को भी इससे कोई आपत्ति नहीं है। पश्चिम परिवार की तरफ दौड़ रहा है। वहां के नेता अपने-अपने देश में बच्चों के विकास के लिए परिवार को वापस लाने की बातें कर रहे हैं। इसके लिए नारे दे रहे हैं और चुनाव जीत रहे हैं। पश्चिम ने पहले परिवार को तोड़ा। तमाम विमर्शों के जरिये स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे का दुश्मन और बच्चों को बोझ की तरह बताया। कोख को स्त्री की सबसे बड़ी मजबूरी और कमजोरी कहा। अकेलेपन की बहुत गुलाबी और सुविधाओं, संसाधनों से भरी तस्वीर पेश की। अब बच्चे चाहिए, परिवार चाहिए, पारिवारिक मूल्य चाहिए। पहले नकारात्मक विचारों के डायनामाइट लगाकर अच्छे मूल्यों को नष्ट किया। अब सब कुछ पुराना चाहिए, लेकिन पुराना उस तरह से कभी नहीं लौटता, जिसके हमने स्वप्न देखे होते हैं। वह ट्रेजेडी या कामेडी ही बन सकता है। इससे पहले कि अपने यहां परिवार पश्चिम की राह चलें, उन्हें बचाने की जरूरत है।
Supreme Court On Family Case Supreme Court Expressed Concern Supreme Court Order Supreme Court News
United States Latest News, United States Headlines
Similar News:You can also read news stories similar to this one that we have collected from other news sources.
'ट्रांसफर को अभी रोकना चाहिए' : जज कैश मामले पर NDTV से बोले हरीश साल्वेसुप्रीम कोर्ट ने एक प्रेस बयान भी जारी किया, जिसमें कहा गया कि जज वर्मा का तबादला दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा की जा रही आंतरिक जांच से संबंधित नहीं है.
Read more »
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस यशवंत वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश कीसुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट में वापस भेजने की सिफारिश की है.
Read more »
'इस घटना ने अंतरात्मा को झकझोर दिया', प्रयागराज में बुलडोजर एक्शन पर यूपी सरकार को फटकारउत्तर प्रदेश के प्रयागराज में उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना अवैध निर्माण ढहाने की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर की है। जस्टिस अभय एस.
Read more »
यूपी के दो पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक, जानें UP पुलिस से सु्प्रीम कोर्ट ने क्या कहा?सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि वह दो पत्रकारों को चार और सप्ताह तक गिरफ्तार न करे। वहीं एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट में दो वकीलों को जज बनाने की मंजूरी मिल गई है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में पेड़ों की कटाई और कर्नाटक हनी-ट्रैप मामले पर भी सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आया...
Read more »
SC कॉलेजियम ने जस्टिस दिनेश कुमार शर्मा को लेकर लिया फैसला, कलकत्ता HC में ट्रांसफर की सिफारिशSupreme Court Collegium: सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश दिनेश कुमार शर्मा को कलकत्ता हाईकोर्ट ट्रांसफर करने की सिफारिश की है.
Read more »
भारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर जताई चिंता, कड़ी कार्रवाई की अपीलभारत ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर जताई चिंता, कड़ी कार्रवाई की अपील
Read more »
