ElectionsWithNews18 BattleOf2019 न्यूज18 आपको एक दिलचस्प वाकया बता रहा है जब 2014 लोकसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने लालकृष्ण आडवाणी के भोपाल लोकसभा सीट ऑफर की थी
है. इसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को टिकट नहीं दिया गया है. वे पिछली बार गुजरात के गांधीनगर से सांसद थे. इस बार उनका टिकट काट दिया गया है और गांधीनगर से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इस बार से चुनाव लड़ेंगे.
इसी बीच न्यूज18 आपको एक दिलचस्प वाकया बता रहा है जब 2014 लोकसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने लालकृष्ण आडवाणी के भोपाल लोकसभा सीट ऑफर की थी. उस समय लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव लड़ना गांधीनगर सीट से तय माना जा रहा था लेकिन ऐन मौके पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें भोपाल सीट ऑफर कर दी थी. इसके बाद यह माना जाने लगा था कि लालकृष्ण आडवाणी भोपाल सीट से ही चुनाव लड़ेंगे. 2014 में जब उनके नाम की घोषणा भी नहीं हुई थी तभी भोपाल की सड़कों पर आडवाणी वेलकम लिखे होर्डिंग्स नजर आने लग गए थे. शिवराज सिंह चौहान को लाल कृष्ण आडवाणी का करीबी माना जाता रहा है. आडवाणी खुद कई बार शिवराज सिंह चौहान की तारीफ करते रहे हैं.इतना ही नहीं उस दौरान जब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी का पीएम पद के लिए उम्मीदवारी का नाम चल रहा था तो आडवाणी ने एक नहीं कई बार कहा था कि पार्टी में प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवारों की कोई कमी नहीं है. नाम लेते समय वे हर बार शिवराज सिंह का नाम लेते थे. गोवा राष्ट्रीय कार्यकारिणी से ठीक पहले भी उन्होंने पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी से शिवराज सिंह चौहान की तुलना कर दी थीदरअसल, आडवाणी को भोपाल सीट ऑफर करने के पीछे कई कारण थे. शिवराज सिंह चौहान ने आडवाणी को भोपाल से चुनाव लड़ने का न्यौता देकर एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की थी. पहला तो आडवाणी की हमदर्दी हासिल करना और दूसरा पार्टी में मौजूद अन्य वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं तक यह संदेश देना कि वे सबका ख्याल रख सकते हैं. शिवराज ने इससे पहले दिग्गज नेता सुषमा स्वराज को भी मध्यप्रदेश से एक सुरक्षित सीट मुहैया कराई थी. यह वही विदिशा सीट थी, जिस पर खुद चौहान चार बार सांसद रह चुके थे और जिसके एक-एक गांव से वो वाकिफ थे. चुनाव बाद तो सुषमा स्वराज ज्यादा समय दिल्ली रहतीं, लेकिन यहां उनकी सीट का पूरा ख्याल रखा जाता था.विदिशा की तरह भोपाल लोकसभा सीट भी बीजेपी के लिए काफी सुरक्षित थी. 1984 की इंदिरा लहर के बाद से कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बाद भी यह सीट नहीं जीत पाई. सीट पर कायस्थ, ब्राम्हण और मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं. कांग्रेस ने सारे जतन किए. ब्राम्हण उम्मीदवार खड़े किए, कायस्थों को मौका दिया और मुस्लिमों को भी आजमाया, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. इतना ही नहीं कांग्रेस ने भोपाल के नवाब खानदान के अली खान पटौदी को भी 1991 में टिकट दिया. उस वक्त पटौदी के प्रचार के लिए राजीव गांधी भी आए थे लेकिन पटौदी बीजेपी के सुशील चंद्र वर्मा से हार गए. भोपाल लोकसभा सीट 1989 से बीजेपी के पास है. पूर्व नौकरशाह रहे सुशीलचंद्र वर्मा से लेकर उमा भारती और कैलाश जोशी सभी भोपाल से सांसद बने. आडवाणी के लिए गांधीनगर सीट भी उतनी ही सुरक्षित थी जितनी भोपाल, लेकिन नरेंद्र मोदी ने आडवाणी को गुजरात छोड़ मध्य प्रदेश नहीं आने दिया. और 2014 लोकसभा चुनाव में अंततः लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर सीट से ही चुनाव लड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच साल के कार्यकाल में लालकृष्ण आडवाणी के बारे में राजनीतिक गलियारों में भले ही कितनी भी चर्चाएं होती रही हों लेकिन उनके प्रति शिवराज सिंह चौहान का प्रेम बरकरार रहा. विधानसभा चुनाव 2019 में हार के बाद मकर संक्रांति के दिन जब शिवराज जनता को शुभकामनाएं दे रहे थे तो उनके पीछे पीएम मोदी की बजाय लालकृष्ण आडवाणी का ही फोटो लगा था.
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