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6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मुंबई में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे पर भी आरोप लगे। 3 साल बाद 1995 में निर्देशक मणिरत्नम ने इस दंगे पर ‘बॉम्बे’ नाम की फिल्म बनाई। फिल्म में शिवसैनिकों को मबॉम्बे फिल्म के अंत में बाल ठाकरे से मिलता एक कैरेक्टर इस हिंसा पर दुख प्रकट करते हुए दिखाई देता है। बाल ठाकरे ने इस फिल्म का विरोध किया। साथ ही मुंबई में इसे रिलीज न होने देने की धमकी दी। फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर अमिताभ बच्चन बाल ठाकरे से मिलने पहुंचे। अमिताभ ने पूछा- क्या शिवसैनिकों को दंगाइयों के रूप में दिखाना उन्हें बुरा लगा? ठाकरे का जवाब था- बिल्कुल भी नहीं। मुझे ठाकरे के कैरेक्टर का दंगों पर दुख प्रकट करना बुरा लगा। मैं कभी किसी चीज पर दुख नहीं प्रकट करता। एक कॉन्सर्ट से पहले बाल ठाकरे का आशीर्वाद लेते अमिताभ। बाल ठाकरे और अमिताभ के रिश्ते हमेशा अच्छे बने रहे।बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। वह 9 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। बाल ठाकरे मराठी बोलने वाले कायस्थ परिवार से आते थे। उनके पिता केशव सीताराम ठाकरे पेशे से लेखक और पत्रकार थे। बाल ठाकरे की जीवनी 'हिंदू हृदय सम्राट- हाऊ द शिवसेना चेंज्ड मुंबई फॉर एवर' किताब लिखने वाली सुजाता आनंदन के मुताबिक, ठाकरे के पिता केशव ठाकरे अंग्रेजी लेखक विलियम मेकपीस ठेकरे के मुरीद हुआ करते थे। उन्होंने उनसे प्रेरणा लेकर अपना पारिवारिक नाम ठेकरे रख लिया जो बाद में बदलकर ठाकरे हो गया। पढ़ाई में रुचि नहीं होने की वजह से बाल ठाकरे ने बहुत कम उम्र में ही स्कूल छोड़ दिया। उन्होंने 13 जून 1948 को मीना ठाकरे से शादी कर ली। इसी साल उन्होंने अपने भाई के साथ 'मार्मिक' नाम से एक साप्ताहिक अखबार निकाला। इस अखबार के लिए वह खुद कार्टून बनाया करते थे। 1950 में 24 साल की उम्र में बाल ठाकरे 'फ्री प्रेस जर्नल' में एक कार्टूनिस्ट के तौर पर काम करने लगे। यहीं मशहूर कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण भी उनके साथ काम किया करते थे।में लिखते हैं कि 60 के दशक में मुंबई में बड़े कारोबार पर गुजरातियों का कब्जा था। छोटे कारोबार पर दक्षिण भारतीय और मुस्लिमों का दबदबा था। यानी मुंबई में मराठियों के लिए काम-धंधे का स्कोप बेहद कम बचा था। ठाकरे ने इस मुद्दे को समझा और मराठी मानुस की आवाज उठाने लगे। लिहाजा जल्द ही मराठियों के बीच पॉपुलर हो गए और 1966 में शिवसेना का गठन किया। शिवसेना ने मेनिफेस्टो में दक्षिण भारतीय लोगों की जगह मराठियों को नौकरी देने की बात कही। बाल ठाकरे ने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ ‘पुंगी बजाओ और लुंगी हटाओ' अभियान चलाया था। ठाकरे तमिल भाषा का उपहास करते हुए उन्हें ‘यंडुगुंडू’ कहते थे।पहली जीतः एक राजनीतिक हत्या के बाद जीता शिवसेना का पहला विधायक 1967 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में परेल विधानसभा से क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर कृष्णा देसाई ने जीत दर्ज की। आक्रामक तेवर और बेहतरीन भाषण शैली की वजह से वह जल्द ही पूरे महाराष्ट्र में फेमस हो गया। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर अपनी किताब 'जय महाराष्ट्र' में लिखते हैं कि 5 जून 1970 की रात लालबाग के ललित राइस मिल में देसाई आम लोगों से मिल रहे थे। तभी कुछ लोगों ने देसाई को बहाने से बाहर बुला लिया। इस वक्त इलाके की बिजली कटी हुई थी। अंधेरे में बात करते हुए जैसे ही देसाई बाहर आए, दो-तीन लोगों ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया। इस हमले में उनकी मौत हो गई। उस वक्त सियासी गलियारे में चर्चा थी कि इस हत्या के पीछे शिवसेना का ही हाथ है। अंतिम संस्कार में शामिल वक्ताओं में कामरेड यशंवत चव्हाण ने इस हत्याकांड के लिए वसंतराव नाइक और बाल ठाकरे को जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि बाला साहेब ने इस हत्या की निंदा की थी। 18 अक्टूबर 1970 को परेल विधानसभा में उपचुनाव हुआ। इस उपचुनाव में वाम दलों ने कामरेड कृष्णा देसाई की पत्नी सरोजिनी देसाई को उम्मीदवार बनाया। कांग्रेस समेत कुल 13 वामपंथी पार्टियों ने सरोजिनी देसाई का साथ दिया। जबकि शिवसेना ने परेल से पार्षद वामनराव महादिक को उम्मीदवार बनाया। वामनराव महादिक बाल ठाकरे के विश्वासपात्र के तौर पर जाने जाते थे। इस चुनाव में बाला साहेब ने 15 रैलियां कीं। वामपंथियों को राष्ट्र विरोधी बताया। आखिर में जब चुनाव परिणाम आया तो शिवसेना उम्मीदवार 1600 वोटों से चुनाव जीत गया। इस तरह शिवसेना बनने के 4 साल बाद एक राजनीतिक हत्या के बाद पार्टी का पहला विधायक बना। ये तस्वीर साल 1970 की है, जिसमें शिवसेना के पहले विधायक वामनराव महादिक के साथ बाल ठाकरे नजर आ रहे हैं।1967 की बात है। शिवसेना पार्टी शुरू हुए अभी साल भर बीता था। इसके टॉप लीडर थे बाला साहेब ठाकरे। बलवंत मंत्री को पार्टी का दूसरा बड़ा नेता माना जाने लगा था। शिवसेना के तमाम बड़े मंचों पर बाल ठाकरे के साथ बलवंत मंत्री जरूर दिखते थे। हालांकि दोनों नेताओं में कुछ मतभेद होने लगे थे। पत्रकार प्रकाश अकोलकर अपनी किताब 'जय महाराष्ट्र' में लिखते हैं, ‘एक रोज दादर के वनमाली हॉल में शिवसेना की बड़ी बैठक हो रही थी। बलवंत मंत्री ने अपने भाषण में कहा कि शिवसेना को किसी एक शख्स के जरिए कंट्रोल किए जाने की बजाय लोकतांत्रिक तरीके से चलाना चाहिए। वहां मौजूद शिवसैनिकों को लगा कि वह बाला साहेब के खिलाफ बयान दे रहे हैं। देखते ही देखते शिवसैनिकों का एक जत्था बलवंत के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मंच तक आ गया। बलवंत को खींचकर जूतों से पीटने लगा। उनके कपड़े फाड़ दिए गए, चेहरे और शरीर पर कालिख पोत दी गई। बलवंत रोते हुए बाला साहेब के पैरों पर गिर गए और उनसे माफी मांगने लगे।’ शिवेसना नेता बलवंत मंत्री को पीटते शिवसैनिकों का स्केच। इसी दिन से साफ हो गया कि शिवसेना में सिर्फ बाला साहेब ठाकरे की ही चलेगी।बाल ठाकरे का कहना था कि महाराष्ट्र में वहां के युवाओं के हितों की रक्षा सबसे जरूरी है। धीरे-धीरे मुंबई के हर इलाके में स्थानीय दबंग युवा शिवसेना में शामिल होने लगे। एक गॉडफादर की तरह बाल ठाकरे हर झगड़े सुलझाने लगे। धीरे-धीरे मुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हो रहा था, लेकिन पार्टी को बड़ी कामयाबी नहीं मिल रही थी। इसके बाद ठाकरे ने मराठी मानुस के साथ कट्टर हिंदुत्व की आइडियोलॉजी अपनाई। 1980 और 1990 के दशक में शिवसेना को इसका फायदा भी मिला। मुंबई के विले पार्ले विधानसभा सीट के लिए दिसंबर 1987 में हुए उप-चुनाव में पहली बार शिवसेना ने हिंदुत्व का आक्रामक प्रचार किया था। चुनावी अखाड़े में 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का उद्घोष हुआ।। इस चुनाव में एक्टर मिथुन चक्रवर्ती और नाना पाटेकर ने शिवसेना के उम्मीदवार का प्रचार किया था। हालांकि हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने के बाद चुनाव आयोग ने ठाकरे से 6 साल के लिए मतदान का अधिकार छीन लिया था। दक्षिण भारत के पत्रकार आर.
पद्मनाभन के मुताबिक दिसंबर 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद मुंबई में हुई साम्प्रदायिक हिंसा पर जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में शिवसेना के शामिल होने की बात कही थी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र किया था कि खुद बाल ठाकरे ने अपने भरोसेमंद शिवसैनिकों को संगठित हमले का आदेश दिया था। बाल ठाकरे हमेशा सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठा करते थे। बताया जाता है कि शिवसेना की मजदूर इकाई भारतीय कामगार सेना ने यह सिंहासन उन्हें उपहार में दिया था। सिंहासन लकड़ी का था और इस पर चांदी की सिर्फ परत चढ़ी थी।6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद पूरे देश में दंगे की आग भड़क उठी। मस्जिद गिराए जाने के बाद दक्षिणी मुंबई के डोंगरी में दो बड़ी घटनाएं घटीं। पहला- मराठी हिंदू मजदूर की मुस्लिम कट्टरपंथियों ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दूसरा- मुंबई के ही राधाबाई चॉल में एक विकलांग समेत 6 हिंदुओं को जलाकर मार दिया गया। इन दो घटनाओं की वजह से पूरे महीने मुंबई में तनाव की स्थिति बनी रही। शिवसेना के मुखपत्र सामना और मराठी अखबार नवकाल में छपे लेखों ने कट्टरपंथी हिंदुओं के भावना को भड़काने का काम किया। मुस्लिमों को कैंसर बताने वाले बाला साहेब ने इस दंगे के आरोप पर कहा था कि अगर मेरी वजह से देश में युद्ध होता है तो इसे होने दिया जाए। सामना में लिखे बाला साहेब के लेख को पढ़कर 6 जनवरी 1993 को शिवसैनिकों की भीड़ मुंबई की सड़कों पर उतर गई। धार्मिक नारे लगाते हुए शिवसैनिक पूरे शहर में रैलियां निकालने लगे। अगले दो दिनों के लिए पूरा मुंबई थम गया। मुंबई के ठाणे में हिंदू और मुस्लिमों के बीच दंगे भड़क गए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें 575 मुस्लिम और 275 हिंदू मारे गए। इतिहासकार बारबरा मेटकाफ के मुताबिक डोंगरी और राधाभाई चॉल की घटी घटना के जवाब में ये हिंसा भड़की थी। बारबरा बताते हैं कि बाला साहेब को अच्छी तरह से पता था कि अगर हिंसा भड़की तो उसका क्या परिणाम होगा। इसके बावजूद उन्होंने भड़काऊ लेख लिखे। इस दंगे को भड़काने का आरोपी मानकर मुंबई पुलिस ने उन्हें साल 2000 में गिरफ्तार किया था। हालांकि बाद में ये मामला खारिज कर दिया गया।साल 2000 आते-आते शिवसेना में बाला साहेब ठाकरे के बाद उनके भतीजे राज ठाकरे दूसरे नंबर के नेता हो गए थे। ऐसा माना जाने लगा कि बाला साहेब के बाद राज ठाकरे ही शिवसेना संभालेंगे। बाला साहेब के तीन बेटे हुए- जयदेव, बिंदुमाधव और उद्धव। 1995 में बड़े बेटे जयदेव की मौत हो गई। अगले ही साल एक कार एक्सीडेंट में बिंदुमाधव की भी जान चली गई। उद्धव को राजनीति में कोई इंट्रेस्ट नहीं था, वो फोटोग्राफी करते थे। बाल ठाकरे के साथ भतीजा राज और बेटा उद्धव। उद्धव सौम्य स्वभाव के थे, जबकि राज की छवि एंग्री मैन की थी। 2002 में पिता के कहने पर उद्धव पहली बार राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल हुए। सुनियोजित तरीके से बाला साहेब ने उद्धव को इस साल होने वाले मुंबई महानगर पालिका के चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी। उद्धव पिता के इशारे को समझ चुके थे। उन्होंने इस चुनाव में राज ठाकरे के कई करीबी नेताओं के टिकट काट दिए। नाराज होकर भी राज ठाकरे कुछ नहीं कर पाए। जब चुनाव परिणाम आया तो शिवसेना और BJP गठबंधन की जीत हुई। इस जीत के अगले साल ही 2003 में बाला साहेब ठाकरे ने उद्धव को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। अब तक पार्टी में सिर्फ शिवसेना प्रमुख का पद था। पहली बार उद्धव के लिए कार्यकारी अध्यक्ष का नया पद बनाया गया। उद्धव के कार्यकारी अध्यक्ष बनते ही राज ठाकरे की अपने चाचा से नाराजगी बढ़ने लगी।10 दिसंबर 2005 को शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बाला साहेब ठाकरे ने एक कॉलम में लिखा, क्या शिवसेना पार्टी दो हिस्सों में बंट जाएगी? यह बंटवारा किस तरह से होगा? इन सवालों पर चिंता करना आप लोग बंद करें। आप सभी महाराष्ट्र और अपने बारे में चिंता करें। हम अपने किले की रक्षा करने में सक्षम हैं। मैं मीडिया को बताना चाहता हूं कि जो कुछ भी आपके मन में है वह नहीं होने वाला है। शिवसेना अजेय और अविनाशी है। अब तक शिवसेना में उद्धव ठाकरे हावी होने लगे थे। पार्टी के हर फैसले में उनका असर दिखने लगा था। 2005 में तब हंगामा मच गया जब राज ठाकरे ने पत्र लिखकर बाला साहेब ठाकरे से कहा कि चापलूसों की चौकड़ी आपको गुमराह कर रही है। उन्होंने कोंकण लोकसभा सीट पर हार के लिए भी इस चौकड़ी को जिम्मेदार ठहराया। पत्रकार लायला बवादम के मुताबिक राज ठाकरे जिस चौकड़ी की बात कर रहे थे उसमें उद्धव, मिलिंद नार्वेकर और सुभाष देसाई शामिल थे। राज के बागी अंदाज को बाला साहेब भांप गए थे। ऐसा कहा गया कि राज ने अपने पत्र में बाला साहेब से वैसे ही जवाब मांगा था, जैसे किसी शावक ने बाघ से सवाल किया हो। उद्धव के साथ काम करना राज के लिए मुश्किल हो रहा था और साथ ही वह जानते थे कि बाला साहेब के समर्थन के बिना शिवसेना पार्टी के निशान और नाम पर कब्जा करना मुश्किल है। ऐसे में दिसंबर 2005 में उन्होंने शिवसेना पार्टी छोड़ने का फैसला किया। जनवरी 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना के छात्र संगठन भारतीय विद्यार्थी सेना के साथ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम से अलग पार्टी बनाई। शिवसेना में टूट के बाद पार्टी को मजबूती देने के लिए एक बार फिर से बालासाहेब ने कमान संभाल ली। उन्होंने मराठी और हिंदुत्व के नारे को बुलंद कर शिवसेना के कमजोर हो रहे संगठन में नई जान फूंक दी। 2006 में शिवसेना के 40वें स्थापना दिवस पर बाल ठाकरे ने मुसलमानों को एंटी नेशनल बताया। उन्होंने षणमुखानंद हॉल में आयोजित इस समारोह में मुसलमानों को 'हरा जहर' कहा था। बाल ठाकरे के इस भाषण के दौरान उद्धव ठाकरे भी मौजूद थे। जब उन्होंने ये बयान दिया तो पूरा हॉल शिवसेना के समर्थन में नारों से गूंजने लगा।1989 के लोकसभा चुनाव के पहले पहली बार हिंदुत्व की छाया तले BJP और शिवसेना के बीच गठबंधन हुआ था। 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना 183 सीटों पर लड़ी और 52 पर जीत हासिल की, जबकि BJP ने 104 सीटों पर लड़कर 42 सीटों पर जीत हासिल की। उस वक्त शिवसेना के मनोहर जोशी विपक्ष के नेता बने। 1995 में BJP-शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा। शिवसेना ने 73, तो BJP ने 65 सीटें जीतीं। बाला साहेब ठाकरे ने फॉर्मूला दिया था कि जिस पार्टी के पास ज्यादा सीटें होंगी, मुख्यमंत्री उसका होगा। इसी आधार पर मनोहर जोशी को CM की कुर्सी मिली और BJP के गोपीनाथ मुंडे को डिप्टी CM की। 1989 के लोकसभा चुनाव के पहले पहली बार महाराष्ट्र में BJP और शिवसेना के बीच गठबंधन हुआ था। 1995 में बाला साहेब ठाकरे ने फॉर्मूला दिया था कि जिस पार्टी के पास ज्यादा सीटें होंगी, मुख्यमंत्री उसका होगा। 2004 के चुनाव में शिवसेना को 62 और BJP को 54 सीटों पर जीत मिली। 2009 में दोनों पार्टियों की सीटें कम हुईं, लेकिन BJP को पहली बार शिवसेना से ज्यादा सीटें हासिल हुईं। BJP ने इस दौरान 46 सीटें और शिवसेना ने 45 सीटें जीतीं। बाला साहेब के समय में महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना हमेशा बड़े भाई की भूमिका में ही रही। यानी वो ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती थी और बड़े फैसलों में बाल ठाकरे की बात मानी जाती थी। 2012 में बाला साहेब ठाकरे का निधन हो गया। उद्धव अब शिवसेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे। 2014 चुनाव से पहले उन्होंने सामना को दिए एक इंटरव्यू में कहा, ‘शिवसेना पिछले 25 साल के गठबंधन में सड़ गई। भाजपा के साथ गठबंधन कर शिवसेना को नुकसान हुआ है।’ इसके साथ ही दोनों दलों का गठबंधन टूट गया। 2014 विधानसभा चुनाव में सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी शिवसेना को BJP से आधी सीटें मिलीं। BJP ने 122 सीटों पर जीत हासिल की और शिवसेना ने 63 सीटों पर। हालांकि बाद में शिवसेना BJP की देवेंद्र फडणवीस सरकार में शामिल हो गई।अंग्रेजी मैग्जीन 'एशिया वीक' को दिए इंटरव्यू में बाल ठाकरे ने कहा, 'हिटलर बहुत क्रूर और तानाशाह था, लेकिन वह एक कलाकार था। वह मेरा पसंदीदा नेता है। उसके पास भीड़ जमा करने और उसका नेतृत्व करने की शक्ति थी। उसे देखकर और सुनकर ऐसा लगता है, जैसे वो कोई जादूगर या चमत्कारी व्यक्ति हो। उसमें अच्छे और बुरे दोनों गुण थे। उसी तरह मुझमें भी अच्छे और बुरे दोनों गुण हो सकते हैं।'बाल ठाकरे ने शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में दिए एक इंटरव्यू में कहा, 'मुझे लगता है कि भारत के बंटवारे के लिए नेहरू और एडविना का प्यार जिम्मेदार है। मेरे पास एक फिल्म थी, जिसमें नेहरू-एडविना के प्यार और पाकिस्तान बनने की कहानी दिखाई गई थी। इस फिल्म को इंग्लैंड में प्रतिबंधित कर दिया गया क्योंकि उस देश को अपनी छवि खराब होने का डर था।'भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ शादी करने पर बाल ठाकरे नाराज हो गए थे। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कहा था, 'अगर वह भारत के लिए खेलना चाहती थी, तो उसे भारतीय जीवन साथी चुनना चाहिए था... अब से सानिया भारतीय नहीं रहेगी। अगर उसका दिल भारतीय होता, तो वह पाकिस्तानी के लिए नहीं धड़कता।'जब राज ठाकरे माइकल जैक्सन को बालासाहेब के टॉयलेट ले गए: एक हत्याकांड बना टर्निंग पॉइंट; राज को क्यों नहीं मिली शिवसेना की गद्दीखिलजी ने कृष्ण के वंशजों को हराया: नौकर ने खड़ा किया महाराष्ट्र का बहमनी साम्राज्य, क्या है चांद बीबी का किस्सा दिल्ली में मुगल बादशाह को हराकर पीछे क्यों हटे बाजीराव:छत्रपति शिवाजी ने 26 साल औरंगजेब को छकाया; महाराष्ट्र में कैसे घुसे अंग्रेजपिता ने 5 साल के बेटे का गला काटा, मौतसेक्स से मना 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